
Friday, August 31, 2018
Thursday, August 30, 2018
Saturday, August 25, 2018
YUMMY and FRESH RAMKELA MANGO PICKLE and other PICKLES
YUMMY and FRESH RAMKELA MANGO PICKLE and other PICKLES :-
@ Rs 300/pack
# Mango Pickle
# Amla/ Chilli -Green nd Red & Gajar spicy
#Nimbu-khatta and khatta meetha(Good for digestion)
# Garlic & Teed Pickle & Mango Chatni & Mango Lachha ( Rs 350)
Pack qty 900 gms Shipping extra
Inbox for order or ping at 9873625679
@ Rs 300/pack
# Mango Pickle
# Amla/ Chilli -Green nd Red & Gajar spicy
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# Garlic & Teed Pickle & Mango Chatni & Mango Lachha ( Rs 350)
Pack qty 900 gms Shipping extra
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Friday, August 24, 2018
खाद बनाने की विधि-
खाद बनाने की विधि-
धान की कटाई करने के बाद दानों को अलग करके बची हुई पुआल को जलाने के बजाय उसको छोटे-छोटे टुकड़ो में काट लेना चाहिए. उसके बाद इसे पूरी रात पानी में भिगोकर रखते हैं जिससे खाद जल्दी बनकर तैयार हो जाती हैं.
उसके बाद इन टुकड़ो को पानी से निकालकर 6 मीटर लंबी 2 मीटर चौड़ी और 1.5 मीटर गहरी खाई में इस प्रकार से डालते है कि एक परत पुआल की एवं एक परत गोबर रहे. बाद में इस पर गोबर की स्लरी से लेपन कर दिया जाता है. इस प्रकार कुल तीन परत बनाई जाती है.
कम्पोस्ट के सड़ने की गति को बढ़ाने के लिए इसमें ट्राइकोडर्मा कवक 50 ग्राम प्रति 100 किग्रा. पुआल की दर से मिलाया जाता है.
नाइट्रोजन व कार्बन अनुपात को कम करने के लिये 0.25 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति 100 किग्रा. पुआल के हिसाब से मिलाते हैं,जिससे यह प्राकृतिक वातावरण की तरह काम करता है.
इसमें पर्याप्त मात्रा में नमी बनाए रखने के लिए समय-समय पर पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए. महीने के अंतराल पर कम्पोस्ट को मिलाया जाता है ताकि पर्याप्त मात्रा में वायुसंचार बनी रहे. इस पूरी प्रक्रिया में चार महीने का समय लगता है.
पुआाल से तैयार खाद को मिट्टी में डालने से लाभ-
पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध फसल अवषेषों को गुणवत्ता वाली खाद बनाकर खेतों में पुर्नचक्रण कर सकते हैं. कम्पोस्ट की सहायता से इन फसल अवषेषों का आसानी से प्रबंधन किया जा सकता है जिससे पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है.
पुआल की खाद मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक अवस्था में सुधार करती है ये खाद पोषक तत्वों के मिनरलाइजेषन के बढ़ावा देती है साथ ही पोषक तत्वों को लंबे समय तक मृदा में बनाये रखती है.
पुआल की खाद मृदा में आवष्यक सभी सूक्ष्मजीवों के मध्य संतुलन बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
पुआल की खाद फसल वृद्धि एवं उत्पादन को बढ़ाती है तथा पर्यावरण प्रदूषण को कम करती है.
धान पुआल से बने खाद में पाए जाने वाले विभिन्न पोषक तत्व
पी. एच. 8.1
सी. ई. सी.(मोल/किग्रा.) 150
कुल कार्बन (प्रतिषत) 38.4
नाइट्रोजन (प्रतिषत) 1.64
कार्बन और नाइट्रोजन का अनुपात 23.3
फास्फोरस (प्रतिषत) 0.5
पोटैषियम (प्रतिषत) 1.41
सल्फर (प्रतिषत) 0.5
कैल्षियम (प्रतिषत) 2.45
मैग्निषयम (प्रतिषत) 1.48
आयरन (प्रतिषत) 0.16
मैंग्नीज (पी. पी. एम.) 385
कॉपर (पी. पी. एम.) 40.5
जिंक (पी. पी. एम.) 158
माइक्रोबियल बायोमास कार्बन (ग्रा./किग्रा.) 4
डिहाइड्रोजिनेज (µGtpf/g/h) 475
एसिड फास्फेट (µPNPg/h) 831
अल्केलाइन फास्फेट (1/4µgPNPg/h) 1985
लेखक:
1सुनिल कुमार 1तेज राम बंजारा,एवं एव संजू कुमावत
शोध छात्र1 एवं शोध छात्रा2
1शस्य विज्ञान विभाग, कृषि विज्ञान संस्थान,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (उ. प्र.)
2शस्य विज्ञान विभाग, श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्व विध्यालय जोबनेर जयपुर
Email: sunilgoyam675@gmail.com
Mob- 9452888663
ककोरा
कंटोला, केकरोल, काकरोल, ककोरा आदि नामो से जाना जाता है! यह एक स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य गुणों से भरपूर सब्जी है.
आमतौर पर किंकोड़ा जंगलों के साथ खेत की मेढ़ों पर पहली बारिश होने के साथ ही पैदा होने लगता है.
आमतौर पर किंकोड़ा जंगलों के साथ खेत की मेढ़ों पर पहली बारिश होने के साथ ही पैदा होने लगता है.
किंकोड़ा किसके खेत में पैदा होगा, यह नहीं कहा जा सकता और यह पूरी तरह से जंगली फल है जंगलों में भी जहां झाड़ियां अधिक होती हैं, वहां यह आसानी के साथ पैदा हो जाता है ..जितनी अच्छी बारिश होगी,किंकोड़ा की पैदावार भी उतनी ही अच्छी होगी! फाइबर से भरपूर किंकोड़ा पाचन को सही रखता है !
इसमें मौजूद ल्यूटेन, केरोटोनोइड्स विभिन्न नेत्र रोग, हृदय रोग और यहां तक कि #कैंसर_की_रोकथाम में भी सहायक है ..इसके एंटी-एलर्जन और एनाल्जेसिक गुण सर्दी-खांसी से राहत प्रदान करने और इसे रोकने में मदद करते हैं!
गुलमेहँदी
लगभग 15 से 20 वर्ष पूर्व तक हमारे गांव में ढ़ेरो गुलतेवड़ी के पौधे बारिश में उग आते थे,जो श्रावण मास से क्वार मास तक के सभी त्योहारों पर अपने फूल हमे देते रहते थे.....इसके अनेक रंग होते थे,अधिकांश घर वाले इसके बीजो को सहेज कर रखते थे..पर अब स्थिति विपरीत है ,इसके दर्शन भी नही होते.....।
गुलतेवड़ी को बालसम,गौरी के फूल, तेरडा,गुलमेहँदी,गुला आदि नामों से जाना जाता है.......इसके फलों को छूते ही ये फूट कर इल्ली जैसे लगते है. दूसरों को डराने के लिए शरारती छोटे बच्चें इनका बहुत आनंद लेते है....।
जितना सुंदर गुलतेवड़ी का पौधा हैं,, उतने ही औषधीय गुणों से परिपूर्ण भी...गुलतेवड़ी पित्तशामक है.....इसके फूलों में एंटीबायोटिक की तरह गुण पाए गएँ है जो बैक्टीरिया और फंगस को मारते है......इसके फूल पौष्टिक और शीतल होते है.... जले हुए स्थान पर लगाने से आराम मिलता है. .....यह वनस्पति विरेचक (पेट साफ़ करने वाली ) , मूत्रल (शरीर का अतिरिक्त पानी हटाने वाली ) और अर्थराइटिस के लिए उपयोगी है......इसके बीजों से तेल निकलता है जो खाने में इस्तेमाल होता है और दिया जलाने के काम आता है......बाली द्वीप में इसके पत्तें खाए जाते है. ...चीन में इसके बीजों के चूर्ण का इस्तेमाल सुलभ प्रसूति के लिए किया जाता है....।
फिलिपिन्स में इसके फूलों का इस्तेमाल कटिशूल पर किया जाता है.....किसी कीड़े के काटने या सांप के काटने पर इसकी पत्तियों का रस लगाने से लाभ होता है...... इसके बीज कफ बाहर निकलने में सहायता करते है और इनका उपयोग कैंसर की चिकित्सा में होता है. ..।
हमारे मालवांचल में श्राद्ध पक्ष में संजा-सोलही के पर्व में इसके फूलो का उपयोग वर्षो से होता आया हैं...।
फिलिपिन्स में इसके फूलों का इस्तेमाल कटिशूल पर किया जाता है.....किसी कीड़े के काटने या सांप के काटने पर इसकी पत्तियों का रस लगाने से लाभ होता है...... इसके बीज कफ बाहर निकलने में सहायता करते है और इनका उपयोग कैंसर की चिकित्सा में होता है. ..।
हमारे मालवांचल में श्राद्ध पक्ष में संजा-सोलही के पर्व में इसके फूलो का उपयोग वर्षो से होता आया हैं...।
Tuesday, August 21, 2018
सोयाबीन टॉनिक का स्प्रे
साथियों कपास की फसल 3 महीने की हो चुकी है और फूल आ रहे हैं और डोडे बनाना स्टार्ट हो गया है बहुत अच्छी ग्रोथ करें और उत्पादन अच्छा हो इसीलिए सोयाबीन टॉनिक का स्प्रे करने जा रहा हूं साथियों आपसे अनुरोध करता हूं कि आप भी इसका प्रयोग एक बार जरुर करके देखें बहुत अच्छा रिजल्ट मिलेगा!
#आवश्यक_सामग्री -
1 किलोग्राम सोयाबीन, 250सौ ग्राम गुड, और 5 लीटर पानी
1 किलोग्राम सोयाबीन, 250सौ ग्राम गुड, और 5 लीटर पानी
#बनाने_का_तरीका -
साथियों इसको बनाने के लिए हमें सर्वप्रथम 1 किलो सोयाबीन लेना है और उस सोयाबीन को पानी के अंदर 24 घंटे तक रखना है सोयाबीन का दाना पूरी तरह से फूल जाएगा! बाद में निकालकर हमें मिक्सर की सहायता से या मिक्सर नहीं है तो उस को कूटकर चटनी बना लेनी है चटनी बनाने के बाद में जिस बर्तन में हमने सोयाबीन को 24 घंटे तक रखा था उस पानी और 5 लीटर पानी को लेकर हमें उस बर्तन में ले लेना है जिसमें हम टॉनिक तैयार करना चाहते हैं उस चटनी को उस पानी के अंदर डाल देना है जो हमारे पास 250 ग्राम गुड़ है उसको भी इसमें डाल देना है और इस को 3 से 4 दिन सुबह शाम लकड़ी की सहायता से हिलाना है 3 से 4 दिन बाद मे यह
टॉनिक पूरी तरह से तैयार हो जाएगा फिर सूती के वस्त्र में इसको छानकर फसल ले कर देना है इसकी मात्रा प्रति 16 लीटर वाले पंप में 500ML मिलाकर स्प्रे करना है
साथियों इसको बनाने के लिए हमें सर्वप्रथम 1 किलो सोयाबीन लेना है और उस सोयाबीन को पानी के अंदर 24 घंटे तक रखना है सोयाबीन का दाना पूरी तरह से फूल जाएगा! बाद में निकालकर हमें मिक्सर की सहायता से या मिक्सर नहीं है तो उस को कूटकर चटनी बना लेनी है चटनी बनाने के बाद में जिस बर्तन में हमने सोयाबीन को 24 घंटे तक रखा था उस पानी और 5 लीटर पानी को लेकर हमें उस बर्तन में ले लेना है जिसमें हम टॉनिक तैयार करना चाहते हैं उस चटनी को उस पानी के अंदर डाल देना है जो हमारे पास 250 ग्राम गुड़ है उसको भी इसमें डाल देना है और इस को 3 से 4 दिन सुबह शाम लकड़ी की सहायता से हिलाना है 3 से 4 दिन बाद मे यह
टॉनिक पूरी तरह से तैयार हो जाएगा फिर सूती के वस्त्र में इसको छानकर फसल ले कर देना है इसकी मात्रा प्रति 16 लीटर वाले पंप में 500ML मिलाकर स्प्रे करना है
#फसल_को_फायदा -
सोयाबीन में पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, कैल्शियम, सल्फर इत्यादि प्रचुर मात्रा में होते है जिसकी फसल को बहुत ज्यादा आवश्यकता होती हैं और इस तकनीकी के कारण फसल में फूल वाली अवस्था में स्प्रे करते हैं तो ज्यादा फूल आते हैं और पौधा अच्छी ग्रोथ करता है यह टॉनिक सभी फसलों के लिए बहुत ही सहायक होता है!
सोयाबीन में पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, कैल्शियम, सल्फर इत्यादि प्रचुर मात्रा में होते है जिसकी फसल को बहुत ज्यादा आवश्यकता होती हैं और इस तकनीकी के कारण फसल में फूल वाली अवस्था में स्प्रे करते हैं तो ज्यादा फूल आते हैं और पौधा अच्छी ग्रोथ करता है यह टॉनिक सभी फसलों के लिए बहुत ही सहायक होता है!
नीम का वृक्ष प्रकृति का अनुपम उपहार हैं
नीम का वृक्ष प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। नीम से तैयार किये गए उत्पादों का कीट नियंत्रण अनोखा हैं, इस कारण नीम से बनाई गई दवा विश्व में सबसे अच्छी कीट नियंत्रण दवा मानी जाती हैं। लेकिन इसके उपयोग को लोग अब भूल रहे हैं। इसका फायदा अब बड़ी-बड़ी कम्पनिया उठा रही हैं ये कम्पनिया इसकी निम्बोलियों व पत्तियों से बनाई गई कीटनाशक दवाये महंगे दामों पर बेचती हैं।
इसकी कड़वी गन्ध से सभी जिव दूर भागते हैं। वे कीट जिनकी सुगंध क्षमता बहुत विकसित हो गयी हैं, वे इसको छोड़कर दूर चले जाते हैं जिन पर नीम के रसायन छिड़के गए हों।
इसके संपर्क में मुलायम त्वचा वाले कीट जैसे चेंपा, तैला, थ्रिप्स, सफेद मक्खी आदि आने पर मर जाते हैं। नीम का मनुष्य जीवन पर जहरीला प्रभाव नहीं पड़ना ही इसको दवाओं के रूप में उच्च स्थान दिलाता हैं। नीम की निम्बोलिया जून से अगस्त तक पक कर गिरती हैं निम्बोली का स्वाद हल्का मीठा होता हैं।
इसकी निम्बोली गिरने पर सड़कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु गिरी सफेद गुठली से ढकी होने के कारण लम्बे समय तक सुरक्षित रहती हैं। निम्बोली को तोड़ने पर 55% भाग गुठली के रूप में अलग हो जाता हैं। तथा 45% गिरी के रूप में प्राप्त होता हैं। अच्छे ढंग से संग्रहित की गई गिरी हरे भूरे रंग की होती हैं।
नीम से तैयार दवाइयों के अनेक गुण
- रासायनिक दवाइयों की स्प्रे नीम में मिलाकर करें। इस तरह करने से रासायनिक दवाइयों के प्रयोग में 25-30 प्रतिशत तक कमी आती है।
- नीम की स्प्रे सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।
- नीम केक पाउडर डालने से खेत में बहुत तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं जैसे कि इससे पौधे निमाटोड और फंगस से बचे रहते हैं। इस विधि से ज़मीन के तत्व आसानी से पौधे में मिल जाते हैं।
- नीम हानिकारक कीटों के जीवन चक्र को भी प्रभावित करती है, जैसे कि अंडे, लार्वा आदि। इसके अलावा भुंडियों, सुंडियों और टिड्डों आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। यह रस चूसने वाले कीटों की ज्यादा रोधक नहीं है।
- यदि नीम का गुद्दा यूरिया के साथ प्रयोग किया जाये, तो खाद का प्रभाव बढ़ जाता है और ज़मीन के अंदरूनी हानिकारक बीमारियों और कीटों से बचाव होता है।
- दीमक से बचाव के लिए 3-5 किलो नीम पाउडर को बिजाई से पहले एक एकड़ मिट्टी में मिलायें।
- मूंगफली में पत्ते के सुरंगी कीट के लिए 1.0 प्रतिशत नीम के बीजों का रस या 2 प्रतिशत नीम के तेल की स्प्रे बिजाई के 35-40 दिनों के बाद करें।
- जड़ों में गांठे बनने की बीमारी की रोकथाम के लिए 50 ग्राम नीम पाउडर को 50 लीटर पानी में पूरी रात डुबोयें और फिर स्प्रे करें
Sunday, August 19, 2018
इससे इल्ली सफेद माखी महु मर जायेगा
जैविक दवाई :-
250 ग्राम प्याज
250 ग्राम लहसुन
250 ग्राम हरी मिर्ची
250 ग्राम अदरक
चारो को कूट कर बारीक करके 8 लीटर कुनकुने पानी मे मिक्स कर ऐसे एक दिन के लिए रख दे ।
16 लीटर की टंकी में 500 ml मिक्स कर प्रयोग करे।
इससे इल्ली सफेद माखी महु मर जायेगा
250 ग्राम प्याज
250 ग्राम लहसुन
250 ग्राम हरी मिर्ची
250 ग्राम अदरक
चारो को कूट कर बारीक करके 8 लीटर कुनकुने पानी मे मिक्स कर ऐसे एक दिन के लिए रख दे ।
16 लीटर की टंकी में 500 ml मिक्स कर प्रयोग करे।
इससे इल्ली सफेद माखी महु मर जायेगा
Saturday, August 18, 2018
रतनजोत (Ratanjot) बहुवर्षीय, लघु आकार का बहुउपयोगी क्षमता वाल एवं अखाद्य तिलहनी झाड़ीनुमा पौधा है
रतनजोत (Ratanjot) बहुवर्षीय, लघु आकार का बहुउपयोगी क्षमता वाल एवं अखाद्य तिलहनी झाड़ीनुमा पौधा है। इसके बीजों में 30-40% तेलीय वसा होती है। उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमंद, चित्तौरगढ़ जिलों में इसके पौधे बहुतायत में मिलते है। इसके अन्य नाम जंगली काली अरण्डी एवं काली बत्ती है। Read also - कांगणी/काकुन की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक जलवायु एवं भूमि रतनजोत की खेती सूखाग्रस्त, असिंचित, कम गहराई एवं कम उपजाऊ भूमियों में सुविधापूर्वक की जा सकती है। जलभराव वाली भूमिया अनुपयुक्त है। मिट्टी का पी.एच. मान 5.5 से 8.5 होना आवश्यक है। इसकी खेती हेतु 0.5% ढाल वाली भूमि विशेष रूप से उपयुक्त रहती है। क्षेत्र जहां औसत वार्षिक वर्षा 500 मिली मीटर या इससे ऊपर है अधिक उपयुक्त रहता है। भूमि का उपचार खेत की तैयारी के समय ट्राइकोडर्मा 2.5 किलो प्रति 100 किलो ग्राम कंपोस्ट में मिलाकर प्रति हेक्टर में कुड में प्रयोग करें। बीज की बुवाई एक हेक्टेयर रोपण हेतु 5 से 6 किलो बीज की आवश्यकता होती है। पौध क्यारियों या पॉलिथीन की थैलियों में मार्च अप्रैल माह में तैयार करें। क्यारियों में बुवाई 10 से 15 सेंटीमीटर की दूरी पर करें। प्रत्येक थैली में दो बीज बोये तथा झारे से सिंचाई करें। ध्यान रखें कि 1 से 2 सेंटीमीटर से अधिक गहरा न जाय। Read also - किसानों की आय दुगनी करने में पशुपालन की भूमिका एवं रणनीति पौध रोपण पौध रोपण दो तरीके से करते हैं। सीधे बीज से तथा पौधे नर्सरी से। रोपण/बुवाई मानसून आगमन के साथ जुलाई से अगस्त माह में करे। निर्धारित दूरी पर 30X30 सें.मी. का गड्ढा खोदकर करें। सिंचित कृषि योग्य भूमि पर सघन वृक्षारोपण हेतु कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर रखें जबकि असिंचित, बंजर, चारागाह, भूमि पर यह दूरी 2 मीटर रखे। उर्वरक कारक (वर्षा,सिंचित,असिंचित, किस्म,उपयोगिता) नाइट्रोजन प्रति/पौधा फास्फोरस प्रति/पौधा पोटाश प्रति/पौधा प्रति/पौधा सामान्य 20 ग्राम यूरिया 150 ग्राम SSP 20 ग्राम MOP 1किग्रा FYM यूरिया दो भागों में बांटकर रोपण के एक एवं दो माह उपरांत देंवे। Read also - सोयाबीन टॉनिक घर पर बनाकर ले अधिक उपज निराई गुड़ाई एक वर्ष में 2-3 बार पौधों की प्रारंभिक बढ़वार के समय निराई गुड़ाई कर खरपतवार अवश्य निकाल दे। सिंचाई रतनजोत सूखे के प्रति काफी सहनशील होता है। पानी की कमी व अधिक गर्मी को सहन कर लेता है। मानसून समाप्ति पश्चात प्रति माह सिंचाई देने से अधिक उपज प्राप्त होती है। यदि सिंचाई की सुविधा नहीं हो तो कटाई छटाई के बाद एक सिंचाई अवश्य कर दें। अंतराशस्य रतनजोत की रोपाई 4X3 मीटर की दूरी पर करने तथा खाली जगह में मूंग, उड़द, ग्वार इत्यादि बोने से अधिक उपज एवं आय प्राप्त होती है। Read also - नील हरित शैवाल जैव उर्वरक उत्पादन तकनीक एवं महत्व कटाई छटाई मार्च माह में पौधों को धरातल से 50 से.मी. ऊंचाई से ऊपर का भाग काट दे। दूसरे वर्ष मार्च माह में पौधों की एक तिहाई शाखाओं को छोड़कर शेष दो तिहाई को काट दें। ऐसा करने से पौधा छतरी के आकार का हो जाता है। फल तुड़ाई रोपण के दो वर्ष बाद पोधो में फलन होता है। फल गुच्छे में लगते हैं। जब फल काले पड़ जाए तब तोड़कर सूखा ले। ऊपर का छिलका हटाकर काले रंग के बीज निकल ले। Read also - गाजर घास स्वरस से फसलों में नाइट्रोजन की पूर्ति कैसे करें रतनजोत की फसल में संरक्षण तंबाकू की लट यह पत्ती खुरच कर खाती हैं व उसे जालीनुमा बना देती हैं। इसके नियंत्रण हेतु थयोडिकार्ब 75 एस.पी. 175 2 ग्राम या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 2 मी.ली. या एसीफेट 25 एस.पी. २ ग्राम, या क्विनालफॉस 25 ई.सी. 2 मी.ली. का प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। नीली व हरी बग यह फलों का रस चुस्ती है। रोकथाम के लिए डाइमेथोएट 30 ई.सी. एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। जड़ गलन रोग इसमें जड़े गल कर सड़ जाती हैं व पौधा सूख जाता है। पानी भराव वाले स्थानों पर पौधों को बांड पर लगावे। बीजों का कार्बेंडाजिम 4 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोये। पत्ती धब्बा रोग पत्ती धब्बा रोग फफूंद जनित रोग है। पत्ती पर ताम्र रंग के धब्बे बनते हैं। कॉपर आक्सीक्लोराइड 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। उपज रतनजोत की फसल सिंचित और असिंचित दशा में क्रमश: तीसरे व दूसरे वर्ष फल देना शुरु कर देती है। 6 वर्ष बाद सिंचित परिस्थितियों में 3.50 से 4.00 किलो प्रति पौधा (50 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टर) तथा असिंचित परिस्थितियों में 2.50 से 3.00 किलो प्रति पौधा (20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टर) बीज प्राप्त होते हैं। इस प्रकार से बीज प्राप्ति सतत रूप से 35 वर्ष तक होती रहती है। Read also - रविशंकर रजक- एक किसान की हवाई उड़ान की कहानी
Friday, August 10, 2018
रोजाना सुबह चना खाएंगे तो नहीं पड़ेगी डॉक्टर की जरूरत
रोजाना सुबह चना खाएंगे तो नहीं पड़ेगी डॉक्टर की जरूरत
सस्ता और आसान सा दिखने वाला चना हमारे सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। काला चना भुने हुए हों, अंकुरित हों या इसकी सब्जी बनाई हो, यह हर तरीके से सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं। इसमें भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और विटामिन्स पाए जाते हैं। इसका रोजाना सुबह सेवन करना चाहिए। आइए आज हम बताते हैं कि आखिर चना हमारे लिए किन-किन तरीकों से लाभदायक है?
जानिए चने से मिलने वाले फायदों के बारे में...
शरीर को सबसे ज्यादा फायदा अंकुरित काले चने खाने से होता है, क्योंकि अंकुरित चने क्लोरोफिल, विटामिन ए, बी, सी, डी और के, फॉस्फोरस, पोटैशियम, मैग्नीशियम और मिनरल्स का अच्छा स्रोत होते हैं। साथ ही इसे खाने के लिए किसी प्रकार की कोई खास तैयारी नहीं करती पड़ती। रातभर भिगोकर सुबह एक-दो मुट्ठी खाकर हेल्थ अच्छी हो सकती है।
चने में मौजूद फाइबर की मात्रा पाचन के लिए बहुत जरूरी होती है। रातभर भिगोए हुए चने से पानी अलग कर उसमें नमक, अदरक और जीरा मिक्स कर खाने से कब्ज जैसी समस्या से राहत मिलती है। साथ ही जिस पानी में चने को भिगोया गया था, उस पानी को पीने से भी राहत मिलती है। लेकिन कब्ज दूर करने के लिए चने को छिलके सहित ही खाएं।
रोजाना सुबह काला चना खाने से फिट तो रहते ही है साथ ही जल्द एनर्जी देने में भी सहायक होता है। रातभर भिगोए हुए या अंकुरित चने में हल्का सा नमक, नींबू, अदरक के टुकड़े और काली मिर्च डालकर सुबह नाश्ते में खाएं, बहुत फायदेमंद होता है। आप चने का सत्तू भी खा सकते हैं। यह बहुत ही फायदेमंद होता है। गर्मियों में चने के सत्तू में नींबू और नमक मिलाकर पीने से शरीर को एनर्जी तो मिलती ही है, साथ ही भूख भी शांत होती है।
दूषित पानी और खाने से आजकल किडनी और गॉल ब्लैडर में पथरी की समस्या आम हो गई है। हर दूसरे-तीसरे आदमी के साथ स्टोन की समस्या हो रही है। इसके लिए रातभर भिगोए हुए काले चने में थोड़ी सी शहद की मात्रा मिलाकर खाएं। रोजाना इसके सेवन से स्टोन के होने की संभावना काफी कम हो जाती है और अगर स्टोन है तो आसानी से निकल जाता है। इसके अलावा चने के सत्तू और आटे से मिलकर बनी रोटी भी इस समस्या से राहत दिलाती है।
चना ताकतवर होने के साथ ही शरीर में एक्स्ट्रा ग्लूकोज की मात्रा को कम करता है जो डायबिटीज के मरीजों के लिए कारगर होता है। लेकिन इसका सेवन सुबह-सुबह खालीपेट करना चाहिए। चने का सत्तू डायबिटीज से बचाता है। एक से दो मुट्ठी काले चना का सेवन करने से ब्लड शुगर की मात्रा को भी नियंत्रित करता है।
शरीर में आयरन की कमी से होने वाली एनीमिया की समस्या को रोजाना चने खाकर दूर किया जा सकता है। चने में शहद मिलाकर खाने से जल्द असर करता है। आयरन से भरपूर चना एनीमिया की समस्या को काफी हद तक कम कर देता है। चने में 27 फीसदी फॉस्फोरस और 28 फीसदी आयरन होता है जो न केवल नए बल्ड सेल्स को बनाता है, बल्कि हीमोग्लोबिन को भी बढ़ाता है।
हिचकी की समस्या से ज्यादा परेशान हैं, तो चने के पौधे के सूखे पत्तों का धूम्रपान करने से हिचकी आनी बंद हो जाती है। साथ ही चना आंतों-इंटेस्टाइन की बीमारियों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है।
बुखार में ज्यादा पसीना आने पर भुने हुए चने को पीसकर, उसमें अजवायन मिलाएं। फिर इससे मालिश करें। ऐसा करने से पसीने की समस्या खत्म हो जाती है। भुने हुए चने का सेवन करने से बार-बार पेशाब जाने की बीमारी दूर होती है। साथ ही गुड़ व चना खाने से यूरीन से संबंधित किसी भी प्रकार की समस्या में राहत मिलती है। रोजाना भुने हुए चनों के सेवन से बवासीर ठीक हो जाती है।
चीनी-मिट्टी के बर्तन में रातभर भिगोए हुए चने को चबा-चबाकर खाना पुरुषों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। पुरुषों की कई प्रकार की कमजोरी की समस्या खत्म होती है। जल्द असर के लिए भीगे हुए चने के साथ दूध भी पिएं। भीगे हुए चने के पानी में शहद मिलाकर पीने से पौरुषत्व बढ़ता है।
केवल हेल्थ के लिए ही नहीं, स्किन के लिए भी बहुत फायदेमंद है। चना खाकर चेहरे की रंगत को बढ़ाया जा सकता है। वैसे चने की फॉर्म बेसन को हल्दी के साथ मिलाकर चेहरे पर लगाने से त्वचा ग्लो करने लगती है।
चने में मौजूद फाइबर की मात्रा पाचन के लिए बहुत जरूरी होती है। रातभर भिगोए हुए चने से पानी अलग कर उसमें नमक, अदरक और जीरा मिक्स कर खाने से कब्ज जैसी समस्या से राहत मिलती है। साथ ही जिस पानी में चने को भिगोया गया था, उस पानी को पीने से भी राहत मिलती है। लेकिन कब्ज दूर करने के लिए चने को छिलके सहित ही खाएं।
रोजाना सुबह काला चना खाने से फिट तो रहते ही है साथ ही जल्द एनर्जी देने में भी सहायक होता है। रातभर भिगोए हुए या अंकुरित चने में हल्का सा नमक, नींबू, अदरक के टुकड़े और काली मिर्च डालकर सुबह नाश्ते में खाएं, बहुत फायदेमंद होता है। आप चने का सत्तू भी खा सकते हैं। यह बहुत ही फायदेमंद होता है। गर्मियों में चने के सत्तू में नींबू और नमक मिलाकर पीने से शरीर को एनर्जी तो मिलती ही है, साथ ही भूख भी शांत होती है।
दूषित पानी और खाने से आजकल किडनी और गॉल ब्लैडर में पथरी की समस्या आम हो गई है। हर दूसरे-तीसरे आदमी के साथ स्टोन की समस्या हो रही है। इसके लिए रातभर भिगोए हुए काले चने में थोड़ी सी शहद की मात्रा मिलाकर खाएं। रोजाना इसके सेवन से स्टोन के होने की संभावना काफी कम हो जाती है और अगर स्टोन है तो आसानी से निकल जाता है। इसके अलावा चने के सत्तू और आटे से मिलकर बनी रोटी भी इस समस्या से राहत दिलाती है।
चना ताकतवर होने के साथ ही शरीर में एक्स्ट्रा ग्लूकोज की मात्रा को कम करता है जो डायबिटीज के मरीजों के लिए कारगर होता है। लेकिन इसका सेवन सुबह-सुबह खालीपेट करना चाहिए। चने का सत्तू डायबिटीज से बचाता है। एक से दो मुट्ठी काले चना का सेवन करने से ब्लड शुगर की मात्रा को भी नियंत्रित करता है।
शरीर में आयरन की कमी से होने वाली एनीमिया की समस्या को रोजाना चने खाकर दूर किया जा सकता है। चने में शहद मिलाकर खाने से जल्द असर करता है। आयरन से भरपूर चना एनीमिया की समस्या को काफी हद तक कम कर देता है। चने में 27 फीसदी फॉस्फोरस और 28 फीसदी आयरन होता है जो न केवल नए बल्ड सेल्स को बनाता है, बल्कि हीमोग्लोबिन को भी बढ़ाता है।
हिचकी की समस्या से ज्यादा परेशान हैं, तो चने के पौधे के सूखे पत्तों का धूम्रपान करने से हिचकी आनी बंद हो जाती है। साथ ही चना आंतों-इंटेस्टाइन की बीमारियों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है।
बुखार में ज्यादा पसीना आने पर भुने हुए चने को पीसकर, उसमें अजवायन मिलाएं। फिर इससे मालिश करें। ऐसा करने से पसीने की समस्या खत्म हो जाती है। भुने हुए चने का सेवन करने से बार-बार पेशाब जाने की बीमारी दूर होती है। साथ ही गुड़ व चना खाने से यूरीन से संबंधित किसी भी प्रकार की समस्या में राहत मिलती है। रोजाना भुने हुए चनों के सेवन से बवासीर ठीक हो जाती है।
चीनी-मिट्टी के बर्तन में रातभर भिगोए हुए चने को चबा-चबाकर खाना पुरुषों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। पुरुषों की कई प्रकार की कमजोरी की समस्या खत्म होती है। जल्द असर के लिए भीगे हुए चने के साथ दूध भी पिएं। भीगे हुए चने के पानी में शहद मिलाकर पीने से पौरुषत्व बढ़ता है।
केवल हेल्थ के लिए ही नहीं, स्किन के लिए भी बहुत फायदेमंद है। चना खाकर चेहरे की रंगत को बढ़ाया जा सकता है। वैसे चने की फॉर्म बेसन को हल्दी के साथ मिलाकर चेहरे पर लगाने से त्वचा ग्लो करने लगती है।
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धतूरा
धतूरा को कनक,उन्मत्त,धोत्रा, धोधरा,मानुल आदि नामो से जाना जाता है...।
भगवान #भोलेनाथ का अतिप्रिय फूल है धतूरा....जो फूल पत्ती किसी को पसंद नही होती वो भोलेनाथ को अर्पित होती है,,, भगवान शिव को वनस्पतियों के देवता भी कहा जाता है..।।
धतूरे का पौधा सारे भारत में सर्वत्र सुगमता के साथ मिलता है..... धतूरा सफेद, काला, नीला, पीला तथा लाल फूल वाला 5 जातियों का मिलता है......#धतूरा नशा अधिक लाता है और प्राणों का भी नाश कर देता है....धतूरे के पत्ते और बीज काफी विषैले होते हैं।
भगवान #भोलेनाथ का अतिप्रिय फूल है धतूरा....जो फूल पत्ती किसी को पसंद नही होती वो भोलेनाथ को अर्पित होती है,,, भगवान शिव को वनस्पतियों के देवता भी कहा जाता है..।।
धतूरे का पौधा सारे भारत में सर्वत्र सुगमता के साथ मिलता है..... धतूरा सफेद, काला, नीला, पीला तथा लाल फूल वाला 5 जातियों का मिलता है......#धतूरा नशा अधिक लाता है और प्राणों का भी नाश कर देता है....धतूरे के पत्ते और बीज काफी विषैले होते हैं।
धतूरे की प्रकृति बहुत ही गर्म होती है,,, इसका अत्यधिक सेवन व्यक्ति को पागल तक कर देता है...।
धतूरे के पत्तों का धूँआ दमा शांत करता है.... वही धतूरे के पत्तों का अर्क कान में डालने से आँख का दुखना बंद हो जाता है....धतूरे की जड सूंघे तो मृगीरोग शाँत हो जाता है.....धतूरे के कोमल पत्तो पर तेल चुपडे और आग पर सेंक कर बालक के पेट पर बाँधे इससे बालक़ की सर्दी दूर हो जाती है वही फोडा पर बाँधने से फोडा अच्छा हो जाता है.....यदि शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन हो तो बस धतूरे के पत्तों को हल्का गुनगुना कर गर्म कर सूजन वाले स्थान पर बाँध दें निश्चित लाभ मिलेगा।
धतूरे का उपयोग बड़ी ही सावधानी से वैद्य की सलाह में करे,,यह बहुत ही जहरीला होता है...।
धतूरे के पत्तों का धूँआ दमा शांत करता है.... वही धतूरे के पत्तों का अर्क कान में डालने से आँख का दुखना बंद हो जाता है....धतूरे की जड सूंघे तो मृगीरोग शाँत हो जाता है.....धतूरे के कोमल पत्तो पर तेल चुपडे और आग पर सेंक कर बालक के पेट पर बाँधे इससे बालक़ की सर्दी दूर हो जाती है वही फोडा पर बाँधने से फोडा अच्छा हो जाता है.....यदि शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन हो तो बस धतूरे के पत्तों को हल्का गुनगुना कर गर्म कर सूजन वाले स्थान पर बाँध दें निश्चित लाभ मिलेगा।
धतूरे का उपयोग बड़ी ही सावधानी से वैद्य की सलाह में करे,,यह बहुत ही जहरीला होता है...।
धतूरा कई क्षेत्रो से गायब हो गया है इसका संरक्षण और संवर्धन अति आवश्यक है...।।
कुछ जानकारी हो तो जरूर शेयर करे ।
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Wednesday, August 8, 2018
Wednesday, August 1, 2018
कैलाश ट्रैक के लिए
हमें 1 अगस्त को आदि कैलाश ट्रैक के लिए निकल जाना था... लेकिन... कैलाश बाबा की इच्छानुसार बात 15 दिनों के लिए टल गई है...
वहीं दूसरी ओर 6-9 सितंबर के बीच चकराता के पास एक ग्रुप-यात्रा होनी थी, लेकिन बहुत सारे मित्रों की इच्छानुसार इसे अब 29 सितंबर से 2 अक्टूबर तक आयोजित किया जाएगा...
यह आयोजन भीड़भाड़ से दूर पश्चिमी गढ़वाल के गाँवों और जंगलों में पूर्ण सुरक्षित वातावरण में होगा... सादा भोजन, सादा निवास... प्रत्येक आयुवर्ग के प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयुक्त... अकेली महिला और अकेले बच्चे के लिए भी...
कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा जल्द ही प्रकाशित की जाएगी...
यह आयोजन भीड़भाड़ से दूर पश्चिमी गढ़वाल के गाँवों और जंगलों में पूर्ण सुरक्षित वातावरण में होगा... सादा भोजन, सादा निवास... प्रत्येक आयुवर्ग के प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयुक्त... अकेली महिला और अकेले बच्चे के लिए भी...
कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा जल्द ही प्रकाशित की जाएगी...
इसके लिए हमने कई श्रेणियाँ बनाई हैं...
9000 रुपये... दिल्ली से दिल्ली तक टैक्सी से आना-जाना, होटल, भोजन सबकुछ शामिल
7000 रुपये... आप अपने साधन से तयशुदा स्थान पर पहुँचेंगे... यह बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है... होटल और भोजन का खर्च शामिल... आने-जाने का खर्च शामिल नहीं...
0 रुपये... अपने आने-जाने, ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था आप स्वयं करेंगे...
9000 रुपये... दिल्ली से दिल्ली तक टैक्सी से आना-जाना, होटल, भोजन सबकुछ शामिल
7000 रुपये... आप अपने साधन से तयशुदा स्थान पर पहुँचेंगे... यह बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है... होटल और भोजन का खर्च शामिल... आने-जाने का खर्च शामिल नहीं...
0 रुपये... अपने आने-जाने, ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था आप स्वयं करेंगे...
स्थान: चकराता से त्यूणी रोड पर 20 किमी आगे लोखंडी गाँव...
29 सितंबर को सुबह 7 बजे दिल्ली से प्रस्थान... 2 अक्टूबर को देर रात दिल्ली आगमन...
रजिस्ट्रेशन फीस: 2000 रुपये (नॉन रिफंडेबल), 0 रुपये वालों के लिए कोई रजिस्ट्रेशन नहीं...
दारू, शराब, बीयर पर पूर्ण प्रतिबंध...
अधिकतम सीटें: 16
इच्छुक मित्र जल्द से जल्द सूचित करें...
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