आजकल सेक्युलर गैंग, मीडिया की बबासीर एक नाम की वजह से भीषण दर्द के साथ रक्त बहा रही है और वो नाम है *हेमंत करकरे.....*
हाय शहीद को जे कह दिया, किलकिल कर दी, फलाना ढिमका...... तो सोचा कुछ सवाल पूछ लूं कुछ कथा सुना दूं.....
थोड़ी ताज़ा सी पुरानी बात है यही चालीस एक साल पहले मुम्बई बॉम्बे हुआ करता था और और इस बॉम्बे में उस समय अंडर वर्ल्ड पर कब्जे की तगड़ी लड़ाई छिड़ी थी कई गुट आपस में टकरा रहे थे..... ऐसे में बॉम्बे पुलिस की सीधी रणनीति थी अच्छा है साले आपस में लड़ें मारें अपना क्या जाता है..... सब ठीक ठाक चल रहा था के ऐसे में तब के एक उभरते डॉन दाऊद इब्राहिम के भाई शब्बीर को मनोहर सुर्वे ने कुत्ते की तरह दौड़ा दौड़ा कर बीच बाजार मार डाला इस घटना ने दाऊद को बिल में घुसने पर मजबूर कर दिया और मान्या सुर्वे को पोलिटिकल सपोर्ट भी खूब मिल गया....
ऐसे में दाऊद ने एक नई चाल चली पहली बार बॉम्बे पुलिस के साथ सौदा पटाया और मान्या की सुपारी लेने वाला था इंस्पेक्टर Y. D. Bhide 1982 में ये पहला मौका था जब मुम्बई पुलिस ने एनकाउंटर की सुरुआत की... भिंडे ने मान्या को मारा और दाऊद का सिक्का चमक गया..... साथ ही मुम्बई पुलिस की अंडरवर्ल्ड से रिश्तेदारी भी चालू करवा दी.... इसी क्रम में आगे का बड़ा कांड था दाऊद से अलग हो मुम्बई में खुद का गैंग बनाने वाले माया डोलस का एनकाउंटर...... 1991 में इस एनकाउंटर के बदले बताते है दाऊद ने अपने खास मुंबई क्राइम ब्रांच के आफताब अहमद खान और उसकी टीम को एक करोड़ सत्तर लाख का ईनाम दिया......!
यहां से मुंबई पुलिस और दाऊद का आपस का धंधा जोरों पर चल निकला, दाऊद के विरोधी गुट के भी पुलिस से
गहरे_बिज़नेस_रिलेशन थे और दोनों पक्ष एक दूसरे के शूटरों को मरवाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते थे जहां प्रदीप शर्मा जैसे अधिकारी सेना गुट से जुड़े वहीं हेमंत करकरे व सालस्कर आदि दाऊद गुट के थे.... दाऊद गुट को यहां राजनीतिक सपोर्ट मिलता था शरद पवार से तो सेना गुट के सर पर बाला साहिब का हाथ रहता था....!
*हेमंत करकरे* का सबसे खास शूटर (यहां यही शब्द ज्यादा उचित है) था *विजय सालस्कर* अब कमाल देखिये इसने 75 के करीब एनकाउंटर में अपराधियों को मारा जिनमें एक भी दाऊद गैंग का नहीं था सभी के सभी अरुण गवली या राजन गैंग के थे......!
इसके बदले इन्ह मिलते थे नगद पैसे, विदेश में बढ़िया ट्रिप, मौके की प्रॉपर्टी, मज़बूत राजनीतिक रिश्ते....... कोई भी आसानी से करकरे की तनख्वाह और अर्जीत संपत्ति के आंकड़े खोज उसकी ईमानदारी और देशभक्ति को जांच सकता है...... कहते हैं कफ़न के नीचे हर बुराई ढंक जाती है हेमंत करकरे इसका सबसे बड़ा प्रमाण है......
*करकरे* जब मरा मुम्बई क्राइम ब्रांच ऑफिस से सिर्फ 50 कदम दूरी पर था और वहां पर उन्नत हथियार और फोर्स दोनों मौजूद थे......
पर शायद जिस स्क्रिप्ट पर वो काम कर रहा था उसमें मरने का सीन नहीं था..... जो हुआ वो स्क्रिप्ट से अलग था...... स्क्रिप्ट में कसाब और इब्राहिम को मार कर फैंकना और उनकी जगह किसी हिन्दू को प्लांट करना था पर इब्राहिम ने खेल बिगाड़ दिया........
इस सब में एक नाम बेहद महत्वपूर्ण है जिसने शायद मेरे अनुमान से ये सीन लिखा होगा *एसएम मुशरिफ़* पूर्व IG जिसने सबसे पहले हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी तैयार की.... ये इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता के करकरे इसका बेहद करीबी था और एसएम मुशरिफ़ पर दाऊद के लिए काम करने के आरोप तेलगी केस के समय भी लगते रहे....!
*करकरे* की भक्ति देश के लिए नहीं थी, कांग्रेस के लिए थी...... एक भ्रष्ट, षणयंत्रकारी, धर्मद्रोही का नाम था हेमंत करकरे!!
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