Wednesday, May 31, 2017

जैविक कीटनाशक एवं औषधियाँ बनाने के नुस्खे

जैविक कीटनाशक एवं औषधियाँ बनाने के नुस्खे

जैविक कीटनाशक एवं औषधियाँ बनाने के नुस्खे

महुआ :

इमली से दवा

सामग्री :

500 ग्राम महुआ व इमली की छाल का रस |

बनाने की विधि :

महुआ व इमली की छाल बराबर मात्रा में लेकर कूटकर रस निकालते हैं |

उपयोग का तरीका व समय :

500 ग्राम को 15 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव सुबह – सुबह करते है | कपास की डोडी को खाने वाले गुलाबी रंग व धब्बेदार कीड़ों का नियंत्रण किया जा सकता है |

फूल – पुड़ी की दवा :

सामग्री :

किलो तम्बाखू, 500 ग्राम नीम का तेल, 25 ग्राम कपड़े धोने का साबुन |

बनाने की विधि :

1 किलो तम्बाकू को 5 लीटर पानी में गलाकर 3 दिन तक रखते है , चौथे दिन अच्छे से मसलकर निचोड़ कर घोल में 500 ग्राम नीम का तेल व 25 ग्राम साबुन भी मिलायें |

उपयोग का तरीका व समय :

15 लीटर पानी में 500 ग्राम तैयार घोल मिलाकर दो छिड़काव 15 दिनों के अंतर से सुबह – सुबह करें | सभी फसलों की इल्ली, सफेद व हरा मच्छर, मक्खी आदि के नियंत्रण हेतु |

कमलिया कीट की दवा :

सामग्री :

1 किलो तम्बाकू 400 ग्राम नीम का तेल, 25 ग्राम कपड़े धोने का साबुन, 100 ग्राम काले धतूरे के पत्ते का रस |

बनाने की विधि :

1 किलो तम्बाकू को 5 लीटर पानी में भिगोकर 3 दिन तक रखें तथा चौथे दिन अच्छे से मसलकर निचोड़कर 100 ग्राम काले धतूरे का रस, 250 ग्राम हरी मिर्च कूटकर मिलाकर छाने, घोले में 500 ग्राम नीम का तेल व 25 ग्राम साबुन मिलाने से अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे |

उपयोग का तरीका व समय :

15 लीटर पानी में 500 ग्राम तैयार घोल मिलाकर दो छिड़काव 5 दिन के अंतर से सुबह – सुबह करें | सभी फसलों पर लगने वाले कमलिया कीट की कारगर दवा है |

हरे रंग की इल्ली की दवा :

सामग्री :

250 ग्राम तम्बाकू, 300 ग्राम हिराकासी, 50 ग्राम नींबू का सत |

बनाने की विधि :

250 ग्राम तम्बाकू, 300 ग्राम हीराकासी, 50 ग्राम नींबू का सात, 2 लीटर पानी में उबालकर छाने लें |

उपयोग का तरीका व समय :

250 ग्राम घोल को 15 लीटर पानी में मिलाकर सुबह – सुबह छिड़काव करें 2.5 बीघ के लिए 3 – 4 टंकी प्रयाप्त है |

किस – किस कीट पर काम आती है :

इससे सभी फसलों की इल्ली को रोकने में मदद मिलती है |

सावधानी :

एक सप्ताह पश्चात ही उसका पुन: छिड़काव किया जाये अन्यथा फसल जल सकती है |

माहू (मौला) नाशक दवा :

सामग्री :

10 किलो नीम की पत्ती

बनाने की विधि :

10 किलो नीम की पत्ती को रातभर 5 लीटर पानी में भिगोकर रखें व सुबह उबालकर, मसलकर छानकर घोल तैयार करें |

उपयोग का तरीका और समय :

इस पूरे घोल को 100 लीटर पानी में घोल कर सुबह – सुबह छिड़काव करें |

किस – किस कीट पर काम आती है :

इससे माहू व पत्ते खाने वाले सभी कीड़े मर जाते है |

इल्ली, मच्छर मर दवा :

सामग्री :

5 लीटर गोमूत्र, 100 धतूरे के पत्ते |

बनाने की विधि :

5 लीटर गोमूत्र में 100 धतूरे के पत्ते को कूटकर मिलाकर छान लें |

उपयोग का तरीका व समय :

1 लीटर गोमूत्र घोल के 15 लीटर पानी में मिलाकर सुबह – सुबह छिड़काव करें |

किस – किस कीट पर काम आती है :

यह दवाई इल्ली और मच्छर को मारने की अचूक दवा है |

सावधानी :

15 दिन से ज्यादा पुराना गोमूत्र प्रयोग न करें | 15 दिन बाद ही इस दवा का फसल पर दोबारा प्रयोग करना चाहिए |

हरे व सफेद मच्छर व मक्खी मारने की दवा :

सामग्री:

500 ग्राम तम्बाकू पत्ती व 20 ग्राम साबुन |

बनाने की विधि :

500 ग्राम तम्बाकू को 5 लीटर पानी में आधा घंटे उबालकर, छानकर, ठंडा कर 20 ग्राम साबुन अच्छे से घोलकर दवाई तैयार करें |

उपयोग का तरीका व समय :

1 लीटर घोल में 15 लीटर पानी मिलाकर पौधों पर छिड़काव करें |

किस – किस कीट पर काम आती है :

यह दवाई हरे व सफेद मच्छर और मक्खी को मारने की अचूक दवा है |

सावधानी :

दवाई छिडकते समय दवाई मिट्टी पर नहीं गिरना चाहिए |

इल्ली मारने की दवा :

सामग्री :

1 किलो लहसुन, 200 ग्राम मिट्टी का तेल, 2 किलो हरी मिर्च |

बनाने की विधि :

1 किलो लहसुन छीलकर, पीसकर 200 ग्राम मिट्टी के तेल से भिगोकर रातभर रखना फिर सुबह 2 किलो मिर्ची पीसकर घोलना, अच्छे से मिलाना |

उपयोग का तरीका :

इस घोल को 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिडकना |

किस – किस कीट पर काम आती है :

यह दवाई किसी भी फसल पर इल्ली व सूंडी लगने पर प्रयोग की जा सकता है |

चने व कपास की इल्ली नाशक दवा :

सामग्री :

10 किलो गोमूत्र, 1 किलो नीम या बेल या आंकड़े के पत्ते 100 ग्राम लहसुन |

बनाने की विधि :

10 लीटर गोमूत्र में 1 किलो नीम का या बेल या आंकड़े के पत्ते मिलाकर 15 दिन तक रखें | 15 दिन बाद इस घोल में 100 ग्राम लहसुन डालकर इतना उबालें की घोल 5 लीटर रह जाये |

उपयोग का तरीका :

15 लीटर की स्प्रे टंकी में 750 ग्राम मिश्रण डालकर फसल व छिड़काव करें |

किस – किस कीट पर काम आती है :

चने व कपास पर लगने वाली चिकनी व बाल वाली इल्ली के साथ – साथ माहू की अचूक दवा है |

कीड़े मारने की दवा :

सामग्री :

5 लीटर गोमूत्र, 1 लीटर निरगुण्डी का रस (30 40 निरगुण्डी के पत्तों का 10 लीटर पानी में 1 लीटर रह जाने तक उबालें) फिर 1 लीटर हिंग पानी (10 ग्राम हिंग को 1 लीटर पानी में घोलना)

बनाने की विधि :

5 लीटर गोमूत्र, 1 लीटर निरगुण्डीका रस,1 लीटर हींग पानी तीनों 8 लीटर पानी के साथ मिलाकर फसल पर छिड़कते हैं |

उपयोग का तरीका :

7 ;लीटर घोल 8 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए | 2.5 बीघा के लिए 21 लीटर घोल पर 24 लीटर पानी की जगह होती है |

किस – किस कीट पर काम आती है :

यह दवाई सभी फसलों पर लगने वाले कीड़ों के लिए अचूक दवा है |

सावधानी :

निरगुण्डी व हींग पानी बताई गई मात्रा के अनुसार ही मिलाए |

नीम खली के अर्क की दवा :

सामग्री :

5 किलो निबोली की खली या 3 किलो कुटी हुई निबोली |

बनाने की विधि :

5 किलो निंबोली की खली को 15 लीटर पानी में 3 दिन तक भिंगोकर रख दें | चौथे दिन दारू निकाले, 100 ग्राम धतूरे का रस, 250 ग्राम हरी मिर्च कूटकर निकलने की विधि से इसका तिन लीटर अर्क निकाले |

उपयोग का तरीका व समय :

  • 1.5 लीटर अर्क को 15 लीटर पानी में मिलाकर सुबह – सुबह छिड़काव करें | यह दवा तने व पत्ते पर लगने वाली इल्ली, मच्छर व माहू के लिए असरकारक है |
  • कपास में माहू लगने पर 250 – 300 ग्राम धतूरे के पत्ते व टहनियों को 5 लीटर पानी में भिगों दे फिर इसे कुनकुना गर्म करें | ठंड करके फसल पर छिड़काव करते हैं जिससे तुरंत माहू मरने लगता है |
इस दवा का प्रयोग एक माह पुरानी फसल पर ही करना चाहिए |
  • निंबोल को पीसकर 100 ग्राम पावडर एक पौधे के चारों और 4 इंच गहराई में डालने से दीमक, गुबरैला, माहू आदि से छुटकारा मिलता है |
  • गोमूत्र का सुबह – सुबह फसल पर छिड़काव करने से कीड़े के प्रथम प्रकोप पर नियंत्रण किया जा सकता है |
  • बैगन व टमाटर पर चिट्टी रोग लग जाता हैं इस हेतु गाय के गोबर को पतला घोलकर पौधे की जड़ के पास डालते हैं |
  • आलू के पत्ते मुरझाने पर 10 किलो लकड़ी की राख में 50 ग्राम फिनायल की गोली का पाउडर व 50 ग्राम तम्बाकू के पत्ते को मिलाकर मिश्रण बना कर सुबह – सुबह फसल पर छिडकने से लाभ होता है |
  • बैगन, टमाटर, मिर्ची व अन्य सब्जियों पर लगने वाले कीड़ों को मारने के लिए लकड़ी की ठंडी राख सुबह – सुबह भुरके लाभ होगा |
  • टमाटर की पत्तियों व टहनियों को उबालकर ठंडी कर फसल पर पत्ते खाने वाली हरी व कलि मक्खियों को मारने के लिये छिड़काव करे |
  • करेले पर अर्धगोलाकार लाल भूरा रंग का कीड़ा जिस पर काले रंग के चकत्ते होते हैं ये सिगार के आकर के अण्डे  देते हैं इनसे पीले रंग की कांटेदार सुंडिया निकलती है | ये कीड़े व सुंडियां दोनों पत्तों को खाते है | इसे रोकने के लिए 60 ग्राम साधारण साबुन को आधा लीटर पानी के घोल में 1 लीटर नीम का तेल मिलाकर घोल तैयार करें | फिर इस घोल में 20 लीटर पानी अच्छी तरह से मिलाकर 400 ग्राम पीसी हुई लहसुन को घोले फिर छानकर फसल के पत्तों पर छिड़काव करें |
  • मिर्ची के फूल झड़ने से रोकने के लिए ईंट भट्टे से राख लाकर गोबर के साथ अच्छी तरह से मिलाकर पानी में पतला घोल बनाकर पौधों पर छिड़कने से लाभ होगा |
  • मक्का पर लगने वाली टिड्डी से बचने के लिए 3 किलो प्याज पीसकर उसका रस निकालकर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव देते हैं जिसकी गंध के कारण टिड्डी खेत के पास तक नही आती है |
  • वह इल्ली जो पौधों के पत्ते खाने के साथ – साथ तना खाकर पौधों को सूखा देती हैं इससे बचने के लिए 10 किलो नीम खली को पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करें |
  • चने पर लगने वाली इल्ली से बचने के लिए 5 किलो अडूसा की टहनियों का रस निकालकर 10 लीटर पानी में मिलाकर 2 – 3 बार  कपड़े से छानकर 5 लीटर पानी मिलाकर सुबह – सुबह फसल पर छिड़काव करें |

हरी इल्ली का गिदान से निदान :

  • 10 लीटर गोमूत्र में 5 किलो गिदान की पत्तियाँ एवं 250 ग्राम लहसुन को बारीक पीसकर डाल दें इसे 48 घंटे तक गोमूत्र में पड़ा रहने दें तत्पश्चात इसको छानकर अर्क निकल लें | 100 से 150 मि.ली. लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से चने की इल्ली तथा चितकबरी इल्ली पर प्रभावी नियंत्रण होता है | यह नुस्खा ग्राम मलगांव के कृषकों के द्वारा परीक्षित है उन्होंने इसका उपयोग कर जैविक कपास का उत्पादन किया है |
  • 2 लीटर छाछ, 200 ग्राम तम्बाकू का पाउडर व 2 पत्ते ग्वारपाठा (धिंकुवर) को 15 लीटर पानी में मिलाकर 15 दिन के लिए रख देते हैं फिर छानकर 15 लीटर पानी में 100 ग्राम सत का 8 – 10 दिन के अंतराल से छिड़काव करने से मूंग का उत्पादन कीट नियंत्रण होकर अच्छा होता है |
  • धान की फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए धान बोने के दस दिन बाद पानी भरे | खेत में इमली के बीज बिखेर दें ये बीज धीरे – धीरे सड़ जाएगा व पानी का रंग पीला पड़ जाएगा | जिससे उत्पादन में 20 प्रतिशत की वृद्धि होती है |
  • 1 किलो तम्बाकू की पत्ती को 10 लीटर पानी में आधे घंटे तक उबालकर ठंडाकर छानकर 20 ग्राम साबुन को अलग से 4.5 लीटर में अच्छे से घोलकर तम्बाकू के घोल में मिला लें | फिर 30 लीटर पानी मिलाकर छिड़काव करें | इससे पत्ते काटने वाली इल्ली व हरे सफेद मच्छर, मखियों, तना भेदक इल्ली व डोडी खाने वाली इल्ली व कीड़े मर जाते हैं |
  • एक किलो तम्बाकू को 200 ग्राम चूने से बुझे 10 लीटर गर्म पानी में एक दिन के लिए रखें फिर मसलकर छानकर 100 लीटर पानी मिलाकर फसल पर छिड़काव करें जिससे सफेद मक्खी, मच्छर, इल्ली व नरम शरीर वाले कीड़े मर जाते हैं |
  • नसेड़ी (बेशरम बेल) के पत्तों को कूटकर रस निकालें, 250 ग्राम रस व 20 ग्राम साबुन को 15 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें जिससे मच्छर, मक्खी व इल्ली मर जाती है |
  • सनाय व नीम के बराबर मात्रा लेकर कूटकर रस निकाले, 250 ग्राम रस व 20 ग्राम साबुन को 15 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें जिससे मच्छर, मक्खी व इल्ली मर जाती हैं |
  • 10 लीटर छाछ को एक मटके में एक माह तक रखें | बाद में इसमें गेंहू का आटा आधा किलो मिलाए | इस मिश्रण को पतला करके चने के खेत में चने की इल्ली का नियंत्रण करने के लिए छिड़काव करें |
  • चने का उकठा रोग (फ्यूजेरियम विल्ट) के नियंत्रण के लिए चने को छाछ से बीजोपचार करें | जिन खेतों में यह रोग होता हैं , उसमें चने को चार घंटे छाछ में भिगोने के बाद छांव में हलका सुखाकर बोए |
  • बोगनविलिया की पत्तियों को कच्चे दूध से भिगोंकर रत भर रखें | दुसरे दिन सुबह इन पत्तियों को निचोड़कर उसका अर्क निकाल लें | इसका 10 प्रतिशत का घोल बनाकर तम्बाकू, टमाटर और मिर्च में होने वाले कुकड़ा रोग (चुर्रा – मुर्रा) को नियंत्रण करने के लिए छिड़काव करें |
  • गोमूत्र का कीटनाशक के रूप में उपयोग करने के लिए गोमूत्र का 5 प्रतिशत  घोल का उपयोग करें , 10 लीटर देशी गाय का गोमूत्र तांबे के बर्तन में ले | उसमें नीम के एक किलो पत्ते डाले और 15 दिन तक गलने दें फिर उसे तांबे की कढ़ाई में उबालें, पचास प्रतिशत रह जाने पर नीचे उतार लें , छान लें | इस औषधी में सौ गुना पानी मिलाकर छिड़काव कर दें |
  • 5 लीटर देशी गाय के मट्ठे में 5 किलो नीम के पत्ते डालकर 10 दिन तक सडाएं, बाद में नीम की पत्तियों को निचोड़ लें | इस नीम युक्त मिश्रण को छानकर 150 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ के मान के समान रूप से फसल पर छिड़काव करें | इससे इल्ली व माहू का प्रभावी नियंत्रण होता है |
  • 5 लीटर मट्ठे में 1 किलो नीम के पत्ते व धतूरे के पत्ते डालकर 10 दिन सड़ने दें | इसके बाद मिश्रण को छानकर इल्लियों का नियंत्रण करें |
  • 5 किलो नीम के पत्ते 3 लीटर पानी में डालकर उबाल लें | जब आधा रह जाए तब उसे छानकर 150 लीटर पानी में घोल तैयार करें | इस मिश्रण में 2 लीटर गोमूत्र मिलाएं | अब यह मिश्रण एक एकड़ के मान से फसल पर छिडकें |
  • 1/2 किलो ग्राम हरी मिर्च व लहसुन पीसकर 150 लीटर पानी में डालकर छान लें तथा 1 एकड़ के लिए इस घोल का छिडकाव करें |
  • मारुदान, तुलसी (श्याम) तथा गेंदे के पौधे फसल के बीच में लगाने से इल्ली का नियंत्रण होता है |
  • मक्का के भुट्टे से दान निकालने के बाद जो गिन्ड़ियाँ बचती हैं , उन्हें एक मिट्टी के घड़े में इक्कठा कर लें | इस घड़े को खेत में इस प्रकार गाड़ें की घड़े का मुंह जमीन से कुछ बाहर निकला हो | घड़े के ऊपर कपड़ा बांध दें तथा उसमें पानी भर दें | कुछ दिनों में ही आप देखेंगे कि घड़े में दीमक भर गई है | इसके उपरांत घड़े को बाहर निकालकर गरम कर लें, ताकि दीमक समाप्त हो जाए | इस प्रकार के घड़े को खेत में 100 – 100 मीटर की दूरी पर गड़ाकर तथा करीब 5 बार गिन्ड़ियाँ बदलकर यह क्रिया दोहराएँ | खेत से दीमक समाप्त हो जाएगा |
  • सुपारी के आकार की हींग एक कपड़े में लपेटकर तथा पत्थर में बांधकर खेत की ओर बहने वाले पानी की नाली में रख दें | उससे दीमक तथा उगरा रोग नष्ट हो जाएगा |
  • 5 लीटर देशी गाय के मट्टे में 5 किलोग्राम नीम के पत्ते डालकर 10 दिन तक सडाएं, बाद में नीम की पत्तियों को निचोड़ लें | इस नीम युक्त मिश्रण को छानकर 150 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ के मान से समान रूप से फसल पर छिड़काव करें | इससे इल्ली व माहू का प्रभावी नियंत्रण होता है |
  • 5 लीटर मट्ठे में 1 किलोग्राम नीम के पत्ते व धतूरे के पत्ते डालकर 10 दिन सड़ने दें | इसके बाद मिश्रण को छानकर इल्लियों का नियंत्रण करें |
  • 5 किलोग्राम नीम के पत्ते 3 लीटर पानी में डालकर उबाल लें | जब आधा रह जाए तब उसे छानकर 150 लीटर पानी में घोल तैयार करें | इस मिश्रण में 2 लीटर गोमूत्र मिलाएं | अब यह मिश्रण 1 एकड़ के मान से फसल पर छिड़के |
  • ½ किलोग्राम हरी मिर्च व लहसुन पीसकर 150 लीटर पानी में डालकर छान लें तथा 1 एकड़ के लिए इस घोल का छिड़काव करें |
  • टिन की बनी चकरी खेतों में लगाने से भी इल्लियाँ गिर जाती है |
  • 1 लीटर मट्ठे में चने के आकार के हींग के टुकड़े मिलाकरउससे चने का बीजोपचार करें | तत्पश्चात बोनी करें | सोयाबीन, उड़द, मूंग एवं मसूर के बीजों को अधिक गिला न करें |
  • 400 ग्राम नीम के तेल में 100 ग्राम कपड़े धोने वाला पाउडर डालकर खूब फेंटे, फिर इस मिश्रण में 150 लीटर पानी डालकर घोल बनाएं | यह एक एकड़ के लिए पर्याप्त हैं |
  • नीम बीज के नौ ग्राम पाउडर को नौ लीटर पानी में मिलाकर 0.1 प्रतिशत सांद्रता का अवलम्बन बनाया जाता है | इसका छिड़काव करने से यह टिड्डी, आर्मी वर्म तथा पत्ती खाने वाले कीटों को रोकता है अर्थात कीटों को पौधे से दूर रखता हैं |
  • नीम बीज की निम्बोली पाउडर 1.2 किलोग्राम यदि 100 किलोग्राम गेहूं बीज में मिलाया जाए तो यह चावल की सूंडी तथा अन्य कीटों का नियंत्रण होता है |
  • 2 किलोग्राम कुचले हुए नीम बीज को यदि मूंग, चना, चावल के 100 किलोग्राम बीज में मिलाया जाए तो यह क्रमश: 8,9,एवं 12 महीने के लिए पल्स बीटल से सुरक्षा करता है |
  • सीताफल के बीज के तेल का 10 प्रतिशत इमल्शन छ्द्कें या सीताफल के बीज को एक – दो दिन पानी में भिंगोकर रखें और बीज को पीसकर अर्क को छानकर छिड़के | सीताफल के बीज को भूरक – चूर्ण (डस्ट) का उपयोग महो, हरे मच्छर, इल्लियाँ, भृंग इत्यादी कीटों को नियंत्रित करता हैं, यह स्पर्श व उदर विष है |
  • सीताफल व अर्नी के बराबर पत्ते लेकर 1 लीटर पानी में उबलना व मसलकर छानकर रस एकत्र करें , 200 ग्राम रस में 10 लीटर पानी मिलाकर फसल पर छिड़काव करें |
  • 5 किलो धतुरा की पत्ती, तना व जड़ को कूटकर पतले थैले में बांध ले | खेत में सिंचाई करते समय जहाँ पाईप का पानी गिरता है वहां थैले में बंधी दवा को रख दें | इससे दीमक पर नियंत्रण होगा |
  • करंज वनस्पति व तुलसी के रसायन जीवाणु जनित के प्रति नैसर्गिक प्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न होती है | यह रसायन फूल गोभी, मिर्च, टमाटर, के फल – सडन, कपास मिर्च के कोणीय धब्बे व नीबू संतरा, मोसमी के केंकर की रोकथाम करते है |

वानस्पतिक कीट नाशक :-

वनस्पतिकौन सा भाग उपयोगी हैकैसे काम करता हैकिस कीट पर प्रभावशाली
बेखंड (बच्य)जड़संपर्क से गंध विरोधफफूंद
लहसुनगुदाफफूंद नाशकचीटियां
सुगंधी वच्छजड़गंध विरोधीफल मक्खी धान का भूसा तथा सड़न रोग
सिताफलपत्तें / बीजसंपर्कइल्ली
हल्दीजड़ और तनाकीड़ों की भूख मिटाता हैलाल मकड़ी, थ्रिप्स , कई कीट
गवती चायपत्तेंसंपर्क विषमच्छर, कई कीट
बैचन्दीट्यूबरसंपर्क विषकई कीट
इथीपूरा पौधासंपर्क विषकई कीट
तम्बाकूपूरा पौधासंपर्क विषगोभी का पतंग
गिलोयबेलसंपर्क विषगोभी का पतंग
टूनपूरा पौधासंपर्क विषमोला
जंगली अद्रकपूरा पौधासंपर्क विषइल्लियां, मोला
क्वासिया उभारापूरा पौधासंपर्क विषमाहो, आरा मक्खी
एक किलो राख को 10 लीटर पानी में मिलाकर रात भर रखें | उसके उपरांत उसे छानकर उसमें एक लीटर छाछ या मठा मिलायें | इस मिश्रण को तीन गुना पानी में मिलाकर छिड़काव करें | छिड़काव का विपरीत असर पत्तियों पर तो नहीं हैं | इसे देखने के लिए एक – दो पौधों प्र छिड़काव करके सुनिश्चित कर लें | इसके उपयोग से भभूतियाँ व लाल पत्तियों की समस्या का नियंत्रण संभावित है | महुआ व इमली की छाल बराबर मात्रा में लेकर कूटकर रस निकालते हैं, 500 ग्राम रस को 15 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव सुबह – सुबह करें | कपास की डोडी को खाने वाली गुलाबी रंग व धब्बेदार कीड़ों को मरता हैं | 50 ग्राम राख में 25 ग्राम चूना मिलाकर 4 – 5 लीटर पानी में मिलायें व थोड़ा समय रखें | तदोपरांत उसे छानकर डालने से ककड़ी के कीड़ों की रोकथाम में उपयोगी पाया गया है | एक किलोग्राम राख में 10 – 15 .मि.ली. केरोसिन (मट्टी के तेल) को मिलाकर प्रात:काल में पौधों पर भुरकने से रस चूसने वाले कीड़ों की रोकथाम संभव है | आवश्यकता अनुरूप पांच – सात दिन के उपरांत पुन: भुरकाव करें |

जैविक खेती से बीजोपचार :

  • बड़ की मिट्टी में अमृतपानी की इतनी मात्रा मिलाये कि वह घोल बीज पर छिडकने के लायक हो जाये | बीज पर उक्त घोल को छिड़ककर अच्छी तरह मिलाने के लिए हल्के हाथों से मिलावें या सुपे में बीज लेकर उसमें उक्त घोल का छिड़काव करे एवं सूपे को हिलाकर बीज को उपचारित कर या पुराना मटका लेकर उसमें थोड़ा बीज भरकर उसमें घोल का छिड़काव कर मटके को अच्छी तरह हिलावे ताकि घोल का बीज पर अच्छी तरह लेप हो जावे | अच्छी तरह लेप हो जावे | इस लेप दिए हुए बीज को छाया में सुखा लें फिर बुआई करें |
  • अरहर, सोयाबीन, मूंगफली के बीज का छिलका बहुत नरम होता हैं | इसलिए येसे बीजों पर बहुत ही हल्का लेप चढ़ाकर शीघ्र बोआई करना चाहिए |
  • जिन फसलों की रोपाई होती हैं जैसे मिर्ची, टमाटर, बैंगन इत्यादी की रोप की अमृत जड़ों को रोपने के पूर्व 10 मिनट तक अमृत पानी में डुबोकर रखने से बिमारियों का आक्रमण बहुत कम हो जाता है |
  • हल्दी, अदरक, आलू, गन्ना, केला, अरबी इत्यादी फसलों की गांठों या कंदों को अमृत पानी में 10 मिनट तक डुबोकर लगाना चाहिए जिससे स्वस्थ अंकुरण होगा और फसल बिमारियों से बहुत कम प्रभावित होती है | येसा अनुभव किया गया है |

लहसुन का कीड़ों की रोकथाम के लिए उपयोग :

लहसुन गांवों में आसानी से किसानों के पास उपलब्ध हैं | लहसुन के अर्क का उपयोग कीटनाशक के रूप में एलिसीन नामक तत्व होता है एवं कुछ उड़नशील तेल जैसे हायलीक ट्रायसल्फ़ाइड एवं सल्फो आक्साइड होता हैं जो कि फसलों में लगने वाले कीड़ों को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं |

लहसुन का अर्क निकालने की विधि :

85 ग्राम लहसुन को 50 मि.ली. मिट्टी के तेल में मिलाकर 24 घंटे पड़ा रहने दे, फिर इसमें 10 मिली. साबुन का घोल मिलाकर अच्छी तरह हिलावें ताकि पूरा मिश्रण एकाकार हो जावे | तत्पश्चात बारीक छन्नी या कपड़े से छानकर अर्क को एक पात्र में निकालकर उपयोग हेतु भंडारित करके रख दें | उपयोग के समय एक भाग अर्क तथा 19 भाग पानी मिलाकर घोल का छिड़काव प्रात:काल करने से कपास एवं सब्जियों में लगने वाले कीड़ों जैसे माहू एवं इल्लियों को नियंत्रित करता हैं |

लहसुन के साथ हरी मिर्च मिलाकर अर्क बनाने की विधि :

हरी मिर्च एवं लहसुन की समान मात्रा लें | दोनों को पीसकर अर्क तैयार कर लें एवं इस अर्क का एक भाग एवं 200 भाग पानी मिलाकर हैलियोथिस एवं अन्य इल्लियों तथा माहू के नियंत्रण के लिए छिड़काव करें |

अनाज भंडारण में लगने वाले कीटों की रोकथाम के घरेलू उपाय :

  • अनाज को कड़ी धूप में सुखाकर ही भंडारण करना चाहिए | अनाज में 12 से अधिक नमी होने पर फफूंद लगने से अनाज खराब हो जाता है | इस अनाज को इतना सुखाना चाहिए की दाने को दांतों से काटने पर कट्ट सी आवाज आए |
  • दलों को भंडारण से पूर्व दाल पर आधा लीटर मीठा तेल (अरंडी, मूंगफली इत्यादी) 100 किलो दाल में अच्छी तरह मिलाकर दलों पर तेल की परत चढ़ा दें | इससे दालों को बचाया जा सकता है |
  • गेंहू एवं अन्य अनाजों को अच्छी तरह सुखाकर सील बंद कोठियां जिससे हवा का आवागमन न हो, में भंडारण करना चाहिए |
  • अनाजों के भंडारण के लिए अनाज के नीचे नीम की पत्तियां बिछा देने से भी घुन नहीं लगता |
  • जंगली तुलसी (पांचाली) तथा गुलसितारा की पत्तियाँ अनाज में मिलाकर रखने से घुन नहीं लगता |
  • लकड़ी या कंडे की राख (अग्निहोत्र भस्म हो तो बहुत अच्छा) को चने एवं अन्य दालों में मिलाकर रखने से दालों का भृंग (घुन)  नहीं लगता एवं दालें सुरक्षित रहती हैं |
  • लहसुन के दो गांठ को प्रति 5 किलो चावल के हिसाब से चावल में रखने पर घुन, तिलचट्टे एवं चीटियों का आक्रमण नहीं होता |
  • अडूसा की पत्तियाँ भी अनाज भंडारण में उपयोगी हैं |
  • निंबोली चूर्ण अनाज के साथ मिलाकर रखने से कीड़े नहीं लगते |
  • चावल में बोरिक एसिड पावडर मिलाकर रखने से घुन नहीं लगता

Monday, May 29, 2017

आप लोग अपने पूर्वजो के बलिदान को याद नहीं रख सकते हैं जिनकी वजह से आप आज भी हिन्दू हैं

श्री पवन त्रिपाठी जी से साभार
सत्य पर परदा डाल कर कन्फ्यूज करते धूर्त।
ढाई इंच की चमड़े की लचीली ज़ुबान से ब्राह्मणो ठाकुरो वैश्यों और वर्णव्यवस्था को गाली देने में कत्तई मेहनत नहीं लगती, कोई भी दे सकता है। लेकिन मेहनत लगती है 2500 वर्षो के इतिहास का सही अवलोकन करने में जो कोई करना नहीं चाहता।
मैं भली भाँति जनता हूँ की 25-30 से ज्यादा लोग इस लेख को पूरा पढ़ेंगे भी नहीं ,न ही मेरे इस लेख से कोई वैचारिक क्रांति ही आएगी, न ही हिन्दू लड़ना छोड़ेंगे और न ही एक भी "जय भीम"कहने वाला अपनी सोच बदल लेगा। लेकिन जो लोग जानकारी के आभाव में जब कट्टर वर्णव्यवस्था के कारण अपराधबोध से ग्रस्त अपने आपको तर्कहीन महसूस करते हैं, वे इसे अंत तक जरूर पढ़ें। इस लेख को मेरे ब्राह्मण होने से ब्राह्मणों की वकालत न समझ कर,सिर्फ हिन्दुओं की गलतफहमी और आपसी मतभेद दूर करने के नज़रिये से बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर पढ़ें तथा मनन करें की एक पक्षीय और अधूरे इतिहास को पढ़ाने का ही नतीजा है आज हिन्दू समाज में फैली हुई वैमनस्यता तथा मतान्तर।
लेख बहुत लम्बा और बोरिंग न हो जाये इसलिए बहुत संक्षेप में लिखने का प्रयत्न करूँगा ,तथा इतिहास की कुछ पुस्तकों एवं लिंक के नाम भी लेख के बीच में दे रहा हूं , जिन्हे कोई शक शुबा हो वे उन पुस्तकों एवं लिंक का अध्ययन करके अपना मत निर्धारित कर सकते हैं।
 पिछले चार दिनों में एक साथ निम्न चार वाक्यों ने मुझे आज लिखने के लिए मजबूर कर दिया ----------
जय भीम -जय मीम , इस नारे के साथ 100 यू पी की सीटों पर चुनाव लड़ेंगे ओवैसी। ( टाइम्स ऑफ़ इंडिया -3 फरवरी)
चलो हिन्दू धर्म और धर्म ग्रंथो को छोड़ कर नास्तिक हो जाएँ। (फेसबुक पर एक पोस्ट)
कल फेसबुक पर मेरे एक कमेंट के जवाब में यह प्रतिउत्तर आना ---"क्या कमाल है वीदेशी लोग बता रहे है ' जय भारत ' पहले आना चाहीये" ।
या जब कभी मैं जाति प्रथा की कट्टरता के लिए मात्र दो पक्षों को कटघरे में खड़ा पता हूँ और फिर हिन्दुओं को आपस में फेसबुक या ज़मीन पर लड़ता हुआ पता हूँ तो मन कराह उठता है ,कि हम लोगों ने 1500 वर्षों की शारीरिक गुलामी ही नहीं की बल्कि इतने कट्टर मानसिक गुलाम हो गए की जहाँ वो अकबर तो महान हो गया जिसके राज में 500000 लोगों को गुलाम बना मुसलमान बना दिया , लेकिन उसने अपनी सत्ता न मनाने वाले चित्तौड़गढ़ के 38000 राजपूतों को कटवा दिया था , उस का महिमामंडन करने के लिए एकतरफा चलचित्र भी बने ,ग्रन्थ भी लिखे गए और सीरियल भी बने लेकिन महाराणा प्रताप,गुरु गोबिंद सिंह जी ,गुरु तेग बहादुर , रानी लक्ष्मी बाई को दो पन्नो में समेट दिया गया और पन्ना धाय को बिलकुल ही विस्मृत कर दिया गया। इसका सबसे ताजातरीन उदाहरण है, कुछ माह पहले रिलीज हुई फिल्म "हैदर" - - 25 साल के सैन्य बलों के कश्मीर में बलिदान को ढ़ाई घंटे की फिल्म में धो कर रख दिया, और कहीं यह नहीं बताया कि सिर्फ 50 सालों में कश्मीर घाटी के 10 लाख हिंदू 3000 के अंदर कैसे सिमट गये, उर्दू राष्ट्रीय सहारा समाचार पत्र के पूर्व मुख्य सम्पादक "अजीज बर्नी" ने कसाब के पकड़े जाने के बाद एक पुस्तक लिखी "RSS का षड्यंत्र" , जिसका विमोचन कांग्रेस के उपाध्यक्ष "दिग्विजय सिंह" ने किया था, उस पुस्तक के अनुसार 26/11 का मुम्बई हमला RSS ने करवाया था। अगर इसी पुस्तक को राज संरक्षण प्राप्त हो जाये और स्कूलों में पढ़ाई जाने लगे तो 50 साल बाद RSS को सफाई देनी मुश्किल पड़ जायेगी। स्कूली किताबों से इस इतिहास को कैसे हटाया गया यह जानने के लिए "NCERT controversy",and keywords like that Google search कर लें।
सबसे अहम बात यह है कि यह इतिहास लिखा किसने ??? भारत के सबसे बुजुर्ग इतिहासकार "राजेन्द्र लाल मित्रा 1822 में पैदा हुए थे। 1880 के दशक तथा 1900 दशक में पहली बार वैज्ञानिक विधि से इतिहास का अवलोकन किया जाये इस पर चर्चा हुई थी। 1899 में रबिन्द्र नाथ टैगोर पहली बार "भारती " नाम की पत्रिका में "अक्षय कुमार मित्रा" नाम के नवोदित इतिहासकार के Oitihashik chitra (Historical Vignettes), नाम की शोध पत्रिका की प्रशंसा करते हुए एक लेख लिखा था " Enthusiasm for History" । 1919 बंगाल यूनिवर्सिटी पहली बार आधुनिक एवं मध्यकालीन इतिहास का परास्नातक पाठयक्रम शुरू किया गया ,1920 से 1930 तक के काल खंड में अन्य विश्वविद्यालयों में इतिहास के विभाग खोले गए तथा स्नातक स्तर पर इतिहास पढने की शुरुआत की गयी। तो फिर प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था पर आधिकारिक इतिहास किसने लिखा और किस आधार पर लिखा??
अंग्रेजों ने इतिहास और त्थयों को तोड़ा मरोड़ा और एक नया इतिहास रच दिया जिसके चलते आज के अम्बेडकरवादी अन्य लोगों को विदेशी और खुद को भारत का मूल नागरिक बताते हैं।वर्तमान में अम्बेडकर जी के जो अनुयायी, अंग्रेज़ों की फुट डालो और राज करो की राजनीती के तहत विदेशी आर्यों और मूलनिवासियों का मुद्दा उठा रहे हैं , वे अम्बेडकर जी के शोध पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। "Ambedkar W&S1948, Chapter Six", में रिसले की " Aryan Invasion Theory" का "Nasal Index Data" के आधार पर भंडा फोड़ते हुए अम्बेडकर जी ने साफ़ साफ़ लिखा कि यदि " ब्राह्मण आर्य थे तो शूद्र भी आर्य थे , यदि ब्राह्मण आर्य नहीं थे तो शूद्र भी आर्य नहीं थे, और "The Untouchables, Who were they, and why they became" में डॉ अम्बेडकर ने क्षत्रिय कैसे शूद्र बने या शूद्र राजा कैसे अछूत बने इसके कारणों की विवेचना की है।
अम्बेदकरवादी " Aryans, Jews, Brahmins :Theorising Authority Through Myths Of Identity " By Dorothy M.Figueira, published by Navayana,अवश्य पढ़ लें तथा जो बहुत से अम्बेडकरवादी कमेंट बॉक्स में हिंदी में लिखने की बात करते हैं, उनके लिए यह लिंक पढ़ना मुश्किल होगा, अतः उनसे निवेदन है की किसी से पढ़वा कर अपना भ्रम ज़रूर दूर कर लें अन्यथा , आप के दिल में अन्य जातियों के लिए अंग्रेजों द्वारा भरा गया ज़हर हमेशा भरा रहेगा जो की भविष्य में देश के लिए अहितकर होगा।
बात शुरू करता हूँ , उन अतिज्ञानियों के ज्ञान से जिन्होंने शायद ही कभी "मनु समृति"का अध्ययन किया होगा लेकिन जयपुर हाई कोर्ट परिसर में महर्षि मनु की 28 जून 1989 को मूर्ती लगने पर विरोध प्रगट किया और 28 जुलाई 1989 को हाई कोर्ट की फुल बेंच ने अपने पूरे ज्ञान का परिचय देते हुए 48 घंटे में मूर्ती हटाने का आदेश पारित कर दिया।लेकिन दूसरी तरफ से भी अपना पक्ष रखा गया और तीन दिन के लगातार बहस के दौरान मनु के आलोचक पक्ष के वकील मनु को गलत साबित नहीं कर पाये और एक अंतरिम आदेश के साथ अपना पूर्व में मूर्ती हटाने का आदेशहाई कोर्ट को स्थगित करना पड़ा । मूर्ती आज भी वहीँ है।
अब इससे पीछे चलते हैं वर्तमान के दलित मसीहा, रामविलास पासवान पर --- क्या उन्होंने अपनी पहली पत्नी को तलाक दे कर उन पर अत्याचार नहीं किया??? या यहाँ पर भी नीना शर्मा (एक पंजाबी ब्राह्मण),उनकी दूसरी पत्नी जिसने एक दलित से शादी की ने ब्राह्मणत्व की धारणा को तोड़ कर एक दलित से शादी नहीं की।
इससे और पीछे चलते हैं, भीम राव अम्बेडकर पर -- "जय भीम" तो बहुत बोला जाता है ,क्या डा. सविता , आंबेडकर जी की पत्नी जो की पुणे के कट्टर ब्राह्मण परिवार से थीं ,उन्होंने क्या जाती पाती के बंधनों की परवाह की थी। और अम्बेडकरवादियों ने बहुत कुशलता से आंबेडकर द्वारा रचित The Buddha And His Dharma जो की उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुई की मूल प्रस्तावना जो की उन्होंने 15 मार्च 1956 लिखी थी ,को छुपा दिया जिसमे उन्होंने अपनी ब्राह्मण पत्नी और उन ब्राह्मण अध्यापकों ( महादेव आंबेडकर, पेंडसे, कृष्णा जी अर्जुन कुलेसकर ,बापूराव जोशी ) की हृदयस्पर्शी चर्चा की थी। बहुत आसान है महादेव आंबेडकर का भीमराव को अपने घर में खाना खिलाना भूलना ,बहुत आसान है ब्राह्मण सविता देवी का जीवन भुलाना और बहुत आसान है कृष्णा जी अर्जुन कुलेसकर नामक उस ब्राह्मण को भुलाना जिसने भीमराव को "महात्मा बुद्ध " पर पढ़ने को पुस्तक दी और भीमराव बौधि हो गए।
उपरोक्त उदाहरणों से मैं यह सिद्ध करने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ ,की इस समय में वर्णव्यवस्था का कट्टरपन अपने चरमोत्कर्ष पर नहीं था। बहुत विद्रूप थी इस समय और इससे पहले वर्णव्यवस्था। लेकिन वर्णव्यवस्था में विद्रूपता और कट्टरपन क्यों कब और कैसे आया ,क्या कभी किसी ने वामपंथियों द्वारा रचित इतिहास के इतर कुछ पढ़ने की कोशिश की ???? जो और जितना पढ़ाया गया उसी को समग्र मान कर चल पढ़े भेड़चाल और लगे धर्मग्रंथों और उच्च जातियों को गलियां देने।
मनु स्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों में वर्णव्यवस्था "कर्म आधारित" थी और कर्म के आधार पर कोई भी अपना वर्ण बदलने के लिए स्वतंत्र था। आज का समाज जाति बंधन तो छोड़िये किसी भी बंधन को न स्वीकारने के दसियों तर्क कुतर्क दे सकता है। लेकिन वर्णव्यस्था पर उंगली उठाने वालों के लिए " vedictruth: वेद और शूद्र " vedictruth.blogspot.com में एक सारगर्भित लेख है।इसके बाद भी कोई अगर कुतर्क दे तो उसे मानव मन का अति कल्पनाशील होना ही मानूंगा।
इतिहास में बहुत पीछे न जाते हुए, चन्द्रगुप्त मौर्य (340 BC -298 BC) से शरुआत करते हुए बताना चाहूंगा, कि चन्द्रगुप्त के प्रारंभिक जीवन के बारे में तो इतिहासकारों को बहुत कुछ नहीं मालूम है परन्तु ,"मुद्राराक्षस" में उसे कुलविहीन बताया गया है। जो की बाद में चल कर यदि उस समय वर्णव्यवस्था थी तो उसे तोड़ते हुए अपने समय का एक शक्तिशाली राजा बना। इसी समय "सेल्यूकस" के दूत "मैगस्थनीज़" के यात्रा वृतांत के अनुसार उस समय इसी चतुर्वर्ण में ही कई जातियाँ 1) दार्शनिक 2) कृषि 3)सैनिक 4) निरीक्षक /पर्यवेक्षक 5) पार्षद 6) कर निर्धारक 7) चरवाहे 8) सफाई कर्मचारी और 9 ) कारीगर हुआ करते थे। लेकिन चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री "कौटिल्य" के अर्थशास्त्र एवं नीतिसार अनुसार, किसी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार की कठोर सज़ा थी। यहाँ तक की वैसे तो उस समय दास प्रथा नहीं थी लेकिन चाणक्य के अनुसार यदि किसी को मजबूरी में खुद दास बनना पड़े तो भी उससे कोई नीच अथवा अधर्म का कार्य नहीं करवाया जा सकता था।ऐसा करने की स्थिति में दास दासता के बन्धन से स्वमुक्त हो जाता था।सब अपना व्यवसाय चयन करने के लिए स्वतंत्र थे तथा उनसे यह अपेक्षा की जाती थी वे धर्मानुसार उनका निष्पादन करेंगे । मौर्य वंश के इतिहास में कहीं भी शूद्रों के साथ अमानवीय या भेदभावपूर्ण व्यवहार का लेखन पढ़ने में नहीं आया। जब दासों के प्रति इतनी न्यायोचित व्यवस्था थी , तो आम जन तो नीतिशास्त्रों से शासित किये ही जाते थे। एक बात का और उल्लेख यहाँ करना चाहूंगा,इस समय तक वैदिक भागवत धर्म का अधिकांश लोग पालन करते थे लेकिन बौद्ध तथा जैन धर्मों में अपने प्रवर्तकों की सुन्दर सुन्दर मूर्तियों की पूजा की देखा देखि इसी समय पर वैदिक धर्म में मूर्ती पूजा का पर्दुभाव हुआ। इसी समय पर भगवानों के सुन्दर सुन्दर रूपों की कल्पना कर के उन्हें मंदिरों में प्रतिष्ठित किया जाने लगा।
जी इस त्तथ्य पर दुबारा गौर करें, इस समय तक हिन्दू वैदिक धर्म का पालन करते हुए हवन यज्ञो द्वारा निर्गुण तथा निराकार परमेश्वर की पूजा किया करते थे। और मनुस्मृति को पानी पी पी कर कोसने वालों को मालूम होना चाहिए कि मनु स्मृति इस काल से बहुत पहले तब लिखी गयी थी जब निराकार ईश्वर को पूजा जाता था। मुख से ब्राह्मण पैदा हुए थे मनु का सांकेतिक तात्पर्य था कि सुवचन और सुबुद्धि के गुणों के द्वारा ब्राह्मणो का जन्म हुआ। यह एक सांकेतिक तात्पर्य था कि भुजाओं के बल के द्योतक क्षत्रिय बने। और यही सांकेतिक तात्पर्य था कि जीविकोपार्जन के कर्मो से वैश्यों का जन्म हुआ और श्रम का काम करने वाले चरणो से शूद्रों का जन्म हुआ। या जिनमे ये गुण जैसे हैं वे उन वर्णों में गुणों और कर्मों के आधार पर विभाजित किये जाएँ।
 यहीं यदि मनु श्रम को भुजाओं से जोड़ कर लिख देते कि भुजाओं से शूद्रो का जन्म हुआ तो क्या चरणों से युद्ध में भाग लेने वाले क्षत्रिय नीच वर्ण के हो जाते ????? दोष निकलने वाले उसमे भी दोष निकल लेते क्योंकि उन्हें न अपनी अकर्मण्यता में कोई दोष नज़र आता है और न वे इतिहास और तदोपरांत के घटनाक्रम में अपनी अज्ञानता के चलते कोई दोष ढूंढ पाते हैं।
चन्द्रगुप्त मौर्य के लगभग 800 वर्ष पश्चात चीनी तीर्थयात्री "फा हियान" चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय भारत आया उसके अनुसार वर्णव्यवस्था बहुत कठोर नहीं थी,ब्राह्मण व्यापर ,वास्तुकला तथा अन्य प्रकार की सेवाएं दिया करते थे ,क्षत्रिय वणिजियक एवं औद्योगिक कार्य किया करते थे ,वैश्य राजा ही थे ,शूद्र तथा वैश्य व्यापर तथा खेती बड़ी करते थे। कसाई, शिकारी ,मच्छली पकड़ने वाले,माँसाहार करने वाले अछूत समझे जाते थे तथा "वे" नगर के बाहर रहते थे। गंभीर अपराध न के बराबर थे ,अधिकांश लोग शाकाहारी थे। इसीलिए इसे भारतवर्ष का स्वर्ण काल भी कहा जाता है।
यही बातें "हुएंन- त्सांग "ने वर्ष 631-644 AD तक अपने भारत भ्रमण के दौरान लिखीं।उस समय विधवा विवाह पर प्रतिबन्ध नहीं था, सती प्रथा नहीं थी, पर्दा प्रथा नहीं थी , दास प्रथा नहीं थी , हिजड़े नहीं बनाये जाते थे , जौहर प्रथा नहीं थी ,ठगी गिरोह नहीं हुआ करते थे, क़त्ल नहीं हुआ करते थे ,बलात्कार नहीं हुआ करते थे, सभी वर्ण आपस में बहुत सौहाद्रपूर्ण तरीके से रहते थे और ..........…… वर्ण व्यवस्था इतनी कट्टर नहीं हुआ करती थी।यह भारत का स्वर्णकाल कहलाता है। फिर ये सारी कुरीतियां वैदिक धर्म में कहाँ से आ गयीं।
इसी स्वर्णकाल के समय लगभग वर्ष 500 AD में जो तीन विशेष कारण जिनकी वजह से वैदिक धर्म का लचीलापन खत्म होना शुरू हुआ, मेरी समझ से वे थे, मध्य एशिया से जाहिल हूणों के आक्रमण तथा उनका भारतीय समाज में घुलना मिलना, बौद्ध धर्म में "वज्रायन" सम्प्रदाय जिसके भिक्षु एवं भिक्षुणियों ने अश्लीलता की सीमाएं तोड़ दी थी, तथा बौद्धों द्वारा वेद शिक्षा बिल्कुल नकार दी गई थी एवं "चर्वाक" सिद्धांत पंच मकार - - मांस,मछली, मद्य, मुद्रा और मैथुन ही जीवन का सार थे का जनसाधारण में लोकप्रिय होना।
3000 साल पुराना ,शूद्रों पर अत्याचारों का राग अलाप कर #मनुस्मृति_जलाने वालों के लिए तत्कालीन हिन्दू समाज के विषय में इस मुस्लिम इतिहासकार ने क्या देखा उसे पढ़ना नितांत आवश्यक है। वर्ष 1030 में महमूद ग़ज़नवी के समय में #अल_बरूनी ( 5 सितम्बर 973 -13 दिसम्बर 1048) महमूद ग़ज़नवी के साथ भारत आया और #1030 तक "किताब तारीख अल हिन्द " पूरी कर ली।) क्या लिखता है कि --- पारम्परिक हिन्दू समाज चार वर्णो और अंत्यज ( जो किसी जाति में नहीं आते थे) में विभाजित हुआ करता था , लेकिन उसने उच्च जातियों द्वारा नीच जातियों पर अत्याचारों का कोई ज़िक्र नहीं किया। बावजूद इसके कि चारों वर्ण एक दूसरे से भिन्न थे लेकिन वे शहरों और गांवों में एक साथ रहते थे और एक दूसरे के घरों में घुला मिला करते थे।
इस सन्दर्भ में नेहरू और वामपंथियों पर भारतीय मूल के ब्रिटेन में रहने वाले प्रख्यात लेखक --V.S Naipaul ने कटाक्ष करते हुए "The Pioneer" समाचार पत्र में एक लेख लिखा ---- " आप अपने इतिहास को नज़रअंदाज़ कैसे कर सकते हैं ?? लेकिन स्वराज और आज़ादी की लड़ाई ने इसे नज़रअंदाज़ किया है। आप जवाहर लाल नेहरू की Glimpses of World History पढ़ें , ये भारतीय पौराणिक कथाओं के बारे में बताते बताते आक्रान्ताओं के आक्रमण पर पहुँच जाता है। फिर चीन से आये हुए तीर्थयात्री बिहार नालंदा और अनेकों जगह पहुँच जाते हैं। पर आप यह नहीं बताते की फिर क्या हुआ ,क्यों आज अनेकों जगह, जहाँ का गौरवपूर्ण इतिहास था खंडहर क्यों हैं ??? आप यह नहीं बताते की भुबनेश्वर, काशी और मथुरा को कैसे अपवित्र किया गया। "
वर्णव्यवस्था के लचीलेपन के ख़त्म होने के एक से बढ़ कर एक कारण हैं, जो मेरी नज़र में सबसे अहम कारण है उसे सबसे अंत में लिखूंगा।
 लेकिन जो इतिहास हमें पढ़ाया गया है ,उसमे सोमनाथ के मंदिर को लूटना तो बताया गया है परन्तु महमूद ग़ज़नवी ने कंधार के रास्ते आते और जाते हुए मृत्यु का क्या तांडव खेला कभी नहीं बताया जाता। उसमे 1206 के मोहम्मद गौरी से लेकर 1857 तक के बहादुर शाह ज़फर का अधूरा चित्रण ही आपके सामने किया गया है, पूरा सच शायद बताने से मुस्लिम वर्ग नाराज़ हो जाता। और वैसे भी जैसा की वीर सावरकर ने 1946 लिख दिया था, कि लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के लिए तत्कालीन कांग्रेस के नेताओं ने यही रणनीति बनायीं थी की ,हिन्दुओं में फूट डाली जाये और मुस्लिमों का तुष्टिकरण किया जाये। इसी का आज यह दुष्परिणाम है की न तो मुस्लिम आक्रान्ताओं का पूरा इतिहास ही पढ़ाया गया और आज हिन्दू पूरी जानकारी के आभाव में वर्णव्यवस्था के नाम पर चाहे सड़क हो चाहे फेसबुक कहीं पर भी भिड़ जाते हैं।
जी हाँ हमारा इतिहास यह नहीं बताता की वर्ष 1000 AD की भारत की जनसँख्या 15 करोड़ से घट कर वर्ष 1500 AD में 10 करोड़ क्यों रह गयी थी ??? नीचे जो लिख रहा हूँ उसमे जबरन धर्म परिवर्तन, बलात्कार ,कत्ले आम, कम उम्र के लड़कों का हिजड़ा बनाया जाना आप खुद जोड़ते जाईयेगा।
( नीचे दिए हुए तथ्य ,1)Islam's India slave Part-1,by M.A Khan, 2)"The Legacy of Jihad: Islamic Holy war and the fate of non non -Muslims By A.G Bostom.and 3)Slave trading During Mulim rule, by K.S Lal 4),‘The sword of the prophet.’ By Trifkovic, S. - - Regina Orthodox Press, Inc. 2002.
से लिए गए हैं )
उपरोक्त पुस्तक जो की कई अन्य पुस्तकों का निचोड़ हैं , का सारांश नीचे लिख रहा हूँ ---------
1 )महमूद ग़ज़नवी ---वर्ष 997 से 1030 तक 2000000 , बीस लाख सिर्फ बीस लाख लोगों को महमूद ग़ज़नवी ने तो क़त्ल किया था और 750000 सात लाख पचास हज़ार लोगों को गुलाम बना कर भारत से ले गया था 17 बार के आक्रमण के दौरान (997 -1030). ---- जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया , वे शूद्र बना कर इस्लाम में शामिल कर लिए गए। इनमे ब्राह्मण भी थे क्षत्रिय भी वैश्य भी और शूद्र तो थे ही।
2 ) दिल्ली सल्तनत --1206 से 1210 ---- कुतुबुद्दीन ऐबक --- सिर्फ 20000 गुलाम राजा भीम से लिए थे और 50000 गुलाम कालिंजर के राजा से लिए थे। जो नहीं माना उनकी बस्तियों की बस्तियां उजाड़ दीं। गुलामों की उस समय यह हालत हो गयी कि गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी सैंकड़ों हिन्दू गुलाम हुआ करते थे ।
3) इल्ल्तुत्मिश ---1236-- जो भी मिलता उसे गुलाम बना कर, उस पर इस्लाम थोप देता था।
4) बलबन ----1250-60 --- ने एक राजाज्ञा निकल दी थी , 8 वर्ष से ऊपर का कोई भी आदमी मिले उसे मौत के घाट उत्तर दो। महिलाओं और लड़कियों वो गुलाम बना लिया करता था। उसने भी शहर के शहर खाली कर दिए।
5) अलाउद्दीन ख़िलजी ---- 1296 -1316 -- अपने सोमनाथ की लूट के दौरान उसने कम उम्र की 20000 हज़ार लड़कियों को दासी बनाया, और अपने शासन में इतने लड़के और लड़कियों को गुलाम बनाया कि गिनती कलम से लिखी नहीं जा सकती। उसने हज़ारों क़त्ल करे थे और उसके गुलमखाने में 50000 लड़के थे और 70000 गुलाम लगातार उसके लिए इमारतें बनाने का काम करते थे। इस समय का ज़िक्र आमिर खुसरो के लफ़्ज़ों में इस प्रकार है " तुर्क जहाँ चाहे से हिंदुओं को उठा लेते थे और जहाँ चाहे बेच देते थे।
6) मोहम्मद तुगलक ---1325 -1351 ---इसके समय पर इतने कैदी हो गए थे की हज़ारों की संख्या में रोज़ कौड़ियों के दाम पर बेचे जाते थे।
7) फ़िरोज़ शाह तुगलक -- 1351 -1388 -- इसके पास 180000 गुलाम थे जिसमे से 40000 इसके महल की सुरक्षा में लगे हुए थे। इसी समय "इब्न बतूता " लिखते हैं की क़त्ल करने और गुलाम बनाने की वज़ह से गांव के गांव खाली हो गए थे। गुलाम खरीदने और बेचने के लिए खुरासान ,गज़नी,कंधार,काबुल और समरकंद मुख्य मंडियां हुआ करती थीं। वहां पर इस्तांबुल,इराक और चीन से से भी गुलाम ल कर बेचे जाते थे।
8) तैमूर लंग --1398/99 --- As per "Malfuzat-i-Taimuri" इसने दिल्ली पर हमले के दौरान 100000 गुलामों को मौत के घाट उतरने के पश्चात ,2 से ढ़ाई लाख कारीगर गुलाम बना कर समरकंद और मध्य एशिया ले गया।
9) सैय्यद वंश --1400-1451 -- हिन्दुओं के लिए कुछ नहीं बदला, इसने कटिहार ,मालवा और अलवर को लूटा और जो पकड़ में आया उसे या तो मार दिया या गुलाम बना लिया।
10) लोधी वंश-1451--1525 ---- इसके सुल्तान बहलूल ने नीमसार से हिन्दुओं का पूरी तरह से वंशनाश कर दिया और उसके बेटे सिकंदर लोधी ने यही हाल रीवां और ग्वालियर का किया।
11 ) मुग़ल राज्य --1525 -1707 --- बाबर -- इतिहास में ,क़ुरान की कंठस्थ आयतों ,कत्लेआम और गुलाम बनाने के लिए ही जाना जाता है।
12 ) अकबर ---1556 -1605 ---- बहुत महान थे यह अकबर महाशय , चित्तोड़ ने जब इनकी सत्ता मानाने से इंकार कर दिया तो इन्होने 24 फरवरी 1568 को एक दिन में 30000 चित्तौड़ में पकडे हुए हिन्दुओं का क़त्ल किया था। और इसी दिन 8000 चित्तौड़ की महिलाओं ने , मुगलों के हाथ पड़ कर बेइज़्ज़त न होने के कारण एक साथ जौहर किया था। । कहते हैं की इन्होने गुलाम प्रथा रोकने की बहुत कोशिश की फिर भी इसके हरम में 5000 महिलाएं थीं। इनके समय में ज्यादातर लड़कों को खासतौर पर बंगाल की तरफ अपहरण किया जाता था और उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था। इनके मुख्य सेनापति अब्दुल्लाह खान उज़्बेग, की अगर मानी जाये तो उसने 500000 पुरुष और गुलाम बना कर मुसलमान बनाया था और उसके हिसाब से क़यामत के दिन तक वह लोग एक करोड़ हो जायेंगे।
13 ) जहांगीर 1605 --1627 --- इन साहब के हिसाब से इनके और इनके बाप के शासन काल में 5 से 600000 मूर्तिपूजकों का कत्ल किया गया था औरसिर्फ 1619-20 में ही इसने 200000 हिन्दू गुलामों को ईरान में बेचा था।
14) शाहजहाँ 1628 --1658 ----इसके राज में इस्लाम बस ही कानून था, या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उत्तर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतरा था। जवान लड़कियां इसके हरम भेज दी जाती थीं। इसके हरम में सिर्फ 8000 औरतें थी।
15) औरंगज़ेब--1658-1707 -- इसके बारे में तो बस इतना ही कहा जा सकता है की ,जब तक सवा मन जनेऊ नहीं तुलवा लेता था पानी नहीं पीता था। बाकि काशी मथुरा और अयोध्या इसी की देन हैं। मथुरा के मंदिर 200 सालों में बने थे इसने अपने 50 साल के शासन में मिट्टी में मिला दिए। गोलकुंडा में 1659 सिर्फ 22000 लड़कों को हिजड़ा बनाया था।
16)फर्रुख्सियार -- 1713 -1719 ,यही शख्स है जो नेहरू परिवार को कश्मीर से दिल्ली ले कर आया था, और गुरदासपुर में हजारों सिखों को मार और गुलाम बनाया था।
17) नादिर शाह --1738 भारत आया सिर्फ 200000 लोगों को मौत के घाट उत्तर कर हज़ारों सुन्दर लड़कियों को और बेशुमार दौलत ले कर चला गया।
18) अहमद शाह अब्दाली --- 1757-1760 -1761 ----पानीपत की लड़ाई में मराठों युद्ध के दौरान हज़ारों लोग मरे ,और एक बार में यह 22000 लोगों को गुलाम बना कर ले गया था।
19) टीपू सुल्तान ---1750 - 1799 ----त्रावणकोर के युद्ध में इसने 10000 हिन्दू और ईसाईयों को मारा था एक मुस्लिम किताब के हिसाब से कुर्ग में रहने वाले 70000 हिन्दुओं को इसने मुसलमान बनाया था।
ऐसा नहीं कि हिंदुओं ने डटकर मुकाबला नहीं किया था, बहुत किया था, उसके बाद ही इस संख्या का निर्धारण इतिहासकारों ने किया जो कि उपरोक्त दी गई पुस्तकों एवं लिंक में दिया गया है ।
गुलाम हिन्दू चाहे मुसलमान बने या नहीं ,उन्हें नीचा दिखाने के लिए इनसे अस्तबलों का , हाथियों को रखने का, सिपाहियों के सेवक होने का और बेइज़्ज़त करने के लिए साफ सफाई करने के काम दिए जाते थे। जो गुलाम नहीं भी बने उच्च वर्ण के लोग वैसे ही सब कुछ लूटा कर, अपना धर्म न छोड़ने के फेर में जजिया और तमाम तरीके के कर चुकाते चुकाते समाज में वैसे ही नीचे की पायदान शूद्रता पर पहुँच गए। जो आतताइयों से जान बचा कर जंगलों में भाग गए जिन्दा रहने के उन्होंने मांसाहार खाना शुरू कर दिया और जैसी की प्रथा थी ,और अछूत घोषित हो गए।
 Now come to the valid reason for Rigidity in Indian Caste System--------
वर्ष 497 AD से 1197 AD तक भारत में एक से बढ़ कर एक विश्व विद्यालय हुआ करते थे, जैसे तक्षिला, नालंदा, जगदाला, ओदन्तपुर। नालंदा विश्वविद्यालय में ही 10000 छात्र ,2000 शिक्षक तथा नौ मंज़िल का पुस्तकालय हुआ करता था, जहाँ विश्व के विभिन्न भागों से पड़ने के लिए विद्यार्थी आते थे। ये सारे के सारे मुग़ल आक्रमण कारियों ने ध्वस्त करके जला दिए। न सिर्फ इन विद्या और ज्ञान के मंदिरों को जलाया गया बल्कि पूजा पाठ पर सार्वजानिक और निजी रूप से भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इतना तो सबने पढ़ा है ,लेकिन उसके बाद यह नहीं सोचा कि अपने धर्म को ज़िंदा रखने के लिए ज्ञान, धर्मशास्त्रों और संस्कारों को मुंह जुबानी पीढ़ी दर पीढ़ी कैसे आगे बढ़ाया गया । सबसे पहला खतरा जो धर्म पर मंडराया था ,वो था मलेच्छों का हिन्दू धर्म में अतिक्रमण / प्रवेश रोकना। और जिसका जैसा वर्ण था वो उसी को बचाने लग गया। लड़कियां मुगलों के हरम में न जाएँ ,इसलिए लड़की का जन्म अभिशाप लगा ,छोटी उम्र में उनकी शादी इसलिए कर दी जाती थी की अब इसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी इसका पति संभाले, मुसलमानों की गन्दी निगाह से बचने के लिए पर्दा प्रथा शुरू हो गयी। विवाहित महिलाएं पति के युद्ध में जाते ही दुशमनों के हाथों अपमानित होने से बचने के लिए जौहर करने लगीं ,विधवा स्त्रियों को मालूम था की पति के मरने के बाद उनकी इज़्ज़त बचाने कोई नहीं आएगा इसलिए सती होने लगीं, जिन हिन्दुओं को घर से बेघर कर दिया गया उन्हें भी पेट पालने के लिए ठगी लूटमार का पेशा अख्तिया करना पड़ा। कौन सी विकृति है जो मुसलमानों के अतिक्रमण से पहले इस देश में थी और उनके आने के बाद किसी देश में नहीं है। हिन्दू धर्म में शूद्र कृत्यों वाले बहरूपिये आवरण ओढ़ कर इसे कुरूप न कर दें इसीलिए वर्णव्यवस्था कट्टर हुई , इसलिए कोई अतिशियोक्ति नहीं कि इस पूरी प्रक्रिया में धर्म रूढ़िवादी हो गया या वर्तमान परिभाषा के हिसाब से उसमे विकृतियाँ आ गयी। मजबूरी थी वर्णों का कछुए की तरह खोल में सिकुड़ना।
जैसा कि जवाहर लाल नेहरू जो की मुस्लिमों के पक्षधर थे ने भी अपनी पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया "में हिन्दू वर्णव्यवस्था के सम्बन्ध में लिखा है ---- 1)There is truth in that and its origin was probably a device to keep the foreign conquerors apart from and above the conqured people.Undoubtdly in its growth it has acted in that way, though originally there may have been a good deal of FLEXIBILITY about it. Yet that is only a part of the truth and it does not explain its power and cohesiveness and the way it has lasted down to the present day.It survived not only the powerful impact of Buddhism and Mughal rule and the spread of Islam, ------------ page 264- .
यहीं से वर्ण व्यवस्था का लचीलापन जो की धर्मसम्मत था ख़त्म हो गया। इसके लिए आज अपने को शूद्र कहने वाले ब्राह्मणो या क्षत्रियों को दोष देकर अपने नए मित्रों को ज़िम्मेदार कभी नहीं ठहराते हैं । वैसे जब आप लोग डा. सविता माई(आंबेडकर जी की ब्राह्मण पत्नी) के संस्कारों को ज़बरदस्ती छुपा सकते हैं,
आप लोग अपने पूर्वजो के बलिदान को याद नहीं रख सकते हैं जिनकी वजह से आप आज भी हिन्दू हैं तो आप आज उन्मुक्त कण्ठ से ब्राह्मणो और क्षत्रिओं को गाली भी दे सकते हैं,जिनके पूर्वजों ने न जाने इस धर्म को ज़िंदा रखने के लिए क्या क्या कष्ट सहे। पूरे के पूरे मज़हब ख़त्म हो कर दिए गए दुनिया के नक़्शे से, लेकिन आप वो नहीं देखना चाहते। कहाँ चला गया पारसी मज़हब अपनी जन्म भूमि ईरान से ??? क्या क्या ज़ुल्म नहीं सहे यहूदियों और यज़ीदियों ने अपने आप को ज़िंदा रखने के लिए। कहाँ चला गया बौद्ध धर्म का वो वटवृक्ष जिसकी शाखाएँ बिहार से लेकर अफगानिस्तान मंगोल चीन इंडोनेशिया तक में फैली हुईं थीं ??? कौन सा मज़हब बचा मोरक्को से लेकर मलेशिया तक ???? सिर्फ और सिर्फ बचे तो सनातन वैदिक धर्म को मानने वाले। शर्म आनी चाहिए उन लोगों को जो अपने पूर्वजों के बलिदानों को भूल कर, इस बात पर गर्व नहीं करते कि आज उनका धर्म ज़िंदा है मगर वो रो रहे हैं कि वर्णव्यवस्था ज़िंदा क्यों है। नीचे दिए गए लिंक में पढ़ लीजिये, कि जो कुछ ऊपर लिखा है वो अन्य देशों में भी हुआ वहां के मज़हब मिट गए और आपका धर्म ज़िंदा है।

और आज जिस वर्णव्यवस्था में हम विभाजित हैं उसका श्रेय 1881 एवं 1902 की अंग्रेजों द्वारा कराई गयी जनगणना है जिसमें उन्होंने demographic segmentation को सरल बनाने के लिए हिंदु समाज को इन चार वर्णों में चिपका दिया।
वैसे भील, गोंड, सन्थाल और सभी आदिवासियों के पिछड़ेपन के लिए क्या वर्णव्यवस्था जिम्मेदार है?????
कौन ज़िम्मेदार है इस पूरे प्रकरण के लिए अनजाने या भूलवश धर्म में विकृतियाँ लाने वाले पंडित ??? या उन्हें मजबूर करने वाले मुसलमान आक्रांता ??? या आपसे सच्चाई छुपाने वाले इतिहास के लेखक ???? कोई भी ज़िम्मेदार हो पर हिन्दू भाइयो अब तो आपस में लड़ना छोड़ कर भविष्य की तरफ एक सकारात्मक कदम उठाओ। अगर पिछड़ी जाति के मोदी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो उतने ही पथ तुम्हारे लिए भी खुले हैं ,मान लिया कल तक तुम पर समाज के बहुत बंधन थे पर आज तो नहीं हैं ।
अगर आज हिन्दू एक होते तो आज कश्मीर घाटी में गिनती के 2984 हिन्दू न बचते और 4.50 लाख कश्मीरी हिंदू 25 साल से अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह न रह रहे होते और 16 दिसंबर के निर्भया काण्ड ,मेरठ काण्ड ,हापुड़ काण्ड …………गिनती बेशुमार है, इस देश में न होते।
वैसे सबसे मजे की बात यह है कि जिनके पूर्वजों ने ये सब अत्याचार किए, 800 साल तक राज किया, वो तो पाक साफ हो कर अल्पसंख्यकों के नाम पर आरक्षण भी पा गये और कटघरे में खड़े हैं, कौन????? जवाब आपके पास है ।।
(नोट-यह शोधकार्य मेरा लिखा नही है।पर मूल लेखक को मैं आभार प्रकट करता हूँ कि उनहोंने सत्य के लिए परिश्रम किया और प्रयत्नशील है।

Saturday, May 20, 2017

National pearl farming Training

Punjab मे प्रशिक्षण कि तारीख 10&11/06/17प्रशिक्षण सुबह 10:30बजे से सुरु होगा 5:00तक और दूसरे दिन 9:30से शाम 5:00बजे तक 
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गधी के दूध की बढ़ी मांग, हजारों में मिलता है एक लीटर

गधी के दूध की बढ़ी मांग, हजारों में मिलता है एक लीटर
दक्षिण पूर्वी यूरोप के देश मोंटेनीग्रो में इन दिनों गधी के दूध की मांग खासी बढ़ गई है. इस दूध को बेहद स्वास्थ्यवर्धक बताया जा रहा है और एक लीटर 50 यूरो यानी साढ़े तीन हजार रुपए तक में बिक रहा है..
नई जिंदगी
समाचार एजेंसी एएफपी ने खबर दी है कि गधी के दूध की बढ़ती मांग को देखते हुए मोंटेनीग्री में गधों को एक नई जिंदगी मिल गई है.
सेहत के लिए
गधी का दूध खरीदने वालों का कहना है कि यह सेहत के लिए बहुत ही अच्छा होता है.
कम मिलता है दूध
डारको बताते हैं कि गधी से उतना दूध हासिल नहीं किया जा सकता है जैसे गाय और भैंस से मिलता है. यह जानवर बहुत कम मात्रा में दूध देता है.
त्वचा के लिए फायदेमंद
गधों के एक फार्म के मालिक डारको स्वेलजिक का कहना है, “ये दूध त्वचा के लिए बहुत अच्छा होता है. और इसके इस्तेमाल से कई बीमारियों से बचा जा सकता है.”
फायदा हुआ
वेलेरिया मार्कोविक नाम की महिला का कहना है कि उनके बेटे को कई तरह की एलर्जी थी और गधी के दूध से उनके बेटे को काफी फायदा हुआ है.
गधी के दूध से स्नान
वेलेरिया का कहना है कि उन्होंने ये भी सुन रखा है कि दुनिया में सुंदरता की मिसाल कही जाने वाली क्लियोपेट्रा गधी के दूध से नहाती थी.
रिसर्च के संकेत
साइप्रस यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर फोटिस पापादेमस का कहना है कि रिसर्च से पुख्ता संकेत मिलते हैं कि कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए गधी का दूध फायदेमंद होता है.
सबसे महंगा चीज
वैसे गधी के दूध को मोंटेनीग्रो के पड़ोसी देश सर्बिया में भी पसंद किया जाता है. वहां इससे बने 50 ग्राम चीज को लगभग 48 यूरो में बेचा जाता है. इसे दुनिया का सबसे महंगा चीज माना जाता है. (फोटो सांकेतिक है)
कितने गधे हैं?
मोंटेनीग्रो में 2010 के आंकड़ों के मुताबिक गधों की संख्या 500 थी. लेकिन गधों के एक फार्म के मालिक डारको का कहना है कि अब सिर्फ 150 गधे बचे हैं.
मशीनों ने ली जगह
वो बताते हैं कि दशकों पहले मोंटेनीग्रो में लगभग हर घर में गधे पाए जाते थे, लेकिन वक्त के साथ इनकी जगह काम करने के लिए मशीनें इस्तेमाल की जाने लगीं.
उम्मीद
वो उम्मीद करते हैं कि इस जानवर के प्रति अब लोगों में जागरूकता पैदा होगी जिससे इसे बचाने में मदद मिलेगी.

ट्रक चालक ने मासूम गरीब को अपनी चपेट में ले लिया

ट्रामा सेंटर कोरबा में नर्मदा नामक व्यक्ति पिता परशराम कुछ रोज पहले ट्रक की चपेट में आ गया लापरवाही पूर्वक ट्रक चलाते हुए एक ट्रक चालक ने मासूम गरीब को अपनी चपेट में ले लिया जिसका इलाज ट्रामा सेन्टर कोरबा में डॉक्टर सतदल नाथ के द्वारा किया जा रहा है
मरीज गरीब तबके से है इसलिए इलाज का खर्च वहन करने में अशमर्थ है डॉक्टर सतदल नाथ जो की humanity के लिए जाने जाते रहे है उन्होंने इस पीड़ित के इलाज के लिए पहल की है,ऑपरेशन व् मेडिसिन के खर्च व्यहन करने के लिए एक छोटी सी गुहार है
और इनका स्मार्ट कार्ड भी नहीं बना है अतः प्रशासन से भी आग्रह है की स्मार्ट कार्ड atleast ऐसे गरीबो का जरुर बनाये, नाकि केवल अमीरों का
 अगर आप भी मानवता के नाते इसकी किसी तरह से मदद कर सके तो प्लीज contact करे 8109657724 उदय चौधरी
(समाज सेवी संस्था love care ) भुतपूर्व owner of shri sai medicose
मरीज का अकाउंट नंबर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया -35802970081
 Ifsc code-SBIN0009068
नर्मदा यादव शाखा-चोटिया