Friday, August 9, 2019

मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक

मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ।।
लोकिक व्यवहार के अर्थ में इस चौपाई में मुख का अर्थ दन्त-जिव्हा युक्त मुख गुहा किया जाता है ।
किन्तु आध्यात्मिक अर्थों में तथा दर्शन में मुख का अर्थ यहां " प्राण " किया जाता है ।
दर्शन में मनुष्य को 19 मुख वाला कहा गया है तथा मुख का अर्थ करण (संस्थान ) किया गया है , तथा पांच कर्मेन्द्री , पांच ज्ञानेंद्रि , पांच प्राण , मन , बुद्धि ,अहंकार और चित्त इन को 19 करण अथवा मुख के रूप में गिना गया है ।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
इस चौपाई में भी सन्मुख होने का सही सही अर्थ तभी लगेगा जब हम इन 19 कारणों को मुख के रूप में जानेगें । जब साधक अपने इन 19 करणों को ईश्वर की सेवा में पूर्णतः लगा देता है उसे ही ईश्वर के सम्मुख होना कहते है ।
प्राण शरीर का सबसे पवित्र करण है , क्योंकि प्राण शब्द , स्पर्श , रूप , रस , गन्ध इन पांचों विषय मे से स्वयं किसी को अपने लिए ग्रहण नही करता बल्कि ज्ञानेंद्रियों द्वारा विषय ग्रहण करने के पश्चात उन्हें शरीर के उचित स्थानों तक पहुँचा देता है ।
प्राण को अहंकार की व्याप्ति भी नही होती , जैसे कर्ण को ले कर मैं श्रोता हूं , नेत्र को ले कर मैं द्रष्टा हूं ऐसा अहंकार होता है , किन्तु प्राण को ले कर मैं प्राणी हूं ऐसा अहंकार नही होता ।
इन 19 मुखों में प्राण की आयु इसीलिए सबसे अधिक है क्योंकि उसका स्वयं का कोई स्वार्थ या अहंकार नही होता । प्राण की आयु अधिक इसलिए कही गई क्योंकि सूषुप्ति में जहां ज्ञानेन्द्रियाँ , कर्मेन्द्रियां , मन , बुद्धि , अहंकार , चित्त विलीन हो जाते है वहां भी प्राण की गति बनी रहती है ।
एक सुंदर कथा है - एक बार प्राण को छोड़ शेष 18 करण ने विमर्श किया कि हम सब की निश्चित उपयोगिता है अर्थक्रियाकारिता है किंतु इस प्राण का क्या कार्य है । तब प्राण ने कहा आप अभी बारी बारी से एक वर्ष शरीर त्याग दें और बाहर से निरीक्षण करें कि आपके बिना शरीर कैसे चलता है ?
नेत्र एक वर्ष के लिए चले गए , तकलीफ हुई किन्तु जैसे अंधे का कार्य चलता है वैसे कार्य चला ।
सभी ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियां एक वर्ष शरीर छोड़ गई , तकलीफ हुई किन्तु शरीर का काम चलता रहा रुका नही ।
बुद्धि गई तो मूर्ख व्यक्ति जैसा , मन गया तो अमन्स्क जैसा , अहंकार गया तो निर्लज्ज जैसा , चित्त गया तो स्मृति हीन जैसा व्यवहार हुआ किन्तु शरीर ठप्प नही पड़ा ।
प्राण ने कहा आपने आपकी महत्ता देख ली , अब मैं एक वर्ष के लिए जाता हूं , जैसे ही प्राण निकलने को हुए सब इंद्रियां और मन ,बुद्धि , अहंकार , चित्त विकल हो उठे । उन्हें समझ आ गया कि प्राण के बिना हम एक क्षण चेतन नही रह सकते तब उन्होंने प्राण की महत्ता स्वीकार की ।
उपरोक्त चौपाई का आशय यही है कि मुखिया को प्राण की तरह होना चाहिए जो विषयों को सब मे विवेक पूर्वक बांट देता है स्वयं के लिए कुछ नही रखता , सुषुप्ति में भी जब सब करण विश्राम करते है तब भी वह गतिमान रहता है ।

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