खाद बनाने की विधि-
धान की कटाई करने के बाद दानों को अलग करके बची हुई पुआल को जलाने के बजाय उसको छोटे-छोटे टुकड़ो में काट लेना चाहिए. उसके बाद इसे पूरी रात पानी में भिगोकर रखते हैं जिससे खाद जल्दी बनकर तैयार हो जाती हैं.
उसके बाद इन टुकड़ो को पानी से निकालकर 6 मीटर लंबी 2 मीटर चौड़ी और 1.5 मीटर गहरी खाई में इस प्रकार से डालते है कि एक परत पुआल की एवं एक परत गोबर रहे. बाद में इस पर गोबर की स्लरी से लेपन कर दिया जाता है. इस प्रकार कुल तीन परत बनाई जाती है.
कम्पोस्ट के सड़ने की गति को बढ़ाने के लिए इसमें ट्राइकोडर्मा कवक 50 ग्राम प्रति 100 किग्रा. पुआल की दर से मिलाया जाता है.
नाइट्रोजन व कार्बन अनुपात को कम करने के लिये 0.25 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति 100 किग्रा. पुआल के हिसाब से मिलाते हैं,जिससे यह प्राकृतिक वातावरण की तरह काम करता है.
इसमें पर्याप्त मात्रा में नमी बनाए रखने के लिए समय-समय पर पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए. महीने के अंतराल पर कम्पोस्ट को मिलाया जाता है ताकि पर्याप्त मात्रा में वायुसंचार बनी रहे. इस पूरी प्रक्रिया में चार महीने का समय लगता है.
पुआाल से तैयार खाद को मिट्टी में डालने से लाभ-
पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध फसल अवषेषों को गुणवत्ता वाली खाद बनाकर खेतों में पुर्नचक्रण कर सकते हैं. कम्पोस्ट की सहायता से इन फसल अवषेषों का आसानी से प्रबंधन किया जा सकता है जिससे पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है.
पुआल की खाद मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक अवस्था में सुधार करती है ये खाद पोषक तत्वों के मिनरलाइजेषन के बढ़ावा देती है साथ ही पोषक तत्वों को लंबे समय तक मृदा में बनाये रखती है.
पुआल की खाद मृदा में आवष्यक सभी सूक्ष्मजीवों के मध्य संतुलन बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
पुआल की खाद फसल वृद्धि एवं उत्पादन को बढ़ाती है तथा पर्यावरण प्रदूषण को कम करती है.
धान पुआल से बने खाद में पाए जाने वाले विभिन्न पोषक तत्व
पी. एच. 8.1
सी. ई. सी.(मोल/किग्रा.) 150
कुल कार्बन (प्रतिषत) 38.4
नाइट्रोजन (प्रतिषत) 1.64
कार्बन और नाइट्रोजन का अनुपात 23.3
फास्फोरस (प्रतिषत) 0.5
पोटैषियम (प्रतिषत) 1.41
सल्फर (प्रतिषत) 0.5
कैल्षियम (प्रतिषत) 2.45
मैग्निषयम (प्रतिषत) 1.48
आयरन (प्रतिषत) 0.16
मैंग्नीज (पी. पी. एम.) 385
कॉपर (पी. पी. एम.) 40.5
जिंक (पी. पी. एम.) 158
माइक्रोबियल बायोमास कार्बन (ग्रा./किग्रा.) 4
डिहाइड्रोजिनेज (µGtpf/g/h) 475
एसिड फास्फेट (µPNPg/h) 831
अल्केलाइन फास्फेट (1/4µgPNPg/h) 1985
लेखक:
1सुनिल कुमार 1तेज राम बंजारा,एवं एव संजू कुमावत
शोध छात्र1 एवं शोध छात्रा2
1शस्य विज्ञान विभाग, कृषि विज्ञान संस्थान,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (उ. प्र.)
2शस्य विज्ञान विभाग, श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्व विध्यालय जोबनेर जयपुर
Email: sunilgoyam675@gmail.com
Mob- 9452888663
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