Thursday, August 31, 2017

with Mewar University, Chittorga

We, Consumers Congress, a registered NGO, have collaborated with Mewar University, Chittorgarh, Rajasthan, where in we have been authorised to take admission of the students from all over India, on behalf of Mewar University, for their various courses.
We have also been assured that special fee concession and scholarships will given to students from low income group taking admission through our NGO.
There are around 200 courses run by this University including B.Tech/M.Tech courses. You can visit their website for informat
No automatic alt text available.ion about various courses.

Saturday, August 26, 2017

किसान भाई नकली एवं मिलावटी उर्वरकों की पहचान किस प्रकार करें

किसान भाई नकली एवं मिलावटी उर्वरकों की पहचान किस प्रकार करें I

खेती में प्रयोग में लायेजाने वाले कृषि निवेशों में सबसे मंहगी सामग्री रासायनिक उर्वरक है | उर्वरकों के शीर्ष उपयोग की अवधि हेतु खरीफ एवं रबी के पूर्व उर्वरक विर्निमाता फैक्ट्रियों तथा विक्रेताओं द्वारा नकली एवं मिलावटी उर्वरक बनाने एवं बाजार में उतारने की कोशिश होती है | इसका सीधा प्रभाव किसानों पर पड़ता है | नकली एवं मिलावटी उर्वरकों की समस्या से निपटने के लिए यधपि सरकार प्रतिबद्ध है फिर भी यह आवश्यक है की खरीददारी करते समय किसान भाई उर्वरकों की शुद्धता मोटे तौर पर उसी तरह से परख लें, जैसे बीजों की शुद्धता बीज को दांतों से दबाने पर कटटी और किच्च की आवाज से, कपड़े की गुणवक्ता उसे छूकर या मसलकर तथा दूध की शुद्धता की जाँच उसे अंगुली से टपका कर लेते है |
कृषकों के बीच प्रचलित उर्वरक में से प्राय: डी.ए.पी. जिंक सल्फेट, यूरिया तथा एम.ओ.पी. नकली / मिलावटी रूप से बाजार में उतारे जाते है | खरीदारी करते समय कृषक इसकी प्रथम दृष्टया परख निम्न सरल विधि से कर सकते है और प्रथम दृष्टया उर्वरक नकली पाए जाए तो एसी स्थिति में विधिक कार्यवाही किए जाने हेतु इसकी सुचना जनपद के उप कृषि निदेशक / जिला कृषि आधिकारी एवं कृषि निदेशक,  को दी जा सकती है |

उर्वरक का नाम : यूरिया :

1 पहचान विधि :
क सफ़ेद चमकदार, लगभग समान आकार के गोल दाने |
ख पानी में पूर्णतया घुल जाना तथा घोल छूने पर शीतल अनुभूति |
गर्म तवे पर रखने से पिघल जाता है और आंच तेज करने पर कोई अवशेष नहीं बचता |

उर्वरक का नाम – डी.ए.पी. :

पहचान विधि :
  • सख्त, दानेदार, भूरा, कला, बादामी, रंग नाखूनों से आसानी से नहीं छूटता |
  • डी.ए.पी. के कुछ दानों को लेकर तम्बाकू की तरह उसमें चूना मिलाकर मलने पर तीक्ष्ण गन्ध निकलती है, जिसे सूंघना असहाय हो जाता है |
  • तवे पर धीमी आंच में गर्म करने पर दाने फुल जाते है |

इसी तरह की और अधिक जानकारी के लिए डाउनलोड करें किसान समाधान एंड्राइड एप्प

उर्वरक का नाम – सुपर फास्फेट :

पहचान विधि :
यह सख्त दाने दर, भूरा काला बादामी रंगों से युक्त तथा नाखूनों से आसानी से न टूटने वाला उर्वरक है | यह चूर्ण के रूप में भी उपलब्ध होता है | इस दानेदार उर्वरक की मिलावट बहुधा डी.ए.पी. व येन.प.के. मिक्चर उर्वरकों के साथ की जाने की सम्भावना बनी रहती है |
परीक्षण :
इस दानेदार उर्वरक को यदि गरम किया जाये तो इसके दाने फूलते नहीं है  जबकि डी.ए.पी.. व अन्य कम्प्लेक्स के दाने फूल जाते है | इस प्रकार इसकी मिलावट की पहचान आसानी से कर सकते है |

उर्वरक का नाम – जिंक सल्फेट :

पहचान विधि :
  • जिंक सल्फेट में मैग्नीशियम सल्फेट प्रमुख मिलावटी रसायन है | भौतिक रूप से समानता के कारण नकली असली की पहचान कठिन होती है |
  • डी.ए.पी. के घोल में जिंक सल्फेट के घोल को मिलाने पर थक्केदार घना अवक्षेप बन जाता है | मैग्नीशियम सल्फेट के साथ एसा नहीं होता है |
  • जिंक सल्फेट के घोल में पतला कास्टिक का घोल मिलाने पर सफ़ेद, मटमैला मांड जैसे अवक्षेप बनता है, जिसमें गाढ़ा कास्टिक का घोल मिलाने पर अवक्षेप पूर्णतया घुल जाता है | यदि जिंक सल्फेट की जगह पर मैग्नीशियम सल्फेट है तो अवक्षेप नहीं घुलेगा |

उर्वरक का नाम – पोटाश खाद :

पहचान विधि :
  1. सफ़ेद कणाकार, पिसे नमक तथा लाल मिर्च जैसा मिश्रण |
  2. ए कण नम करने पर आपस में चिपकते नहीं |
  3. पानी में घोलने पर खाद का लाल भाग पानी में ऊपर तैरता है |

Tuesday, August 22, 2017

राष्ट्रीय आयुष मिशन

राष्ट्रीय आयुष मिशन

राष्ट्रीय आयुष मिशन

योजना का उद्देश्य :-

  • औषधीय पादप जो आयुष चिकित्सा पद्धतियों की अखंडता, गुणवत्ता, प्रभावोत्पादकता और सुरक्षा की कुंजी हैं, उन्हे कृषि प्रणालियों में शामिल करके, उनकी कृषि को बढ़ावा देना जिससे कृषि किसानों को फसल विविधता का एक विकल्प मिलेगा और उनकी आमदनी बढ़ेगी।
  • मानकीकरण तथा गुणवत्ता आश्वासन को बढ़ावा देने के लिए अच्छी कृषि एवं संग्रहण अभ्यासों का अनुकरण करते हुए कृषि करना जिससे आयुष पद्धतियों की वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता में वृद्धि होगी और जड़ी-बूटियों अर्कों, फाइटो-रासायनिकों, आहार पूरकों, सौन्दर्य प्रसाधनों और आयुष उत्पादों जैसी मूल्य वर्धित वस्तुओं के निर्यात में बढ़ोत्तरी होगी।
  • कृषि अभिसरण, भण्डारण, मूल्यवर्धन एवं विपणन के माध्यम से प्रसंस्करण समूहों की स्थापना को सहायता देना और उद्यमियों के लिए अवसंरचना का विकास ताकि ऐसे समूहों में एकक (Unit) स्थापित की जा सकें।
  • गुणवत्ता मानकों, अच्छे कृषि अभ्यासों, अच्छे संग्रहण अभ्यासों और अच्छे भण्डारण अभ्यासों के लिए प्रमाणन क्रियाविधि को लागू करना तथा उसका समर्थन करना।
  • राष्ट्रीय, क्षेत्रीय राज्यीय और उप राज्यीय स्तर पर सार्वजनिक निजी क्षेत्र में अनुसंधान एंव विकास, प्रसंस्करण तथा विपणन में जुटे हुए पणधारियों (Stack holders) के बीच भागीदारी, अभिसरण (Convergence) और सहक्रिया (Synergy) को बढ़ावा देना।

आच्छादित जनपदः-

सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, बिजनौर,सम्भल, मेरठ, बुलंदशहर, बरेली, बदायूं, शाहजहाँपुर, लखनऊ, सीतापुर, हरदोई, फैजाबाद, बाराबंकी, अम्बेडकर नगर, सुल्तानपुर, बस्ती, गोरखपुर, महाराजगंज, कुशीनगर, इलाहाबाद, कौशाम्बी, प्रतापगढ़, कन्नौज, कानपुर देहात, इटावा, फतेहपुर, आगरा, मथुरा, एटा, अलीगढ़, हाथरस, आजमगढ़, वाराणसी, गाजीपुर, जौनपुर, चन्दौली, मिर्जापुर, सोनभद्र, बाँदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा, झांसी, जालौन, ललितपुर एवं बहराइच।

कार्यक्रम का नामः-

    • औषधीय पौध क्षेत्र विस्तार कार्यक्रम के अन्तर्गत विभिन्न फसलें यथा- सर्पगन्धा, अश्वगंधा, ब्र्राम्ही, कालमेघ, कौंच, सतावरी, तुलसी, एलोवेरा, वच एवं आर्टीमीशिया के क्षेत्र विस्तार का कार्यक्रम कराया जाता है।
    • पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेन्टः- पोस्ट हार्वेस्ट कार्यक्रम के अन्तर्गत निजी क्षेत्र में स्टोरेज गोडाउन एवं ड्राइंगशेड का निर्माण।

अनुमन्य अनुदान मदवारः-

  • सर्पगन्धाः- इकाई लागत धनराशि रू0 91506.25 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 50 देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 45753.00 का भुगतान किया जायेगा।
  • अश्वगंधाः- इकाई लागत धनराशि रू0 36602.50 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30 देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 10980.75 का भुगतान किया जायेगा।
  • ब्राम्हीः- इकाई लागत धनराशि रू0 58564.00 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 17569.20 का भुगतान किया जायेगा।
  • कालमेघः- इकाई लागत धनराशि रू0 36602.50 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 10980.75 का भुगतान किया जायेगा।
  • कौंचः- इकाई लागत धनराशि रू0 29282.00 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 8784.60 का भुगतान किया जायेगा।
  • सतावरीः- इकाई लागत धनराशि रू0 91506.25 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 27451.80 का भुगतान किया जायेगा।
  • तुलसीः- इकाई लागत धनराशि रू0 43923.00 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 13176.90 का भुगतान किया जायेगा।
  • एलोवेराः- इकाई लागत धनराशि रू0 62224.25 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 18672.20 का भुगतान किया जायेगा।
  • वचः- इकाई लागत धनराशि रू0 91506.25 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 27451.80 का भुगतान किया जायेगा।
  • आर्टीमीशियाः- इकाई लागत धनराशि रू0 48741.25 प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 30% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 14622.25 का भुगतान किया जायेगा।
  • ड्राइंगशेडः- इकाई लागत धनराशि रू0 10.00 लाख प्रति इकाई के सापेक्ष 50% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 5.00 लाख का भुगतान किया जायेगा।
  • स्टोरेज गोडाउनः- इकाई लागत धनराशि रू0 10.00 लाख प्रति इकाई के सापेक्ष 50% देय अनुदान अधिकतम धनराशि रू0 5.00 लाख का भुगतान किया जायेगा।

आवेदक की पात्रता शर्तेः-

  • कृषक को योजना का लाभ प्राप्त करने हेतु वेबसाइट www.upagriculture.com पर ऑनलाइन पंजीकरण कराना होगा।
  • लाभार्थी के पास राजस्व भू-अभिलेखों में स्वयं के नाम भूमि उपलब्ध होनी चाहिए।
  • लाभार्थी के पास सिंचाई का पर्याप्त साधन होना चाहिए।
  • लाभार्थी कृषक के पास बैंक खाता एवं चेकबुक उपलब्ध होना चाहिए।
  • लाभार्थी योजना के अन्तर्गत अनुदान धनराशि के अतिरिक्त कार्यक्रम पर व्यय होने वाली धनराशि वहन करने में सक्षम हो।
  • लाभार्थी के पास हेतु पहचान हेतु वोटर कार्ड/राशन कार्ड/आधार कार्ड/पासपोर्ट में से कोई एक उपलब्ध होना चाहिए।
  • लाभार्थी को सम्बन्धित कार्यक्रम की प्रारम्भिक तकनीकी जानकारी हो एवं कार्यक्रम में उसकी अभिरूचि हो।
  • लाभार्थी का चयन प्रथम आवक-प्रथम पावक के सिद्धान्त के आधार पर किया जायेगा।

अनुमन्य क्षेत्रफल/मात्रा/संख्याः-

  • सर्पगन्धाः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा-ताजी जड़ 100 Kg. प्रति हेक्टेयर
  • अश्वगंधाः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 8 से 10 Kg. प्रति हेक्टेयर
  • ब्राम्हीः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 100 Kg. रनर्स प्रति हेक्टेयर
  • कालमेघः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 450 Gm.प्रति हेक्टेयर
  • कौंचः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 9 से 10 Kg. प्रति हेक्टेयर
  • सतावरीः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 2.5 से 3 Kg. प्रति हेक्टेयर
  • तुलसीः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 1 Kg. प्रति हेक्टेयर
  • एलोवेराः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 50000 पौध/सकर्स प्रति हेक्टेयर
  • वचः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 74074 तनों के सकर्स प्रति हेक्टेयर
  • आर्टीमीशियाः अधिकतम् क्षेत्रफल-2 हेक्टेयर, बीज की मात्रा- 50 Gm.प्रति हेक्टेयर

आवेदन कैसे करें

योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए वेबसाइट  पर ऑन लाइन पंजीकरण कराना होगा] इसके लिए जनसुविधा केन्द्र] कृषक लोकवाणी साइबर कैफे आदि के माध्यम से पंजीकरण करा सकता है।  

इफको की किसानों के लिए एक नई पहल “नीम लगाओ, पैसे कमाओ”

इफको की किसानों के लिए एक नई पहल  “नीम लगाओपैसे कमाओ”

इफको ने किसानों के लिए एक नई पहल ‘नीम लगाओ, पैसे कमाओ’ की शुरूआत की है। देश के हर हिस्से में इफको ने ‘निमोरी केंद्र’ की शुरूआत की है जहां किसान जा कर अपने नीम के पौधे बेच सकते हैं और रुपये पंद्रह प्रति किलो कमा सकते हैं। इफको इसका इस्तेमाल इलाहाबाद के अपने संयंत्र में तेल निकालने के लिए करेगी। प्रति दिन 22 टन नीम के पौधों से दो टन नीम का तेल निकाला जाएगा। इन पौधों का इस्तेमाल यूरिया के उत्पादन के लिए भी किया जाएगा।

जाने किस तरह 

नीम के पौधे लगाकर किसान अतिरिक्त आमदनी जुटा सकते हैं। किसान नीम का पौधा लगाकर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं। एक साधारण किसान नीम के पौधे लगाकर एक वर्ष में तीस से चालीस हजार रुपये कमा सकता है। इफको द्वारा वितरित किये जा रहे नीम के उन्नतशील पौधे पांच वर्ष में पेड़ बन जाएंगे। इनसे मिलने वाली नीम कौड़ी को इफको ही खरीदेगा और उससे नीम कोटेड यूरिया बनाएगा। नीम का पेड़ आर्थिक लाभ के साथ- साथ औषधि व पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
NPK का दाम घटाने के बाद फ़र्टिलाइज़र की सबसे बड़ी सहकारी कंपनी इफको , किसानों के लिए इस साल फिर एक बड़ी ख़ुशख़बरी लाई है। दरअसल इफ्को ने इस साल इलाहाबाद में नीम आधारित कारखाना लगाने की शुरुआत की है। इस कारखाने में नीम के  निमोरियों  से तेल निकाला जाएगा। इसमें रोज़ाना २२ टन निमोरियों  से २ टन नीम का तेल निकाला जायेगा। इसके अतिरिक्त इन निमौलियों का उपयोग यूरिया उत्पादन में भी होगा। इफ्को ने नीम कारखाने में उपयोग में लाये जाने वाले  निमोरियों  को किसानों से ही खरीदने का फैसला किया है। इसके लिए इफ्को पूरे देश में कई स्थानों पर ‘निमोरी सेन्टर’ खोलेगी, जहाँ पर किसान १५ रुपये / किग्रा के दाम पर

पद और रसूख जाने के बाद दुनिया आपके लिए एक आम आदमी की तरह है ,

मेरे मित्रों 

हालीवुड के एक्शन हीरो और बाडी बिल्डर एथलीट रहे अर्नाल्ड ने एक फोटो पोस्ट की है -
अपनी मूर्ति के नीचे सोते हुए जो उस होटल मे लगी है जिसका फीता उन्होने कैलीफोर्निया के गवर्नर रहते काटा था ,होटल ने उनकी मूर्ति लगाते हुए उन्हे आजीवन होटल मे रूम फ्री मे देने की घोषणा की थी , रिटायर होने के बाद एक दिन होटल में रूम मांगने पर होटल ने बुकिंग फुल है कह मना कर दिया , अपनी ही मूर्ति के पास सोये और लिखा - पद और रसूख जाने के बाद दुनिया आपके लिए एक आम आदमी की तरह है , 

*इससे सीखो और जियो

जानें क्या है आर्गेनिक जैविक खाद बनाने का घरेलु तरीका

जानें क्या है आर्गेनिक जैविक खाद बनाने का घरेलु तरीका

एक एकड़ भूमि के लिए कीट नियंत्रक बनाने के लिए हमें चाहिए 20 लीटर देसी गाय का गौ मूत्र 3 से 5 किलोग्राम ताजा हरा नीम कि पत्ती या निमोली , 2.500 किलो ग्राम ताजा हरा आंकड़ा के पत्ते , 2500 किलोग्राम भेल के पत्ते ताजा हरा , 2.500 ताजा हरा आडू के पत्ते इन सब पत्तो को कूट कर बारीक़ किलोग्राम पीसकर चटनी बनाकर उबाले और उसमे 20 गुना पानी मिलाकर किट नाशक या नियंत्रक तैयार करे इसको खड़ी फसल पर पम्प द्वारा तर बतर कर छिड़काव करे इससे जो भी कीड़े फसल को हानी पहुचाते है वह तो ख़त्म हो जायेंगे परन्तु फसल को किसी भी तरह का हानी नहीं होगा।

कीट नियंत्रण

  1. देशी गाय का मट्ठा 5 लीटर लें । इसमें 3 किलो नीम की पत्ती या 2 किलो नीम खली डालकर 40 दिन तक सड़ायें फिर 5 लीटर मात्रा को 150 से 200 लिटर पानी में मिलाकर छिड़कने से एक एकड़ फसल पर इल्ली /रस चूसने वाले कीड़े नियंत्रित होंगे।
  2. लहसुन 500 ग्राम, हरी मिर्च तीखी चिटपिटी 500 ग्राम लेकर बारीक पीसकर 150 लीटर पानी में घोलकर कीट नियंत्रण हेतु छिड़कें ।
  3. 10 लीटर गौ मूत्र में 2 किलो अकौआ के पत्ते डालकर 10 से 15 दिन सड़ाकर, इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालें फिर इसके 1 लीटर मिश्रण को 150 लीटर पानी में मिलाकर रसचूसक कीट /इल्ली नियंत्रण हेतु छिड़कें।
इन दवाओं का असर केवल 5 से 7 दिन तक रहता है । अत: एक बार और छिड़कें जिससे कीटों की दूसरी पीढ़ी भी नष्ट हो सके।
बेशरम के पत्ते 3 किलो एवं  धतूरे के तीन फल फोड़कर 3 लिटर पानी में उबालें । आधा पानी शेष बचने पर इसे छान लें । इस छने काढ़े में 500 ग्राम चने डालकर उबालें। ये चने चूहों के बिलों के पास शाम के समय डाल दें। इससे चूहों से निजात मिल सकेगी।

हरी खाद बनाने की विधी

हरी खाद बनाने की विधी

  • अप्रैल मई माह में गेंहु की कटाई के बाद जमीन की सिंचाई कर लें | खेत में खड़े पानी में 50 की.ग्राम. प्रति है. की दर से ढेंचा का बीज छितरा लें |
  • जरुरत पड़ने पर 10 से 15 दिन में ढेंचा फसल की हल्की सिंचाई कर लें |
  • 20 दिन की अवस्था पर नत्रजन खाद छितराने से नोड्यूल बनने में सहायता मिलती है |
  • 55 से 60 दिन की अवस्था में हल चला कर हरी खाद को पुन: खेत में मिला दिया जाता है | इस तरह लगभग 10.15 टन प्रति हे. की दर से हरी खाद उपलब्ध हो जाती है |
  • जिससे 60 से 80 किलो ग्राम नाईट्रोजन प्रति हे. प्राप्त होता है | मिटटी में ढेंचे के पौधों के गलने – सड़ने से बैक्टीरिया द्वारा नियत सभी नाईट्रोजन जैविक रूप में लम्बे समय के लिए कार्बन के साथ मिटटी को वापिस मिल जाते है |

हरी खाद बनाने के लिए अनुकूल फसले –

  • ढेंचा, लोबिया, उड़द, मूंग, ग्वार बरसीम, कुच्छ मुख्य फसलें है | ढेंचा इनमें से अधिक लिया जाता है |
  • ढैचा की मुख्य किस्में सस्बेनीया एजिप्टिका, एस रोस्टेटा तथा एक्वेलेटा अपने त्वरित खनिज करण पैटर्न, उच्च नाईट्रोजन मात्र तथा अल्प C:N अनुपात के कारण बाद में बोई गई मुख्य फसल की उत्पादकता पर उल्लेखनीय प्रभाव डालने में सक्षम है |

आदर्श हरी खाद की निम्नलिखित गुण होनी चाहिए –

  • उगाने का न्यूनतम खर्च
  • न्यूनतम सिंचाई आवश्यकता
  • विपरीत परिस्थिति में भी उगने की क्षमता हो
  • खरपतवार विरोधी हो
  • जो उपलब्ध वातावरण का प्रयोग करते हुए अधिकतम उपज दे |

हरी खाद को मिटटी में मिलाने की अवस्था

  • हरी खाद के लिए बोई गयी फसल 55 से 60 दिन बाद जोत कर मिटटी में मिलाने के लिए तैयार हो जाती है |
  • इस अवस्था पर पौधों की लम्बाई व हरी शुष्क सामग्री अधिकतम होती है 55 से 60 दिन की फसल अवस्था पर तना नर्म व नाजुक होता है जो आसानी से मिटटी में कट कर मिल जाता है |
  • इस अवस्था में कार्बन नाईट्रोजन अनुपात कम होता है | पौधे रसीले और जैविक पदार्थ से भरे होते है इस अवस्था पर नाईट्रोजन की मात्र की उपलब्धता बहुत अधिक होती है |
  • जैसे – जैसे हरी खाद के लिए लगाई गयी फसल की अवस्था बढती है कार्बन – नाईट्रोजन अनुपात बढ़ जाता है | जीवाणु हरी खाद के पौधों को गलाने सडाने के लिए मिटटी की नाईट्रोजन इस्तेमाल करते है | जिससे मिटटी में अस्थाई रूप से नाईट्रोजन की कमी हो जाती है |

हरी खाद के लाभ               

  • हरी खाद को मिटटी में मिलाने से मिटटी की भौतिक शरीरिक स्थिति में सुधार होता है |
  • हरी खाद से मृदा उर्वरता की भरपाई होती है
  • पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढाता है
  • सूक्ष्म जीवाणुओं की गतिविधियों को बढाता है
  • मिटटी की संरचना में सुधार होने के कारण फसल की जड़ों का फैलाव अच्छा होता है |हरी खाद के लिए उपयोग किये गये फलीदार पौधे वातावरण से नाईट्रोजन व्यवस्थित करके नोड्यूल्ज में जमा करते है जिससे भूमि ककी नाईट्रोजन शक्ति बढती है |


किस तरह करें ताजे पानी में मोती का उत्पादन

किस तरह करें ताजे पानी में मोती का उत्पादन

मोती उत्पादन क्या है?

मोती एक प्राकृतिक रत्‍न है जो सीप से पैदा होता है। भारत समेत हर जगह हालांकि मोतियों की माँग बढ़ती जा रही है, लेकिन दोहन और प्रदूषण से इनकी संख्‍या घटती जा रही है। अपनी घरेलू माँग को पूरा करने के लिए भारत अंतरराष्‍ट्रीय बाजार से हर साल मोतियों का बड़ी मात्रा में आयात करता है। सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्‍वाकल्‍चर, भुवनेश्‍वर ने ताजा पानी के सीप से ताजा पानी का मोती बनाने की तकनीक विकसित कर ली है जो देशभर में बड़ी मात्रा में पाये जाते हैं।

तराशे हुए मोती

प्राकृतिक रूप से एक मोती का निर्माण तब होता है जब कोई बाहरी कण जैसे रेत, कीट आदि किसी सीप के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और सीप उन्‍हें बाहर नहीं निकाल पाता, बजाय उसके ऊपर चमकदार परतें जमा होती जाती हैं। इसी आसान तरीके को मोती उत्‍पादन में इस्‍तेमाल किया जाता है।
मोती सीप की भीतरी सतह के समान होता है जिसे मोती की सतह का स्रोत कहा जाता है और यह कैल्शियम कार्बोनेट, जैपिक पदार्थों व पानी से बना होता है। बाजार में मिलने वाले मोती नकली, प्राकृतिक या फिर उपजाए हुए हो सकते हैं। नकली मोती, मोती नहीं होता बल्कि उसके जैसी एक करीबी चीज होती है जिसका आधार गोल होता है और बाहर मोती जैसी परत होती है। प्राकृतिक मोतियों का केंद्र बहुत सूक्ष्‍म होता है जबकि बाहरी सतह मोटी होती है। यह आकार में छोटा होता और इसकी आकृति बराबर नहीं होती। पैदा किया हुआ मोती भी प्राकृतिक मोती की ही तरह होता है, बस अंतर इतना होता है कि उसमें मानवीय प्रयास शामिल होता है जिसमें इच्छित आकार, आकृति और रंग का इस्‍तेमाल किया जाता है। भारत में आमतौर पर सीपों की तीन प्रजातियां पाई जाती हैं- लैमेलिडेन्‍स मार्जिनालिस, एल.कोरियानस और पैरेसिया कोरुगाटा जिनसे अच्‍छी गुणवत्‍ता वाले मोती पैदा किए जा सकते हैं।

उत्‍पादन का तरीका

इसमें छह प्रमुख चरण होते हैं- सीपों को इकट्ठा करना, इस्‍तेमाल से पहले उन्‍हें अनुकूल बनाना, सर्जरी, देखभाल, तालाब में उपजाना और मोतियों का उत्‍पादन।
  1. सीपों को इकट्ठा करना: तालाब, नदी आदि से सीपों को इकट्ठा किया जाता है और पानी के बरतन या बाल्टियों में रखा जाता है। इसका आदर्श आकार 8 सेंटी मीटर से ज्‍यादा होता है।
  2. इस्‍तेमाल से पहले उन्‍हें अनुकूल बनाना: इन्‍हें इस्‍तेमाल से पहले दो-तीन दिनों तक पुराने पानी में रखा जाता है जिससे इसकी माँसपेशियाँ ढीली पड़ जाएं और सर्जरी में आसानी हो।
  3. सर्जरी: सर्जरी के स्‍थान के हिसाब से यह तीन तरह की होती है- सतह का केंद्र, सतह की कोशिका और प्रजनन अंगों की सर्जरी। इसमें इस्‍तेमाल में आनेवाली प्रमुख चीजों में बीड या न्‍यूक्लियाई होते हैं, जो सीप के खोल या अन्‍य कैल्शियम युक्‍त सामग्री से बनाए जाते हैं।

सतह के केंद्र की सर्जरी

इस प्रक्रिया में 4 से 6 मिली मीटर व्‍यास वाले डिजायनदार बीड जैसे गणेश, बुद्ध आदि के आकार वाले सीप के भीतर उसके दोनों खोलों को अलग कर डाला जाता है। इसमें सर्जिकल उपकरणों से सतह को अलग किया जाता है। कोशिश यह की जाती है कि डिजायन वाला हिस्‍सा सतह की ओर रहे। वहाँ रखने के बाद थोड़ी सी जगह छोड़कर सीप को बंद कर दिया जाता है।

सतह कोशिका की सर्जरी

यहाँ सीप को दो हिस्‍सों- दाता और प्राप्तकर्त्ता कौड़ी में बाँटा जाता है। इस प्रक्रिया के पहले कदम में उसके कलम (ढके कोशिका के छोटे-छोटे हिस्‍से) बनाने की तैयारी है। इसके लिए सीप के किनारों पर सतह की एक पट्टी बनाई जाती है जो दाता हिस्‍से की होती है। इसे 2/2 मिली मीटर के दो छोटे टुकड़ों में काटा जाता है जिसे प्राप्‍त करने वाले सीप के भीतर डिजायन डाले जाते हैं। यह दो किस्‍म का होता है- न्‍यूक्‍लीयस और बिना न्‍यूक्‍लीयस वाला। पहले में सिर्फ कटे हुए हिस्‍सों यानी ग्राफ्ट को डाला जाता है जबकि न्‍यूक्‍लीयस वाले में एक ग्राफ्ट हिस्‍सा और साथ ही दो मिली मीटर का एक छोटा न्‍यूक्‍लीयस भी डाला जाता है। इसमें ध्‍यान रखा जाता है कि कहीं ग्राफ्ट या न्‍यूक्‍लीयस बाहर न निकल आएँ।

प्रजनन अंगों की सर्जरी

इसमें भी कलम बनाने की उपर्युक्‍त प्रक्रिया अपनाई जाती है। सबसे पहले सीप के प्रजनन क्षेत्र के किनारे एक कट लगाया जाता है जिसके बाद एक कलम और 2-4 मिली मीटर का न्‍यूक्‍लीयस का इस तरह प्रवेश कराया जाता है कि न्‍यूक्‍लीयस और कलम दोनों आपस में जुड़े रह सकें। ध्‍यान रखा जाता है कि न्‍यूक्‍लीयस कलम के बाहरी हिस्‍से से स्‍पर्श करता रहे और सर्जरी के दौरान आँत को काटने की जरूरत न पड़े।

देखभाल

इन सीपों को नायलॉन बैग में 10 दिनों तक एंटी-बायोटिक और प्राकृतिक चारे पर रखा जाता है। रोजाना इनका निरीक्षण किया जाता है और मृत सीपों और न्‍यूक्‍लीयस बाहर कर देने वाले सीपों को हटा लिया जाता है।

तालाब में पालन

ताजा पानी में सीपों का पालन देखभाल के चरण के बाद इन सीपों को तालाबों में डाल दिया जाता है। इसके लिए इन्‍हें नायलॉन बैगों में रखकर (दो सीप प्रति बैग) बाँस या पीवीसी की पाइप से लटका दिया जाता है और तालाब में एक मीटर की गहराई पर छोड़ दिया जाता है। इनका पालन प्रति हेक्‍टेयर 20 हजार से 30 हजार सीप के मुताबिक किया जाता है। उत्‍पादकता बढ़ाने के लिए तालाबों में जैविक और अजैविक खाद डाली जाती है। समय-समय पर सीपों का निरीक्षण किया जाता है और मृत सीपों को अलग कर लिया जाता है। 12 से 18 माह की अवधि में इन बैगों को साफ करने की जरूरत पड़ती है।

मोती का उत्‍पादन

गोल मोतियों का संग्रहणपालन अवधि खत्‍म हो जाने के बाद सीपों को निकाल लिया जाता है। कोशिका या प्रजनन अंग से मोती निकाले जा सकते हैं, लेकिन यदि सतह वाला सर्जरी का तरीका अपनाया गया हो, तो सीपों को मारना पड़ता है। विभिन्‍न विधियों से प्राप्‍त मोती खोल से जुड़े होते हैं और आधे होते हैं; कोशिका वाली विधि में ये जुड़े नहीं होते और गोल होते हैं तथा आखिरी विधि से प्राप्‍त सीप काफी बड़े आकार के होते हैं।

ताजे पानी में मोती उत्‍पादन का खर्च

ध्‍यान रखें –

  • ये सभी अनुमान सीआईएफए में प्राप्‍त प्रायोगिक परिणामों पर आधारित हैं।
  • डिजायनदार या किसी आकृति वाला मोती अब बहुत पुराना हो चुका है, हालांकि सीआईएफए में पैदा किए जाने वाले डिजायनदार मोतियों का पर्याप्‍त बाजार मूल्‍य है क्‍योंकि घरेलू बाजार में बड़े पैमाने पर चीन से अर्द्ध-प्रसंस्‍कृत मोती का आयात किया जाता है। इस गणना में परामर्श और विपणन जैसे खर्चे नहीं जोड़े जाते।
  • कामकाजी विवरण
  • क्षेत्र : 0.4 हेक्‍टेयर
  • उत्‍पाद : डिजायनदार मोती
  • भंडारण की क्षमता : 25 हजार सीप प्रति 0.4 हेक्‍टेयर
  • पैदावार अवधि : डेढ़ साल
क्रम संख्‍यासामग्रीराशि(लाख रुपये में)
I.व्‍यय
क .स्‍थायी पूँजी
1.परिचालन छप्‍पर (12 मीटर x 5 मीटर)1.00
2.सीपों के टैंक (20 फेरो सीमेंट/एफआरपी टैंक 200 लीटर की क्षमता वाले प्रति डेढ़ हजार रुपये)0.30
3.उत्‍पादन इकाई (पीवीसी पाइप और फ्लोट)1.50
4.सर्जिकल सेट्स (प्रति सेट 5000 रुपये के हिसाब से 4 सेट)0.20
5.सर्जिकल सुविधाओं के लिए फर्नीचर (4 सेट)0.10
कुल योग3.10
ख .परिचालन लागत
1.तालाब को पट्टे पर लेने का मूल्‍य (डेढ़ साल के फसल के लिए)0.15
2.सीप (25,000 प्रति 50 पैसे के हिसाब से)0.125
3.डिजायनदार मोती का खाँचा (50,000 प्रति 4 रुपये के हिसाब से)2.00
4.कुशल मजदूर (3 महीने के लिए तीन व्‍यक्ति 6000 प्रति व्‍यक्ति के हिसाब से)0.54
5.मजदूर (डेढ़ साल के लिए प्रबंधन और देखभाल के लिए दो व्‍यक्ति प्रति व्‍यक्ति 3000 रुपये प्रति महीने के हिसाब से1.08
6.उर्वरक, चूना और अन्‍य विविध लागत0.30
7.मोतियों का फसलोपरांत प्रसंस्‍करण (प्रति मोती 5 रुपये के हिसाब से 9000 रुपये)0.45
कुल योग4.645
.कुल लागत
1.कुल परिवर्तनीय लागत4.645
2.परिवर्तनीय लागत पर छह महीने के लिए 15 फीसदी के हिसाब से ब्‍याज0.348
3.स्‍थायी पूँजी पर गिरावट लागत (प्रतिवर्ष 10 फीसदी के हिसाब से डेढ़ वर्ष के लिए)0.465
4.स्‍थायी पूँजी पर ब्‍याज (प्रतिवर्ष 15 फीसदी के हिसाब से डेढ़ वर्ष के लिए0.465
कुल योग5.923
II.कुल आय
1.मोतियों की बिक्री पर रिटर्न (15,000 सीपों से निकले 30,000 मोती यह मानते हुए कि उनमें से 60 फीसदी बचे रहेंगे)
डिजायन मोती (ग्रेड ए) (कुल का 10 फीसदी) प्रति मो‍ती 150 रुपये के हिसाब से 3000

4.50
डिजायन मोती (ग्रेड बी) (कुल का 20 फीसदी) प्रति मो‍ती 60 रुपये के हिसाब से 6000

3.60
कुल रिटर्न8.10
III.शुद्ध आय (कुल आय- कुल लागत)2.177

Thursday, August 17, 2017

किसान क्रेडिट कार्ड योजना के लाभ –

सान क्रेडिट कार्ड के लाभ, प्राप्त करने के लिए प्रकिया एवं विशेषताएं

किसान क्रेडिट कार्ड योजना के लाभ –

  • सरल वितरण प्रक्रिया
  • नकद आपूर्ति के लिए बहुत ही आसान प्रक्रिया
  • प्रत्येक फसल के लिए ऋण हेतु आवेदन की आवश्यकता नहीं
  • किसानों के लिए किसी भी समय ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करना व किसानों के लिए ब्याज़ के बोझ को घटाना
  • किसानों की सुविधा और विकल्प के अनुसार खाद और उर्वरक की खरीद करना।
  • डीलर से नकद खरीद पर छूट
  • 3 वर्षों तक ऋण सुविधा- हर मौसम में मूल्यांकन की आवश्यकता नहीं
  • कृषि आय के आधार पर अधिकतम ऋण सीमा को बढ़ाना
  • ऋण सीमा के भीतर कई बार राशि का निकालना संभव
  • फसल कटाई के बाद अदायगी का प्रावधान
  • कृषि अग्रिम के अनुसार ब्याज़ दर लागू
  • कृषि अग्रिम के अनुसार प्रतिभूति, मार्जिन एवं प्रलेखन नियम होंगे

किसान क्रेडिट कार्ड प्राप्त करने की प्रक्रिया

  • अपने नज़दीकी सार्वज़निक क्षेत्र के बैंक से सम्पर्क कर ज़ानकारी हासिल करें।
  • योग्य किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड दिया जाएगा और उन्हें पासबुक दिया जाएगा। पासबुक पर किसान का नाम व पता, भूमि ज़ोत का विवरण, उधार सीमा, वैधता अवधि, एक पासपोर्ट आकार का फोटो होगा जो पहचान पत्र का काम करेगा और लेन-देन का लेखा-ज़ोखा रखेगा।
  • खाते का उपयोग करते समय उधारकर्त्ता को अपना कार्ड-सह-पासबुक दिखाना होगा।

योजना की विशेषताएँ

यह योजना देशभर के सभी किसान क्रेडिट कार्ड धारकों की मृत्यु या स्थायी अक्षमता को शामिल करती है।
शामिल किये जाने वाले लोगः 70 वर्ष आयु तक के सभी किसान क्रेडिट कार्ड धारक।

इस योजना के अंतर्गत शामिल लाभ इस प्रकार है-

दुर्घटना के कारण मृत्यु होना जो कि बाह्य, हिंसक तथा दृष्टिगत कारणों से हो: 50,000 रुपये
  • स्थायी पूर्ण अक्षमता: 50,000 रुपये
  • दो अंग या दोनों आँख या एक अंग तथा एक आँख खो जाने पर: 50,000 रुपये
  • एक अंग या एक आँख खोने पर: 25,000 रुपये
  • मास्टर पॉलिसी की अवधिः 3 वर्षों के लिए मान्य।

 बीमे की समय अब्धि

जिन मामलों में वार्षिक प्रीमियम भरा जाना हों उनमें बीमा कवर हिस्सा लेने वाली बैंकों से प्रीमियम प्राप्त होने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के लिए प्रभावी होगा। तीन वर्ष की अवधि वाले बीमा के मामले में, बीमा काल प्रीमियम प्राप्ति की तिथि से तीन वर्षों तक होगा।

प्रीमियम एवं अन्य सम्बंधित जानकारी

  • प्रत्येक किसान क्रेडिट कार्ड धारक के लिए लागू 15 रुपये वार्षिक प्रीमियम में से 10 रुपये बैंक तथा 5 रुपये किसान क्रेडिट कार्ड धारक को देना होता है।
  • संचालन विधिः क्षेत्रवार आधार पर व्यवसाय की सेवा चार बीमा कम्पनियों द्वारा की जा रही है। युनाइटेड इण्डिया इंश्योरेंस कंपनी, आँध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, अंडमान एवं निकोबार, पुड्डेचेरी, तमिलनाडु तथा लक्षद्वीप को कवर करेगी।
  • लागू करने वाली शाखाओं को बीमा प्रीमियम मासिक आधार पर जमा करना होगा एवं उसके साथ उन किसानों की सूची भी देना होगी जिन्हें उस महीने के दौरान किसान क्रेडिट कार्ड जारी किये गये हों।
  • भुगतान के दावा की प्रक्रियाः मृत्यु, अक्षमता के दावों के मामलों में तथा डूबने से मृत्यु होने पर:दावे का निपटारा बीमा कंपनियों द्वारा किया जाएगा। इसके लिए एक अलग प्रक्रिया का पालन करना होगा।

रोजगार का जरिया बन सकती है ग्वारपाठा की खेती

रोजगार का जरिया बन सकती है ग्वारपाठा की खेती

राजस्थान में ऐसे बेरोजगार युवक जिनके पास कम से कम एक हैक्टेयर कृषि भूमि है, उनके लिए ग्वारपाठा (एलोवेरा) की खेती रोजगार का जरिया बन सकती है। शुष्क और उष्ण जलवायु में पैदा होने वाली ग्वारपाठा की खेती के लिए राजस्थान की जलवायु और मिट्टी सर्वाधिक उत्तम मानी जाती है। ग्वारपाठा मूलत: दो प्रकार का होता है, एक खारा ग्वारपाठा और दूसरा मीठा ग्वारपाठा। खारा ग्वारपाठा आयुर्वेदिक औषधियों एवं सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री तैयार करने के लिए काम में लिया जाता है, जबकि मीठा ग्वारपाठा का इस्तेमाल अचार और सब्जी बनाने के लिए होता है।
कृषि विशेषज्ञों एवं जानकारों के मुताबिक राजस्थान में फिलहाल तीन हजार हैक्टेयर से अधिक भूभाग पर किसान ग्वारपाठे की खेती कर रहे हैं। एक हैक्टेयर में ग्वारपाठा के बीस हजार पौधे लगाये जा सकते हैं। इस पर वर्ष भर में 50 से 60 हजार रूपये का खर्चा आता है। पूरे साल में वर्षा के मौसम को छोड़ कर करीब 12 बार सिंचाई की जरूरत होती है। गर्मी के मौसम में महीने में एक अथवा दो बार सिंचाई करनी पड़ती है। ग्वारपाठे की अच्छी फसल के लिए 15 टन प्रति हैक्टेयर गोबर की खाद दी जा सकती है। एक साल बाद पत्तियों के रूप में उत्पादन शुरू हो जाता है। सिंचित क्षेत्र में 30 टन तथा असिंचित क्षेत्र में 20 टन प्रति हैक्टेयर सालाना ग्वारपाठे का उत्पादन होता है।
एक किसान को ग्वारपाठा की खेती से लगभग 40 हजार रूपये प्रति हैक्टेयर लाभ हो जाता है। ग्वारपाठे की पत्तियों की तुड़ाई वर्ष में तीन से चार बार की जाती है। किसान को मण्डी अथवा बाजार में फसल ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती है। ग्वारपाठा के उत्पाद बनाने वाली फर्म अथवा इकाईयों से सम्पर्क करने पर उनके प्रतिनिधि खुद खेत पर आकर कटी पत्तियां खरीद ले जाते हैं। खेत में एक बार इसे उगाने के बाद इस पौधे का विस्तार होता रहता है।
मदर प्लांट्स (मातृ पौध) के पास डॉटर प्लांट्स (प्ररोह-छोटे पौधे) तैयार होते रहते हैं। किसान इन छोटे पौधों को बेच कर अतिरिक्त लाभ भी कमा सकते हैं। ग्वारपाठे के छोटे पौधों की पहली बार खेती करने वाले अथवा नर्सरी लगाने वाले खरीद कर ले जाते हैं। किसान को अपने खेत में ग्वारपाठे उगाने के लिए
छोटे पौधों को खरीदते समय इस बात की सावधानी रखनी चाहिए की प्ररोह 9 से 12 इंच का हो, इससे छोटे पौधे सस्ते तो मिल जाते हैं, लेकिन इन पौधों के विकसित होने से पहले ही उनके नष्ट होने का खतरा रहता है। ग्वारपाठे के छोटे पौधे एक से डेढ़ रूपघ् में मिल जाते हैं।
राजस्थान में ग्वारपाठा की खेती बीकानेर संभाग में सर्वाधिक होती है। इसके अलावा जोधपुर संभाग में भी कई गांवों में इसकी खेती की जा रही है। इस औषधीय पौधे की खेती के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन प्रति हैक्टेयर 20 प्रतिशत का अनुदान 5 हैक्टेयर तक प्रदान करता है। उद्यान निदेशालय की एक रिपोर्ट के अनुसार एक हैक्टेयर पर ग्वारपाठा की खेती के लिए होने वाले 42500 रूपये के खर्च में से 8500 रूपये का अनुदान सरकार उपलब्ध कराती है। जोधपुर स्थिति केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान एकाजरी एवं जयपुर के समीप जोबनेर में कृषि अनुसंधान केन्द्र में ग्वारपाठे की खेती के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा जयपुर में कृषि पंत भवन में उद्यान निदेशालय से भी विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आयुर्वेद में घृतकुमारी और स्थानीय बोलचाल में ग्वारपाठा के रूप को जानने वाले इस प्राचीन पौधे की औषधीय उत्पादों में खास उपादेयता है, जबकि सौन्दर्य प्रसाधान की सामग्री में यह ग्वारपाठा के रूप में लोकप्रिय है। हर्बल उत्पादों की वस्तुओं में ग्वारपाठा सबसे पहले पाया जाता है।
जोधपुर संभाग के जैसलमेर जिले के पोकरण, राजमथाई, डाबला, बांधेवा आदि गांवों में ग्वारपाठे की खेती का विस्तार हो रहा है। यहां होने वाला ग्वारपाठा तीन रूपये प्रति किलोग्राम की दर से हरिद्वार भेजा जाता है। इसकी खेती करने वाले सागरमल, जोगराज एवं हाजी खां के अनुसार हरिद्वार स्थित आयुर्वेदिक औषधियां बनाने वाली एक कंपनी अपना वाहन लेकर यहां आती है तथा ग्वारपाठा खरीद कर ले जाती है।
जिले में 200 बीघा से अधिक भूमि पर इसकी खेती की जा रही है। इसके अतिरिक्त नागौर, अजमेर, सीकर, झुंझुनू घ्घ्घ् चुरू सहित राज्य के विभिन्न जिलों में इसकी खेती के प्रति किसानों में जागृति आयी है तथा किसान ग्वारपाठा की खेती से जुड़ने लगे हैं।

यदि आप एलोवेरा की कृषि करने का सोच रहें है तो पहले जानें यें महत्वपूर्ण बातें

सीकर जिले के एक किसान को ग्वारपाठे का महत्व उस वक्त समझ में आयाए जब खेत-खलिहान में लगी आग से वहां बंधी भैंसे झुलस गई और उसके उपचार में ग्वारपाठा का गूदा रामबाण औषधि साबित हुआ।
पाली जिले के निमाज गांव के प्रगतिशील किसान श्री मदनलाल देवड़ा जिन्होंने अपने खेत पर ग्वारपाठा और आंवला उगाकर इसका मूल्यसंवर्धन तथा प्रसंस्करण करना शुरू कर दिया है, वे बताते हैं कि मैंने अपने खेत में आंवला एवं ग्वारपाठा की खेती को चुनौती के तौर पर लिया। आज मेरे खेत में साढ़े तीन हैक्टेयर में ग्वारपाठा उगा हुआ है। शुरू में लागत ज्यादा आती है, इसलिए किसान कतराता है। वहीं दूसरी ओर इसकी प्रक्रिया का कार्य करोड़पतियों के हाथ में होने से किसानों को उनकी ओर देखना पड़ता है। वे कहते हैं कि मुझे आज भी याद है कि मैंने चुरू में आंवले का ज्यूस चार बोतल से शुरू किया था। बीच-बीच में ऐसा भी लगा कि क्या मैं अपने उत्पाद बाजार में चला पाऊंगा ? लेकिन उत्पाद की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया तथा हौसला नहीं छोड़ा। आज मुझे इस बात की खुशी है कि दक्षिण भारत के बंगलुरू और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में मेरे द्वारा तैयार ग्वारपाठा एवं आंवला के रस ने दस्तक दे दी है और दो से ढाई लाख रूपये का रस हर माह वहां भेज रहा हूं। पाली जिले में इस समय 27 हैक्टेयर पर इसकी खेती की जा रही है। नागौर में भी कुछ काश्तकार इसकी खेती तथा फसलोत्तर कार्य में लगे हुये हैं।
इसकी खेती करने वाले काश्तकारों के अनुसार ग्वारपाठा का पौधा ऐसा पौधा है, जो थोड़ी .सी मेहनत के बाद बंजर भूमि में भी उग जाता है। इसे पशु, पक्षी तथा जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। राजस्थान के मरूस्थलीय इलाके में रासायनिक खादों का कम उपयोग होने से जैविक उत्पादन ज्यादा प्राप्त हो सकता है।
एक कृषि अधिकारी के मुताबिक राजस्थान में ग्वारपाठा के प्रसंस्‍करण कार्य में छोटी-बड़ी 20 से 30 इकाईयां लगी हुई हैं। ये इकाईयां बड़े उद्योगों की मांग के अनुरूप माल की आपूर्ति करती हैं। आने वाले समय में राजस्थान में व्यापक स्तर पर इसकी खेती की जा सकती है।

Wednesday, August 16, 2017

अश्वगंधा की खेतीफसल

अश्वगंधा की खेतीफसल 

लगाने कि दूरी  

कतार व पौधे में अंतर : 50-60 सें.मी.

उपयोग 

टॉनिक के रूप में, अनिद्रा, रक्त चाप, मूर्छा चक्कर,सिरदर्द, तंत्रिका विकास,हृदय रोग, रक्त कोलेस्ट्रॉल कम करने में, गठिया को नष्ट करने में बच्चों के सूखा रोग में, क्षय नाशक, रोग प्रतिरोधक क्षमताबढ़ाने में, चर्म रोग, फेफड़ों के रोग में, अल्सर तथा मंदाग्नि के उपचार में, जोड़ों की सूजन तथा अस्थि क्षय के उपचार में, कमर दर्द, कूल्हे का दर्द दूर करने में, रूकी हुई पेशाब को ठीक से उतारने में।

उन्नत किस्में

पेषिता, जे.ए. 20 , जे.ए. 134

मिट्टी एवं जलवायु     

उष्ण से समशीतोष्ण, औसत तापमान 20-24 डिग्री सें. तथा वर्षा 100 से.मी. वार्षिक। बलुई मिट्टी। भूमि का जल निकास अच्छा हो एवं पी.एच. मान 6-7 तक

उपयोगी भाग एवं उपज  

जड़, हरी पत्तियाँ। 6-8 क्विं. सूखी जड़े एवं बीज 1-2 क्विं./हे.।

बीजदर 

8- कि.ग्रा. बीज (सीधी बुआई) 5-7 कि.ग्रा. बीज (बिचड़ा तैयार करने में)

लगाने का समय

नर्सरी में बुआई : जून खेत में रोपाई : अगस्त –सितम्बर



सिंचाई शीत ऋतु में 3-5 बार सिंचाई करें ।

खाद एवं उर्वरक 

खाद व उर्वरक-सड़ी गोबर की खाद 15-20 टन/ प्रति हे.। बोनी के समय नेत्रजन 25 कि.ग्रा., स्फूर 30 कि.ग्रा. एवं पोटाश 30 कि.गा. प्रति हे.। १२.२५ कि.ग्रा. नेत्रजन पहली सिंचाई एवं 12.5 कि.ग्रा. दूसरी सिंचाइ के समय

तुड़ाई / खुदाई

पौधें की पत्तियां पीली और फल लाल होने पर पौधें को जड़ से उखाड़कर एवं जड़ों को काट कर सूखने के लिए दें

लागत 

23,000/- रुपये अनुमानित प्रति हेक्टेयर

शुद्ध लाभ प्रति हे. (रू) 

1,22,000/- रुपये अनुमानित प्रति हेक्टेयर

सुभद्रा कुमारी चौहान

सुभद्रा कुमारी चौहान ने लगभग 88 कविताएं और 46 कहानियां लिखीं। उनकी काव्य प्रतिभा बचपन से ही मानस पटल पर उतरने लगी थी। नौ वर्ष की आयु में ही उनकी पहली कविता प्रयाग से प्रकाशित हिंदी पत्रिका 'मर्यादा' में 'सुभद्रा कुँवरि' के नाम से प्रकाशित हुई।
आ, स्वतंत्र प्यारे स्वदेश आ, स्वागत करती हूँ तेरा,
तुझे देखकर आज हो रहा, दूना प्रमुदित मन मेरा...
सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम देश के शीर्ष महाकवियों मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन की यशस्वी परम्परा में आदर के साथ लिया जाता है। वह बीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक प्रसिद्ध कवयित्रियों में एक रही हैं। उन्होंने लगभग 88 कविताएंऔर 46 कहानियां लिखीं। उनका जन्म 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद के पास निहालपुर गाँव में हुआ था। एक सड़क दुर्घटना में उनका 15 फरवरी, 1948 को आकस्मिक देहावसान हो गया था। उनकी काव्य प्रतिभा बचपन से ही मानस पटल पर उतरने लगी थी। नौ वर्ष की आयु में ही उनकी पहली कविता प्रयाग से प्रकाशित हिंदी पत्रिका 'मर्यादा' में 'सुभद्रा कुँवरि' के नाम से प्रकाशित हुई। ऐसा कहा जाता है कि यह कविता ‘नीम’ के पेड़ पर लिखी गई थी। 
वह इतनी कुशाग्र बुद्धि थीं कि पढ़ाई में तो प्रथम आती ही थीं, स्कूल के काम की कविताएँ घर से आते-जाते रास्ते में ही लिख लेती थीं। एक गौरव की बात ये भी है कि सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा बचपन की सहेलियाँ थीं। सुभद्रा कुमारी की पढ़ाई नौवीं कक्षा के बाद छूट गई। बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी... स्निग्ध-अल्हड़ बचपन पर जितनी सुन्दर कविताएँ उन्होंने लिखीं, कम ही पढ़ने को मिलती हैं-
आ जा बचपन, एक बार फिर दे दो अपनी निर्मल शान्ति
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति।

उनके स्वर बचपन से ही विद्रोही थे। होश संभालने के साथ ही वह अंधविश्वास, जात-पांत से लड़ने लगी थीं। भारतीय संस्कृति में उनकी अगाध आस्था थी-

मेरा मंदिर, मेरी मस्जिद, काबा-काशी यह मेरी
पूजा-पाठ, ध्यान जप-तप है घट-घट वासी यह मेरी।
कृष्णचंद्र की क्रीड़ाओं को, अपने आँगन में देखो।
कौशल्या के मातृमोद को, अपने ही मन में लेखो।
प्रभु ईसा की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद का विश्वास
जीव दया जिन पर गौतम की, आओ देखो इसके पास।

'राष्ट्रभाषा' हिंदी से उनका गहरा सरोकार था, इसकी अभिव्यक्ति उनकी 'मातृ मन्दिर में' शीर्षक रचना में इस प्रकार हुई है-

'उस हिन्दू जन की गरविनी हिन्दी प्यारी हिन्दी का।
प्यारे भारतवर्ष कृष्ण की उस प्यारी कालिन्दी का।
है उसका ही समारोह यह उसका ही उत्सव प्यारा।
मैं आश्चर्य भरी आंखों से देख रही हूँ यह सारा।
जिस प्रकार कंगाल बालिका अपनी माँ धनहीता को।
टुकड़ों की मोहताज़ आज तक दुखिनी की उस दीना को।"
वह आजीवन राष्ट्रीय चेतना की सजग कवयित्री रहीं। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को अपनी कहानियों में भी व्यक्त किया। भग्नावशेष, होली, पापीपेट, मंझलीरानी, परिवर्तन, दृष्टिकोण, कदम के फूल, किस्मत, मछुए की बेटी, एकादशी, आहुति, थाती, अमराई, अनुरोध, ग्रामीणा आदि उनकी कहानियों की भाषा सरल बोलचाल की है। अधिकांश कहानियां नारी विमर्श पर केंद्रित हैं। 'उन्मादिनी' शीर्षक से उनका दूसरा कथा संग्रह 1934 में छपा। इस में उन्मादिनी, असमंजस, अभियुक्त, सोने की कंठी, नारी हृदय, पवित्र ईर्ष्या, अंगूठी की खोज, चढ़ा दिमाग, वेश्या की लड़की कुल नौ कहानियां हैं। इन सब कहानियों का मुख्य स्वर पारिवारिक सामाजिक परिदृश्य ही है। 'सीधे साधे चित्र' उनका तीसरा और अंतिम कथा संकलन रहा। वह रचनाकार होने के साथ ही स्वाधीनता संग्राम सेनानी भी रहीं। स्वातंत्र्य युद्ध करते हुए देश पर मर मिटीं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई पर लिखीं उनकी लोकप्रिय पंक्तियां भारतीय जन-गण का कंठहार बनीं-
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।