विकास और सौन्दर्यीकरण की राह देखता रमायन का प्राचीन शिव मन्दिर और झील
भरथना (रिपोर्ट- तनुज श्रीवास्तव)- जनपद इटावा में अनेकों प्राचीन ऐतिहासिक और नैसर्गिक स्थल है, जो अपने वास्तुशिल्प और भव्यता में अनूठा स्थान रखते हैं। नैसर्गिक सौन्दर्य में वे किसी भी प्रसिद्ध स्थलों से कम नहीं है। बस इनका दुर्भाग्य यह है कि ये शासन और प्रशासन की उपेक्षा के शिकार होने के कारण समुचित प्रचार नहीं पा पाते हैं। पुरातत्व और पर्यटन विभाग भी इनकी ओर ध्यान नहीं देते हैं। ऐसा ही एक प्राचीन धार्मिक नैसर्गिक स्थल है भरथना तहसील में झील के किनारे बसे गांव रमायन में स्थित प्राचीन शिव मन्दिर जो भव्य और कलात्मक सौन्दर्य से परिपूर्ण है। अपने वास्तुशिल्प सौन्दर्य में जनपद इटावा में ही नहीं, आसपास के कई अन्य जिलों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
भरथना नगर से 3 किमी0 उत्तर-पूर्व की ओर स्थित गांव रमायन के उत्तर-पश्चिम दिशा में फैली विशाल झील आज शासन और प्रशासन की उपेक्षा के कारण अपना नैसर्गिक सौन्दर्य खो रही है। अतिक्रमण और गन्दगी बढने के कारण आज यह एक विशाल तालाब में परिवर्तित हो रही है। इस झील की गिनती जिले की महत्वपूर्ण झीलों में शामिल थी, जो पुरानी पाठ्य पुस्तकों मंे मिलती है। वर्तमान में यह झील जहाँ वर्षा ऋतु में अपना विस्तार लेकर विशाल रूप ले लेती है। जिसका प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता है। वहीं जाडे की ऋतु में काफी बडी संख्या में विदेशी मेहमान पक्षियों के आने से यह झील पक्षी बिहार का रूप ले लेती है। रंग-बिरंगे विदेशी पक्षियों का कोलाहल, क्रीडा कलरव मनभावन दृश्य उपस्थित करता है। अगर यह रमायन झील का विस्तार कर सौन्दर्यीकरण किया जाये, तो पक्षी बिहार के साथ ही जल बिहार का भी सुन्दर रूप ले सकती है। पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सरकार के लिये आय का स्त्रोत भी बन सकती है। निजी क्षेत्र में सैकडों लोगों की रोजी रोटी का आधार भी बन सकती है।
आइये अब हम आपको यहाँ से प्राचीन शिव मन्दिर पर लेकर चलते हैं। जो सुन्दर सरोवर के किनारे हरे भरे रमजीक स्थल के मध्य स्थित है। इस मन्दिर के विषय में जो भी जानकारी मिली है, वह धार्मिक ग्रामवासियों से मिली है। गांव के वृद्धजनों ने बताया कि इस भव्य मन्दिर का निर्माण यहाँ के पूर्व जमींदार पाठक जी के पूर्वजों ने लगभग 200 वर्ष पूर्व कराया था। ब्रिटिश काल में इस मन्दिर के चारों ओर सुव्यवस्थित उपवन था। जहाँ रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियां थीं। वहीं छायादार फलदार, तरह-तरह के वृक्ष थे। मन्दिर के चारों ओर चैडा रास्ता बाग में जाता था। वरिष्ठ श्रद्धालुजनों ने बताया कि उस समय यह बाग 100 बीघा से भी अधिक क्षेत्र में था। ब्रिटिश काल के बाद मन्दिर का बाग उजडता चला गया। यह प्राचीन शिव मन्दिर कई वास्तुशैलियों में निर्मित है। दक्षिण भारतीय शैली में इसका मुख्य केन्द्रीय बुर्ज विशाल शंकु आकार का है। जिसके शिखर पर स्वर्णपत्र जडित कई कलश लगे हैं। जिसके ऊपर त्रिशूल हैं। इन कलशों की ऊँचाई लगभग 20 फीट है। अपने निर्माणकाल से आज तक इसकी स्वर्ण चमक फीकी नहीं पडी है।
इस मन्दिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर खुलता है, जो भव्य और कलात्मक हैं। छतरीयुक्त यह द्वार राजस्थानी शैली में बना है। भूतल से सीढिया मुख्य मन्दिर कक्ष के द्वार तक जाती हैं। मुख्य मन्दिर कक्ष में शेषनाग के साथ शिवलिंग विराजमान है। द्वार के सामने बरामदे में भगवान शिव की सवारी नादिया की मूर्ति है। मन्दिर के मुख्य कक्ष की छत में आज भी प्राचीन चित्रकारी देखने को मिलती है। जिनके रंग फीके नहीं पडे हैं। मन्दिर के चारों कोनों में चार बुर्ज बने हैं। जिनकी ऊँचाई भूतल से 50 फीट के लगभग है। प्रथम तल के चारों बुर्जों में शिवलिंग मध्य में स्थित है और आलों में गणेश, लक्ष्मी, हनुमान, राम-लक्ष्मण-सीता और राधाकृष्ण आदि अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित है। भूतल और प्रथम तल पर बने गलियारों के स्तम्भ सुन्दर और कलात्मक हैं। जिनके कारण गलियारे भी दर्शनीय हो गये हैं। मन्दिर का मुख्य चबूतरा लगभग 150 फीट चैडा और 200 फीट लम्बा है। जिसके चारों ओर बने रास्तों पर उतरने के लिए सीढियां हैं। इस मन्दिर की ऊँचाई अपने धरातल से शिखर तक लगभग 150 फीट है, जो दो किमी0 दूर से भी साफ दिखाई देता है। मुख्य मन्दिर की 200 मीटर की दूरी पर दक्षिण की ओर एक छोटा शिव मन्दिर, प्राचीन बरगद वृक्ष के छांव तले है। इसका भी आध्यात्मिक महत्व कम नहीं है। रमायन गांव के किनारे से ही इटावा से कन्नौज जाने वाला प्राचीन कलक्टरी मार्ग निकला है, जो आज अतिक्रमण का शिकार होकर संकरा हो गया है। ब्रिटिश काल में रमायन में ही तहसील मुख्यालय था, जो बाद में भरथना नगर में आ गया। इस गांव ने आज भी अपने प्राचीन भव्य शिव मन्दिर और विशाल झील के कारण अपना आध्यात्मिक और प्राकृतिक महत्व नहीं खोया है। इस क्षेत्र की एक विशेषता और भी है गांव और झील के आसपास के खेतों में काफी बडी संख्या में सारस के जोडे उडते हुए और कलरव क्रीडा करते हुए दिखाई देते हैं। जिसके कारण यह क्षेत्र सारस पक्षी के अन्तर्गत आता है। केन्द्रीय सरकार की पूरा योजना के अन्तर्गत यहाँ एक ग्रामीण युवाओं को खेलकूद प्रोत्साहन हेतु स्टेडियम का निर्माण हुआ है, जो दयनीय दशा में है। हरवर्ष महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इस शिव मन्दिर प्रांगण में मेला का आयोजन होता है। जो ग्रामीण संस्कृति की झलक पेश करता है। वर्ष भर यहाँ कथा, भागवत और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है।
वर्ष 1983 तक इस मन्दिर की दशा काफी जीर्ण शीर्ण थी। मीडिया की नजर यहाँ पडी और समाचार पत्रों में इस क्षेत्र की विशेषताओं का उल्लेख किया। तत्पश्चात तत्कालीन ग्राम प्रधान ने क्षेत्रीय श्रद्धालु जनता के सहयोग से शिव मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। तालाब का पुर्ननिर्माण कर सौन्दर्यीकरण भी हुआ। फिर भी जो विकास और सौन्दर्यीकरण होना चाहिए, वह नहीं हुआ है। इस सन्दर्भ में श्रद्धालु ग्रामवासियों ने दिनांक 20-12-2005 को भरथना का पयर्टन विकास एवं सौन्दर्यीकरण कार्यक्रम के अन्तर्गत रमायन के प्राचीन शिव मन्दिर के विकास एवं सौन्दर्यीकरण कार्य हेतु सरकार से प्रार्थना पत्र संख्या- 110 रमायन शिव मन्दिर भेजकर 377.77 लाख रूपये की मांग की थी। लेकिन मामला अधर में लटक गया। वर्तमान में नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान विमला भदौरिया ने भी इस क्षेत्र के विकास हेतु अग्रसर है। उन्होंने श्रद्धालु ग्रामवासियों और नगर व क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों के साथ शासन और प्रशासन से झील और प्राचीन शिव मन्दिर के विकास और सौन्दर्यीकरण करने की मांग की है। उन्होंने पुरातत्व और पर्यटन विभाग से भी मांग की है कि वह इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण स्थलों का अवलोकन और निरीक्षण कर बहुमुखी विकास हेतु ठोस कदम उठायें।
भरथना नगर से 3 किमी0 उत्तर-पूर्व की ओर स्थित गांव रमायन के उत्तर-पश्चिम दिशा में फैली विशाल झील आज शासन और प्रशासन की उपेक्षा के कारण अपना नैसर्गिक सौन्दर्य खो रही है। अतिक्रमण और गन्दगी बढने के कारण आज यह एक विशाल तालाब में परिवर्तित हो रही है। इस झील की गिनती जिले की महत्वपूर्ण झीलों में शामिल थी, जो पुरानी पाठ्य पुस्तकों मंे मिलती है। वर्तमान में यह झील जहाँ वर्षा ऋतु में अपना विस्तार लेकर विशाल रूप ले लेती है। जिसका प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता है। वहीं जाडे की ऋतु में काफी बडी संख्या में विदेशी मेहमान पक्षियों के आने से यह झील पक्षी बिहार का रूप ले लेती है। रंग-बिरंगे विदेशी पक्षियों का कोलाहल, क्रीडा कलरव मनभावन दृश्य उपस्थित करता है। अगर यह रमायन झील का विस्तार कर सौन्दर्यीकरण किया जाये, तो पक्षी बिहार के साथ ही जल बिहार का भी सुन्दर रूप ले सकती है। पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सरकार के लिये आय का स्त्रोत भी बन सकती है। निजी क्षेत्र में सैकडों लोगों की रोजी रोटी का आधार भी बन सकती है।
आइये अब हम आपको यहाँ से प्राचीन शिव मन्दिर पर लेकर चलते हैं। जो सुन्दर सरोवर के किनारे हरे भरे रमजीक स्थल के मध्य स्थित है। इस मन्दिर के विषय में जो भी जानकारी मिली है, वह धार्मिक ग्रामवासियों से मिली है। गांव के वृद्धजनों ने बताया कि इस भव्य मन्दिर का निर्माण यहाँ के पूर्व जमींदार पाठक जी के पूर्वजों ने लगभग 200 वर्ष पूर्व कराया था। ब्रिटिश काल में इस मन्दिर के चारों ओर सुव्यवस्थित उपवन था। जहाँ रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियां थीं। वहीं छायादार फलदार, तरह-तरह के वृक्ष थे। मन्दिर के चारों ओर चैडा रास्ता बाग में जाता था। वरिष्ठ श्रद्धालुजनों ने बताया कि उस समय यह बाग 100 बीघा से भी अधिक क्षेत्र में था। ब्रिटिश काल के बाद मन्दिर का बाग उजडता चला गया। यह प्राचीन शिव मन्दिर कई वास्तुशैलियों में निर्मित है। दक्षिण भारतीय शैली में इसका मुख्य केन्द्रीय बुर्ज विशाल शंकु आकार का है। जिसके शिखर पर स्वर्णपत्र जडित कई कलश लगे हैं। जिसके ऊपर त्रिशूल हैं। इन कलशों की ऊँचाई लगभग 20 फीट है। अपने निर्माणकाल से आज तक इसकी स्वर्ण चमक फीकी नहीं पडी है।
इस मन्दिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर खुलता है, जो भव्य और कलात्मक हैं। छतरीयुक्त यह द्वार राजस्थानी शैली में बना है। भूतल से सीढिया मुख्य मन्दिर कक्ष के द्वार तक जाती हैं। मुख्य मन्दिर कक्ष में शेषनाग के साथ शिवलिंग विराजमान है। द्वार के सामने बरामदे में भगवान शिव की सवारी नादिया की मूर्ति है। मन्दिर के मुख्य कक्ष की छत में आज भी प्राचीन चित्रकारी देखने को मिलती है। जिनके रंग फीके नहीं पडे हैं। मन्दिर के चारों कोनों में चार बुर्ज बने हैं। जिनकी ऊँचाई भूतल से 50 फीट के लगभग है। प्रथम तल के चारों बुर्जों में शिवलिंग मध्य में स्थित है और आलों में गणेश, लक्ष्मी, हनुमान, राम-लक्ष्मण-सीता और राधाकृष्ण आदि अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित है। भूतल और प्रथम तल पर बने गलियारों के स्तम्भ सुन्दर और कलात्मक हैं। जिनके कारण गलियारे भी दर्शनीय हो गये हैं। मन्दिर का मुख्य चबूतरा लगभग 150 फीट चैडा और 200 फीट लम्बा है। जिसके चारों ओर बने रास्तों पर उतरने के लिए सीढियां हैं। इस मन्दिर की ऊँचाई अपने धरातल से शिखर तक लगभग 150 फीट है, जो दो किमी0 दूर से भी साफ दिखाई देता है। मुख्य मन्दिर की 200 मीटर की दूरी पर दक्षिण की ओर एक छोटा शिव मन्दिर, प्राचीन बरगद वृक्ष के छांव तले है। इसका भी आध्यात्मिक महत्व कम नहीं है। रमायन गांव के किनारे से ही इटावा से कन्नौज जाने वाला प्राचीन कलक्टरी मार्ग निकला है, जो आज अतिक्रमण का शिकार होकर संकरा हो गया है। ब्रिटिश काल में रमायन में ही तहसील मुख्यालय था, जो बाद में भरथना नगर में आ गया। इस गांव ने आज भी अपने प्राचीन भव्य शिव मन्दिर और विशाल झील के कारण अपना आध्यात्मिक और प्राकृतिक महत्व नहीं खोया है। इस क्षेत्र की एक विशेषता और भी है गांव और झील के आसपास के खेतों में काफी बडी संख्या में सारस के जोडे उडते हुए और कलरव क्रीडा करते हुए दिखाई देते हैं। जिसके कारण यह क्षेत्र सारस पक्षी के अन्तर्गत आता है। केन्द्रीय सरकार की पूरा योजना के अन्तर्गत यहाँ एक ग्रामीण युवाओं को खेलकूद प्रोत्साहन हेतु स्टेडियम का निर्माण हुआ है, जो दयनीय दशा में है। हरवर्ष महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इस शिव मन्दिर प्रांगण में मेला का आयोजन होता है। जो ग्रामीण संस्कृति की झलक पेश करता है। वर्ष भर यहाँ कथा, भागवत और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है।
वर्ष 1983 तक इस मन्दिर की दशा काफी जीर्ण शीर्ण थी। मीडिया की नजर यहाँ पडी और समाचार पत्रों में इस क्षेत्र की विशेषताओं का उल्लेख किया। तत्पश्चात तत्कालीन ग्राम प्रधान ने क्षेत्रीय श्रद्धालु जनता के सहयोग से शिव मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। तालाब का पुर्ननिर्माण कर सौन्दर्यीकरण भी हुआ। फिर भी जो विकास और सौन्दर्यीकरण होना चाहिए, वह नहीं हुआ है। इस सन्दर्भ में श्रद्धालु ग्रामवासियों ने दिनांक 20-12-2005 को भरथना का पयर्टन विकास एवं सौन्दर्यीकरण कार्यक्रम के अन्तर्गत रमायन के प्राचीन शिव मन्दिर के विकास एवं सौन्दर्यीकरण कार्य हेतु सरकार से प्रार्थना पत्र संख्या- 110 रमायन शिव मन्दिर भेजकर 377.77 लाख रूपये की मांग की थी। लेकिन मामला अधर में लटक गया। वर्तमान में नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान विमला भदौरिया ने भी इस क्षेत्र के विकास हेतु अग्रसर है। उन्होंने श्रद्धालु ग्रामवासियों और नगर व क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों के साथ शासन और प्रशासन से झील और प्राचीन शिव मन्दिर के विकास और सौन्दर्यीकरण करने की मांग की है। उन्होंने पुरातत्व और पर्यटन विभाग से भी मांग की है कि वह इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण स्थलों का अवलोकन और निरीक्षण कर बहुमुखी विकास हेतु ठोस कदम उठायें।
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