Friday, May 25, 2018

rti story

मेरे लिए हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय दिनांक 18.05.2018"
1. (वर्ष 2010 में) पुलिस के अफसरों(हबीब खान गौराण आईपीएस, राघवेन्द्र सुहासा आईपीएस आदि) ने वर्दी की आड़ में, कानून हाथ में लेकर, गोवर्धन सिंह के जीवन को तहस नहस कर दिया....
2. पुलिस के इस समस्त कृत्य पर FIR दर्ज कर, सीबीआई को जांच दी जानी चाहिए अथवा न्यायिक जांच के आदेश किए जाने चाहिए...
3. राजस्थान सरकार गोवर्धन सिंह की सुरक्षा सहित यह सुनिश्चित करे कि गोवर्धन सिंह को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं हो सके....
4. गोवर्धन सिंह खुद के खिलाफ दर्ज सभी झूठे मुकदमों का विवरण सारणी बनाकर पेश करे और प्रकरण दिनांक 03.07.2018 को पुनः सुनवाई के लिए रखा जाए...
जस्टिस निर्मलजीत कौर
राजस्थान उच्च न्यायालय,
जोधपुर
आपको याद होगा वर्ष 2010 में मेरे खिलाफ बहुत सारे झूठे मुकदमे दर्ज हुए थे, RTI के तहत सूचना लेकर जिन भ्रष्ट लोगों के खिलाफ मैंने ACB में मुकदमे दर्ज कराए थे, उन सब लोगों ने हबीब खान गौराण आईपीएस, राघवेन्द्र सुहासा आईपीएस आदि को खरीद कर, मुझ पर घृणित आरोप लगाए थे। जिनमें से कुछ झूठे आरोप ऐसे थे:-
1. सेना के नक्शे मिले हैं पाकिस्तान से सम्बंध हो सकता है
2. नकली नोट छापने का आरोप
3. कम्प्यूटर में महिलाओं की नग्न तस्वीरें मिली है, हो सकता है इनको ब्लैकमेल किया गया हो
4. चोरी
5. लूट
6. धोखाधड़ी
7. ब्लेकमेलिंग
8. राजकार्य में बाधा
9. मानहानि
10. षडयंत्र
11. मारपीट
12. अन्य अनेकानेक झूठे आरोप भी...
बहुत सारे मुकदमे दर्ज करने के बाद हिष्ट्रीशीटर बना दिया गया और पुलिस अधीक्षक की अधिकतम सीमा का 2000 रुपये का ईनाम घोषित कर, राजस्थान के प्रत्येक पुलिस थाने में मेरा फोटो भी लगा दिया गया था, चोरी का झूठा आरोप लगाकर घर से मेरी कार ले गए, घर-कार्यालय का सारा सामान ले जाकर ताले लगा दिए, बैंक खाते सील कर दिए, भाई-बहनोई-साथियों को भी इन झूठे मामलों में फंसा दिया गया, मेरे एक साथी को नकली नोट छापने के मामले में 29 दिन जेल में रखा, मेरा मकान तोड़ने के लिए तहसीलदार ने नोटिस दिया जिसको न्यायालय ने 'स्टे' देकर रोका....
आख़िरकार सभी मुक़दमे हाईकोर्ट के सुपरविजन के कारण वर्ष 2010 में ही झूठे पाए गए और सभी मुकदमों में नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट न्यायालयों में पेश कर दी गई। भ्रष्टाचारी लोग, अपराधी किस्म के पुलिसकर्मियों के साथ मिलकर इन झूठे मुकदमों में मुझे एक मिनट के लिए भी बन्द नहीं रख पाए....
राई का पहाड़ बनाने के बारे में तो सुना है लेकिन बिना राई के भी पहाड़ बनाने की असफल कोशिश का अद्वितीय उदाहरण साबित हुआ है उक्त सम्पूर्ण प्रकरण.....बिना राई के पहाड़ बनाने की उक्त असफल कोशिश करने वालों में कई नेता, पत्रकार, सरकारी अफसर, ज़ज़ सहित कई अन्य लोग भी शामिल थे....
उन दिनों में कुछ लोगों ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए मुझे ब्लैकमेलर के रूप में प्रचारित किया, मैं उन लोगो को चुनौती देता हूँ कि वे इस तथ्य को प्रमाणित करना तो दूर, पूरी धरती से केवल एक व्यक्ति ऐसा लेकर आये जो मुझ पर ऐसा आरोप तक भी लगा सके, मुझे पता है कि जिन लोगों में सत्य के साथ खड़ा होने और भ्रष्टाचारियों से लड़ने का सामर्थ्य नहीं होता है उनके पास केवल ऐसी ओछी, तथ्यहीन एवं आधारहीन बातें ही होती हैं, लेकिन मेरी झूठी आलोचना मुझे लगातार ऊर्जावान बनाए रखती है.....
RTI लगाने वाली जनता यानि मालिकों को ब्लैकमेलर कहने वाले सभी नेता, अफसर और भ्रष्टाचारी मुझ पर ऐसा कोई आरोप साबित करके दिखाए अन्यथा नागरिकों के संवैधानिक अधिकार RTI का इस्तेमाल करने वालों पर ऐसा आरोप लगाकर राष्ट्र का अहित नहीं करें....यही चुनौती मैंने पूर्व DGP श्री ओमेन्द्र भारद्वाज को उनके चैम्बर में श्री प्रदीप व्यास IPS और श्री अनिल पालीवाल IPS के सामने दी थी, उसके बाद DGP साहब की आवाज़ ही नहीं निकली थी क्योंकि आरोप लगाना सरल है RTI लगाकर जिम्मेदार नागरिक(मालिक) बनना कठिन है.....मेरा दावा है ईमानदार से भी ईमानदार नागरिक जिस दिन पहली RTI लगा देगा, भ्रष्टाचारी उसी दिन से उसे ब्लैकमेलर कहने लगेंगे....
मेरे विरुद्ध झूठे आपराधिक प्रकरण दर्ज कराये थे, पुलिस मेरे विरूद्ध थी परन्तु सत्य, सत्य ही रहता है, सत्य के पथ पर सदा चला हूँ और चलता रहूँगा, पीठ पीछे बोलने वालों के कथनों से मेरी यात्रा कभी नहीं थमेगी, क्योंकि मेरा लक्ष्य व्यवस्था परिवर्तन के लिए है, मेरा संघर्ष भ्रष्टाचार के विरुद्ध है, सत्य का पथ, परमात्मा प्रदत्त हौसला और सच्चे साथियों के कारण मैं मेरे लक्ष्य की ओर अग्रसर हूँ....
आपका ही
गोवर्धन सिंह

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Thursday, May 24, 2018

NARENDRA MODI

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मेरे बच्चे क्यों रहेंगे साथ मेरे* *क्योंकि मेरी कोई जायदाद नहीं

दिल को छू लेने वाली कुछ पंक्तियां !
*तन्हा बैठी थी एक दिन मैं अपने मकान में,*
*चिड़िया बना रही थी घोंसला रोशनदान में।*
*पल भर में आती पल भर में जाती थी वो।*
*छोटे छोटे तिनके चोंच में भर लाती थी वो।*
*बना रही थी वो अपना घर एक न्यारा,*
*कोई तिनका था, ईंट उसकी कोई गारा।*
*कुछ दिन बाद....*
*मौसम बदला, हवा के झोंके आने लगे,*
*नन्हे से दो बच्चे घोंसले में चहचहाने लगे।*
*पाल रही थी चिड़िया उन्हे,*
*पंख निकल रहे थे दोनों के*
*पैरों पर करती थी खड़ा उन्हे।*
*देखती थी मैं हर रोज उन्हें*
*जज्बात मेरे उनसे कुछ जुड़ गए ,*
*पंख निकलने पर दोनों बच्चे*
*मां को छोड़ अकेला उड़ गए।*
*चिड़िया से पूछा मैंने..*
*तेरे बच्चे तुझे अकेला क्यों छोड़ गए,*
*तू तो थी मां उनकी*
*फिर ये रिश्ता क्यों तोड़ गए..*
*चिड़िया बोली...*
*परिन्दे और इंसान के बच्चे में यही तो फर्क है,*
*इंसान का बच्चा माया के दरिया में गर्क है।*
*इंसान का बच्चा.....*
*पैदा होते ही अपना हक जमाता है,*
*न मिलने पर वो मां बाप को*
*कोर्ट कचहरी तक ले जाता है।*
*मैंने बच्चों को जन्म दिया*
*पर करता कोई मुझे याद नहीं,*
*मेरे बच्चे क्यों रहेंगे साथ मेरे*
*क्योंकि मेरी कोई जायदाद नहीं

Thursday, May 17, 2018

आत्म मूल्यांकन

 आत्म मूल्यांकन ))))
.
कसाई के पीछे घिसटती जा रही बकरी ने सामने से आ रहे संन्यासी को देखा तो उसकी उम्मीद बढ़ी. मौत आंखों में लिए वह फरियाद करने लगी- ‘महाराज ! मेरे छोटे-छोटे मेमने हैं. आप इस कसाई से मेरी प्राण-रक्षा करें.
.मैं जब तक जियूंगी,अपने बच्चों के हिस्से का दूध आपको पिलाती रहूंगी.’ बकरी की करुण पुकार का संन्यासी पर कोई असर न पड़ा. वह निर्लिप्त भाव से बोला- ‘मूर्ख, बकरी क्या तू नहीं जानती कि मैं एक संन्यासी हूं.
.जीवन-मृत्यु, हर्ष-शोक, मोह-माया से परे. हर प्राणी को एक न एक दिन तो मरना ही है. समझ ले कि तेरी मौत इस कसाई के हाथों लिखी है. यदि यह पाप करेगा तो ईश्वर इसे भी दंडित करेगा.
.‘मेरे बिना मेरे मेमने जीते-जी मर जाएंगे…’ बकरी रोने लगी. 
.‘नादान, रोने से अच्छा है कि तू परमात्मा का नाम ले. याद रख, मृत्यु नए जीवन का द्वार है. सांसारिक रिश्ते-नाते प्राणी के मोह का परिणाम हैं. मोह माया से उपजता है. माया विकारों की जननी है. विकार आत्मा को भरमाए रखते हैं.’
.बकरी निराश हो गई. संन्यासी के पीछे आ रहे कुत्ते से रहा न गया।उसने पूछा- ‘संन्यासी महाराज, क्या आप मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं ?’
.लपककर संन्यासी ने जवाब दिया- ‘बिलकुल, भरा-पूरा परिवार था मेरा. सुंदर पत्नी, सुशील भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-ताऊ, बेटा-बेटी. बेशुमार जमीन-जायदाद… मैं एक ही झटके में सब कुछ छोड़कर परमात्मा की शरण में चला आ आया..
सांसारिक प्रलोभनों से बहुत ऊपर… सब कुछ छोड़ आया हूं. मोह-माया का यह निरर्थक संसार छोड़ आया हूं. जैसे कीचड़ में कमल…’ संन्यासी डींग मारने लगा.
.कुत्ते ने समझाया- आप चाहें तो बकरी की प्राणरक्षा कर सकते हैं. कसाई आपकी बात नहीं टालेगा. एक जीव की रक्षा हो जाए तो कितना उत्तम हो.’
.संन्यासी ने कुत्ते को जीवन का सार समझाना शुरू कर दिया- ‘मौत तो निश्चित ही है, आज नहीं तो कल, हर प्राणी को मरना है. इसकी चिंता में व्यर्थ स्वयं को कष्ट देता है जीव.’ संन्यासी को लग रहा था कि वह उसे संसार के मोह-माया से मुक्त कर रहा है.
.अभी संन्यासी अपना ज्ञान बघार ही रहा था कि तभी सामने एक काला भुजंग नाग फन फैलाए दिखाई पड़ा. वह संन्यासी पर न जाने क्यों कुपित था. मानों ठान रखा हो कि आज तो तूझे डंसूगा ही.
.सांप को देखकर संन्यासी के पसीने छूटने लगे. मोह-मुक्ति का प्रवचन देने वाले संन्यासी ने कुत्ते की ओर मदद के लिए देखा. कुत्ते की हंसी छूट गई.
.‘संन्यासी महोदय मृत्यु तो नए जीवन का द्वार है. उसको एक न एक दिन तो आना ही है, फिर चिंता क्या ? कुत्ते ने संन्यासी के वचन दोहरा दिए.
.इस नाग से मुझे बचाओ.’ अपना ही उपदेश भूलकर संन्यासी गिड़गिड़ाने लगा. मगर कुत्ते ने उसकी ओर ध्यान न दिया.
.कुत्ते ने चुटकी ली- ‘आप अभी यमराज से बातें करें. जीना तो बकरी चाहती है. इससे पहले कि कसाई उसको लेकर दूर निकल जाए, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना है.
.इतना कहते हुए कुत्ता छलांग लगाकर नाग के दूसरी ओर पहुंच गया. फिर दौड़ते हुए कसाई के पास पहुंचा और उस पर टूट पड़ा.
.आकस्मिक हमले से कसाई संभल नहीं पाया और घबराकर इधर-उधर भागने लगा. बकरी की पकड़ ढीली हुई तो वह जंगल में गायब हो गई.
.कसाई से निपटने के बाद कुत्ते ने संन्यासी की ओर देखा. संन्यासी अभी भी ‘मौत’ के आगे कांप रहा था.
.कुत्ते का मन हुआ कि संन्यासी को उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाए लेकिन मन नहीं माना. वह दौड़कर विषधर के पीछे पहुंचा और पूंछ पकड़ कर झाड़ियों की ओर उछाल दिया.
.संन्यासी की जान में जान आई. वह आभार से भरे नेत्रों से कुत्ते को देखने लगा.
.कुत्ता बोला- ‘महाराज, जहां तक मैं समझता हूं, मौत से वही ज्यादा डरते हैं, जो केवल अपने लिए जीते हैं.
.जीवन का समय-समय पर आत्म मूल्यांकन बहुत जरूरी है. हम संसार से छल कर सकते हैं, छुपा सकते हैं स्वयं से नहीं. इसलिए अपने हर कार्य को अपने अंतर्मन की कसौटी पर कसते रहना चाहिए.
.जो नियमित रूप से ऐसा करते रहते हैं उनमें उनके अंदर का ईश्वर जाग्रत रहता है. जिस दिन हम स्वयं से मुंह फेरने लगते हैं उस दिन से पतन का आरंभ हो जाता है.
.जो सिर्फ अपनी चिंता करें वैसे इंसान और पशु में क्या फर्क रहा. पशु भी दूसरों की चिंता कर लेते हैं.
गेरुआ पहनकर निकल जाने या कंठी माला डालकर प्रभु नाम जपने से कोई प्रभु का प्रिय नहीं हो जाता. जिसके मन में दया और करूणा नहीं उसे तो ईश्वर भी नहीं पूछते.
.धार्मिक प्रवचन उन्हें उनके पापबोध से कुछ पल के लिए बचा ले जाते हैं. जीने के लिए संघर्ष अपरिहार्य है. संघर्ष के लिए विवेक लेकिन मन में यदि करुणा-ममता न हों तो ये दोनों भी आडंबर बन जाते हैं--------------;;;;;

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Monday, May 14, 2018

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सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो

।।राम।।
एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो।
एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया। आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, *"बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।"* कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, '' *यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।*''
एक-दो रोगी आए थे। उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी। वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे। दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन करें।
वह साहब कहने लगे "वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अंधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया। ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी।
एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, '' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है। आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं। मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।"
आपने कहा था, "मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में होता है। जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था।
मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था, बस ठीक है। मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है। मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते।
मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है। मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।
वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है। हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था। मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है। मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।
वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, '' कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है। आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।" और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी। वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ''दहेज का सामान'' के सामने लिखा हुआ था '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''
काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो। आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने। वाह भगवान वाह! तू महान है तू दयावान है। मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।"
वैद्यजी ने आगे कहा,सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।

कल्याण ज्वेलर्स के स्टाफ का एक सदस्य समझौता करने के लिए पुलिस स्टेशन आया



ये घटना त्रिवेन्द्रम स्तिथ #कल्याण_ज्वेलर्स की है.एक पिता नें 29/11/2013 को अपनी बेटी की शादी के लिए एक नेकलेस खरीदा जिसका कुल वजन 49.580 ग्राम था तथा डिजाइनर स्टोन का वजन घटाने के बाद लगभग 43.500 ग्राम.

कुछ दिनों पहले 17/03/2018 को वो इस नेकलेस को बैंक के पास गिरवी रखने के लिए गये तो उन्हें झटका लगा जब बैंक के मुल्यांकनकर्ता (bank appraiser) नें जाँच के बाद बताया कि नेकलेस में सिर्फ 12 ग्राम के लगभग सोना है क्योंकि मोतियों के अंदर बाकी #वैक्स भरा गया है.

जब वो इस बात को लेकर वापिस कल्याण ज्वेलर्स के पास गये तो वहां के ब्रांच मेनेजर नें बोला कि ये सही है कि ये वैक्स भरा जाता है और ये बात सभी को पता होती है.

जरा सोचिये...
अगर पता हो तो कौन मुर्ख मोम को सोने के भाव खरीदेगा.....???

पिता द्वारा विरोध जताने पर मेनेजर बोला कि चलिए हम ये नेकलेस वापिस ले लेंगे तथा आपको आज के सोने के भाव पर पर आपको पैसे वापिस कर देंगे(जितना सोना है). लेकिन परिवार नहीं माना और बोला कि उन्हें वो वास्तविक रकम चाहिये जो उनसे खरीदते समय ली गई थी और उन्होंने नजदीकी पुलिस स्टेशन में इसकी शिकायत दर्ज कर दी.
21/03/2018 को कल्याण ज्वेलर्स के स्टाफ का एक सदस्य समझौता करने के लिए पुलिस स्टेशन आया और बोला कि हम ग्राहक की मांग अनुसार इन्हें इस नेकलेस की वही कीमत लौटा देंगे जो इनसे ली गई थी.

#सावधान_इंडिया,
बड़े बड़े फ़िल्मी सितारे इनके ब्रांड के विज्ञापन करते हैं और हमारे अन्धविश्वासी भारतीय उनकी बात मानकर ऐसे ब्रांडों वाले शोरूम में लुटने चल पड़ते हैं और इनके महलों को दुमहला बनाने में योगदान देते हैं....ऐसे ही जाने कितने लोगों को ये लोग ठग लेते हैं ......ऐसा मेरे और आपके साथ भी घट सकता है...तो जरा संभल के.



फादर्स डे*


*विदेशो में एक महिला 2 या तीन शादी करती है और पुरुष भी।*
इसलिए 
*उनकी संताने 14 पंद्रह साल के होने के बाद अलग रहने लगते है।*
और 
उनके *जैविक माता पिता* अपनी
अपनी *अलग अलग जिंदगी* जीते है।
इसलिए
*बच्चे साल में एक बार अपने माता या पिता से मिलने जाते है।*
लेकिन उनके *माता पिता तो साथ रहते नहीं है।*
इसलिए *माता को मिलने का अलग दिन निर्धरित*
किया है
और उसी तरह
*पिता से मिलने का अलग दिन।*
जो *मदर्स डे,*
*फादर्स डे*
के नाम से जाने जाते है।
*भारत में हम बच्चे अपने माता और पिता के साथ ही रहते है*
और
*वो दोनों भी पूरी जिंदगी अपने बच्चों के साथ रहते है।*
*इसलिये यहाँ हर दिन माता पिता का है।*
*उन्हें साल के एक दिन की जरुरत नहीं है।*
*माँ को याद करने के लिए किसी "मदर डे" की जरुरत नहीं ,*
हिन्दू धर्म में तो *माँ के कदमो में ही स्वर्ग* बताया गया है।
यह *मदर डे के चोचले* तो उनके लिए है जो
*साल में एक बार अपनी माँ को याद करते है* ,
हमारी *संस्कृति* में
सुबह घर से निकलते वक्त पहले *माँ के पाँव*
छूने की परम्परा है। इसलिये हर
दिन *मातृ और पितृ दिवस* मनाये।
*~~~~
*सर्व तीर्थमयी माता, सर्वदेवमय पिता!*
*मातरम-पितरम तस्मात, सर्वयत्नेन पूज्येत..!!*



बात तो ठीक है लेकिन मनाने में कोई हर्ज भी नहीं है । हो सकता है कहीं किसी के माता पिता साथ में न हों । कोई उत्सव,पर्व आदि सर्वजनीन होता है । बहुत से लोग प्रतिदिन गंगा स्नान जाते हैं ,लेकिन पर्वों पर वे भी देखा देखी चले जाते हैं जिनकी गंगा स्नान में रुचि और आस्था नहीं है । यह सही है कि आपके फ्रिज में प्रायः ही मिठाई रखी रहती है लेकिन ऐसे घर भी बहुत हैं जिनके बच्चों को होली दिवाली के नाम पर ही मिठाई मिल पाती है । होली न हो तो शायद घर में गुजिया, अहिस्से, झार के लड्डू आदि बनें ही नहीं । घर में सफाई और रोशनी तो प्रतिदिन करते हैं लेकिन दीपावली की बात ही अलग है । जब हम साल में एक दिन परिवार के किसी सदस्य का जन्मदिन मनाते हैं तो वह अपने में कुछ विशेष हो जाता है । जबकि परिवार का वह सदस्य प्रतिदिन साथ में ही तो है ,मिठाई भी आती ही रहती है लेकिन जन्मदिन के केक और गुलगुला की बात ही निराली है और हां मां का वो टीका करना और.हाथ चूमना । मां के प्यार में क्या अन्य किसी दिन कमी है, नहीं है लेकिन जन्मदिन पर प्यार का इजहार कुछ अलग ही होता है । उत्सव या पर्व आदि को व्यक्तिगत रूप में नहीं सामाजिक और सामुदायिक रूप में देखना चाहिए । आररणीय मेरा आशय आपकी बात का प्रतिरोध करना नहीं है ।

Thursday, May 10, 2018

Leekage of customer’s Confidencial data by employers of Punjab National Bank for small benefits

Leekage of customer’s Confidencial data by employers of Punjab National Bank for small benefits
Dear Friends,
We have received a complaint from Sri Shyam Incorporation that they has a account with Punjab National Bank Branch that they have received a credit of Rs. 23,33,266/- at 14.56.00 hrs. and total Account balance after receiving the funds was Rs.29,58,230/- and at 15.16.52 hrs they transferred a sum of Rs. 3,77,000/- to another account which was not known to any one except them.
They had given a undated cheque to M/s Khubi Ram Jindal who also has a account with Punjab National Bank Branch 2030 as a security on But M/s KRJ misused the security cheque with the help of PNB bank employees.
The balance details of Sri Shyam Incorporation was shared with they got a Cheque of Rs.25,70,000/- credited to his account at 16.22.27 hrs. Now this industry is left with only Rs. 11,000 only.
The matter of concern of the aggrieved is:
1. How M/s KRJ Knew the credit balance of the account which was not shared by complainant.
2. The bank even did not called the party before clearing the cheque.
3. Whereas Rs.25,70,000/- is considered to be a large amount and Bank has to call the party
This all is done for some benefits
Dr. Arun Kumar

Tuesday, May 8, 2018

digital art

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क्या आप की गोशाला दान पर चलती है.

महत्वपुर्ण सुचना जो आपकीLifeबदल दे
यदि आप किसी गोशाला से संबंधित है????
आप गोपालक है????
आप गोसेवा के क्षेत्र मे काम करते है????
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क्या आप की गोशाला दान पर चलती है..... और आप उसेे स्वावलांबी बनाना चाहते है ????...
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क्या आपको बुढें बैल तथा बुढी गाय जो दूध नही देती उसे पालना कठीण लगता है????...
क्या आप गोबर गोमूत्र से उत्पाद बनाते है और ज्यादा उत्पाद बनाना सिखना चाहते है???
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क्या आप अपनी गाय/ गोशाळा के लिये खुद्द के चारे का कभी प्रबंधन किया है????
क्या बिमार गाय के लिये डॉक्टर बुलना और चिकित्सा करना तथा गाय को स्वस्थ रखना, उसमे बहुत खर्च आता है???
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.......... तो ये खबर आपके समस्या का समाधान करणे हेतू पहिला कदम साबित हो सकता है....
तारीख 15 मई 2017 से 19 मई 2017 तक श्रीकृष्णप्रिय गोशाला, किनवट, जिला. नांदेड ( महाराष्ट्र ) मे होने वाले गोविज्ञान शिबीर मे शिबिरार्थी बनकर पधारे और हमे सेवा का मौका दे....
इस शिबीर मे आप क्या सिखेंगे????
1) चारा प्रबंधन (हमारे यहा 2 एकड जमीन मे 130 गाय खुद्द के चारे पर पली है... इसके लिये पीछले 3 साल मे 1 रु भी हम ने चारे पर खर्च नही किया)
2) बुढी गाय के गोबर से हर रोज 10000 रु कमाने कि तरकीब
3) पंचगव्य औषधी निर्माण तथा उसके उपयोग संबंधी जानकारी.
4) गोशाला प्रबंधन.
5) गाय को कैसे स्वस्थ रखे तथा उसकी चिकित्सा के खर्च को कैसे कम करे.
...... और बहुत कुछ.....
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क्या कहा फीस कितना है?????
५०००???
१००००????
२००००?????
गलत सोच रहे हो आप .......
शिबिर बिलकुल मुफ्त ( निशुल्क ) है..
खुश!!!!
तो जलदी अपना नाम पंजीकरण हेतू आपका नाम और शहर का नाम हमे 9225830000 पर sms करे....
अधिक जनकारी के लिये 9225830000, 9342357663, 9422170589, 9420095846 संपर्क करे...

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Sunday, May 6, 2018

fir under siber low



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GOOD NEWS

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और घर घर #एयर_कंडीशनर चलने लगे हैं।

और घर घर #एयर_कंडीशनर चलने लगे हैं।
अधिकतर लोगों की आदत है कि वह अपने AC को 20=22 डिग्री पर चलाते हैं और #ठंडलगने पर #दोपहर में कंबल आदि ओढ़ लेते हैं। इससे दोहरा #नुकसान होता है। आईये जानते हैं कैसे:
क्या आपको पता है कि हमारे #शरीर का #तापमान 35 डिग्री सेल्शियस होता है। शरीर 22 डिग्री से 39 डिग्री तक का तापमान सह सकता है। इसे कहते हैं #human_body_temperature_tolerance.
तापमान के इससे कम या अधिक होने पर शरीर प्रतिक्रिया करने लगता है जैसे छीकें आदि।
जब आप 20-21 डिग्री पर AC चलाते हैं तो यह तापमान शरीर के सामान्य तापमान से कम है और इससे शरीर में #hypothermia नाम का एक #process शुरू हो जाता है जो रक्त प्रवाह (#blood_circulation) को प्रभावित करता है और शरीर के कुछ अंगों में #रक्त ठीक प्रकार से नहीं पहुंच पाता। इसके long term में बहुत #नुकसान होते हैं जैसे #गठिया आदि #बीमारियां
#अधिकतर_समय_AC में बिताने से #पसीना नहीं आता जिससे शरीर के #toxins बाहर नहीं निकल पाते और long term में इससे भी कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है जैसे #skin_allergy or #itching#high_blood_pressure आदि।
जब आप AC इतने कम तापमान पर चलाते हैं तो उसका कंप्रेसर लगातार फुल एनर्जी पर चलता है फिर चाहे वह 5 स्टार ही क्यों न हो, अत्यधिक बिजली फूंकता है और उसका पैसा आपकी जेब से जाता है।
इसमें क्या बुद्धिमानी है कि AC को पहले 20-21 पर चलाएं और फिर चादर ओढ़ लें। इससे बेहतर है कि AC को 25+ डिग्री पर चलाएं और पंखा भी चला लें।
इससे #बिजली भी कम #खर्च होगी और आपका शरीर का तापमान भी सीमा में रहेगा और उसे कोई नुकसान भी नहीं होगा।
इसका एक और फायदा है कि जब AC कम बिजली खर्च करेगा तो #बिजलोघरों पर भी दवाब कम होगा औऱ अंततः #global_warming में भी कमी आएगी।
मान लीजिए AC को 26 पर चला कर आप लगभग 5 यूनिट बिजली प्रति AC प्रति रात्रि बचाते हैं और यदि ऐसा 10 लाख घरों में होता है तो आप 50 लाख यूनिट बिजली प्रतिदिन बचाते हैं।
प्रादेशिक स्तर पर यह बचत #करोड़ों #यूनिट प्रतिदिन की हो सकती है।
कृपया विचार करें और अपने AC को 25 डिग्री से नीचे बिल्कुल न चलाएं। अपने शरीर और #वातावरण को #स्वस्थ_रखें

rti news

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Friday, May 4, 2018

Pusa sadabahar chill


Pusa sadabahar chilli 🌶
9467898048.
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान से विकसित पूसा सदाबहार किस्म के तैयार होने में मात्र 60 से 70 दिनों का समय लगता है। मिर्च की यह किस्म एक हेक्टेयर में 40 कुंतल की पैदावार देती है, जो मिर्च की किसी भी किस्म से कहीं अधिक है। यूपी में मौजूदा समय में किसान इस किस्म की नर्सरी तैयार कर सकते हैं।
पूसा से विकसित की गई मिर्च की पूसा सदाबहार किस्म देश के किसी भी हिस्से में उगाई जा सकती है। इस खास किस्म के बारे में पूसा के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. प्रीतम कालिया बताते हैं, “अगर मिर्च की शॉर्ट टाइम वराईटी की बात की जाए तो पूसा सदाबदार मिर्च सबसे खास मानी जाती है। इस किस्म की बुवाई पूरे भारत में की जाती है, इसकी नर्सरी जून से जुलाई माह तक तैयार की जाती है। यह किस्म एक हेक्टेयर में करीब 40 कुंतल की पैदावार देती है।’’
पूसा सदाबहार किस्म की मिर्च छह से आठ सेमी. लंबी होती है और इस किस्म से करीब एक गुच्छे में 12 से 14 मिर्च पैदा होती हैं। यह किस्म रोपाई के 60 दिन बाद तैयार हो जाती है। इस किस्म की खेती में एक हेक्टेयर खेत में 150 ग्राम बीज की ज़रूरत पड़ती है।
डॉ. प्रीतम कालिया ने आगे बताया,“पूसा सदाबहार मिर्च में सिंचाई की आवश्यकता बेहद ज़रूरी होती है। बुवाई से सात दिन के अंतराल पर सिंचाई की जाती है। इसलिए बारिश के समय ही इस मिर्च की नर्सरी तैयार करना बेहद असरदार माना गया है। यह समय इस किस्म की बुवाई के लिए बिलकुल सही है।’’
पूसा सदाबहार मिर्च में खरपतवार व कीट नियंत्रण
पूसा सदाबहार मिर्च की नर्सरी तैयार करने के बाद सबसे ज़रूरी होता है फसल में खरपतवार नियंत्रण। फसलों बोने के 25 से 30 दिनों के बाद खेत में अनावश्यक तौर पर उगे खरपतवार को हटाना बेहद ज़रूरी होता है। इस किस्म में फल छेदक, थ्रिप्स और माहू जैसे कीट का खतरा रहता है। कीटों के अधिक प्रभाव से फसल को बचाने के लिए 15 ग्राम एसीफेट या 10 एमएल इमीडाक्लोप्रिड दवा को 15 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करना चाहिए।