ब्रिटिश हुकूमत के दौर में इटावा जिले की भरथना तहसील में एसडीएम बनकर बंगाल से आये थे एसडीएम सर सप्रू, वे नियमित दिनचर्या निपटाकर चारपाई पर लेटे थे, सेवक मनोहर नाई पैर दबा रहा था। सर सप्रू बोले- कोई कहानी सुनाओ।
मनोहर सुनाने लगा- अफगान के बादशाह ने एक दिन अपनी दासी से फूलों की सेज सजाने को कहा। दासी ने मनोयोग से सेज सजाई, सोचा-बेगम रोज इस पर सोती है बड़ा अच्छा लगता होगा। बादशाह और बेगम के आने में अभी वक्त है, मैं पल भर इस पर लेटकर देखती हूं, कैसा लगता है? इसी जिज्ञासा में वह फूलों की सेज पर लेट गई और तत्काल आंख लग गई, इसी दौरान बादशाह और बेगम आ गये, दासी को शाही-सेज पर सोता देख, आग बबूला हो गये। बेगम के गुस्से से भरे अल्फाज से दासी जाग गई और शाही दम्पति के पैरों गिरकर माफी मांगने लगी। बेगम ने दासी के अक्षम्य अपराध के लिए कोड़े लगाने का हुक्म दिया। कोड़े पड़ना शुरू हुआ,चीखने लगी जैसे-जैसे पड़ते गये,वह रोना-चीखना भूलकर खिलखिला कर हसने लगी। कोड़ों के आघात की तीव्रता की गति से ही उसके खिलखिलाने की गति बढ़ती गई।
निर्धारित दंड हंस कर झेलते ही बादशाह ने पूछा- तुम पहले रोई और फिर हंसने लगी, आखिर क्यो? दासी बोली- सरकार! पहले तो दर्द से चीख निकल गई, मैने सोचा जिस सेज पर मेरे थोड़ी देर सोने पर इतनी सजा मिली है तो, पता नहीं खुदा उन्हें कितनी सजा देगा, जो वर्षों से हर रात इसी सेज पर सोते हैं। यह सोचने से दर्द दूर हो गया और हंसी आने लगी।
दासी के वचन सुनकर बादशाह के दिव्यचक्षु खुल गये,और शाही पोशाक उतार कर, फकीर बन गये। मनोहर नाई की इस कहानी सुनते ही भरथना के डिप्टी कलक्टर सप्रू की अन्तर्दृष्टि जाग्रत हो गई, और लोकसेवक पद से त्यागपत्र देकर परमात्म-सेवक (संत) के रूप में इष्टिकापुरी के यमुना तट पर रहने लगे। हाथ में सोटा लेकर खटखटाते हुए कुछ रोटियां मांग लाते, खुद खाकर बची हुई रोटियां पशु-पक्षियों को खिला देते। सोटा खटखटाना उनकी पहचान तो बनी ही,लोगों ने नाम दिया-खटखटा बाबा।
अनासक्त एसडीएम सर सप्रू की इष्टसाध्य इष्टापथ की एकादशरुद्री धाम पर तपश्चर्या और साधना से दिव्यता स्वरूप ऋद्धियां-सिद्धियां उनकी सेवा में हाजिर हो गई। एक बार सूर्यतनया कालिन्दी उफन रही थी। बाढ़ का मुआयना करने मैनपुरी के जनपद न्यायाधीश पधारे थे,और प्रत्यक्ष देखा- उफनती यमुना नदी में चटाई पर आसन लगाये एक सिद्धसंत बहते हुए आ रहे थे, इटावा तट पर आते ही वे चटाई समेत तीव्र जल प्रवाह में ठहर गये और बोले- मुझे प्यास लग रही है। कोई पानी पिला दे। यह सुनकर खटखटा बाबा ने कहा- ठहरो मैं आया। वे जलपात्र लेकर आगे बढ़े और जल पर चलहि थलहि की नाईं खटखट करते हुए पहुंच गये,और अतिथि संत को जल पिलाया। यह दृश्य देखकर मुआयना कर रहे जिला जज मैनपुरी भौचक्के ही नहीं रह गये,बल्कि वह खटखटा बाबा के शिष्य भी बन गये। खटखटा बाबा ने एक यज्ञानुष्ठान कराया, भंडारा चल रहा था। पता चला-घी कम पड़ गया है। शिष्यों ने कहा -गुरुजी! घी मंगाना होगा। बाबा ने जरूरत भर यमुना जल लाकर कढ़ाई में डालने का आदेश दिया। खटखटा बाबा का चमत्कार- कढ़ाई में गिरते ही यमुना जल घृत बन गया। भंडारा ख्त्म होने के बाद बाबा ने ऋण अदायगी का आदेश देते हुए उतना ही घी मंगवाकर यमुना में डलवाया। फिर चमत्कार दिखा, यमुना में घी गिरते ही जल हो गया।
आगे चलकर सिद्ध संत खटखटा बाबा ने इटावा यमुना तट पर सरस्वती विद्यापीठ की स्थापना जो, उनकी समाधि के पास आज भी मौजूद है,जिसमें वैदिक वांगमय, संस्कृत और पाली भाषाओं का दुर्लभ साहित्यिक भंडार है।
खटखटा बाबा के बारे मे कोई पुस्तक हो तो उसकी जानकारी देने का कष्ट करे...धन्यवाद ।
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