सम्माननीय अभिभावक जन !
बच्चे देश का भविष्य हैं ...हम देश के इस भविष्य का निर्माण अकेले अपने दम पर नहीं कर सकते .. ये अकेले संभव नहीं हैं ....इसमें आप लोगो का साथ बेहद जरुरी है .......क्यों कि स्टूडेंट स्कूल में महज पांच से छ घंटे ही रहता है ..उसके बाद के अठारह घंटों में से अगर उसके सोने के आठ घंटे निकाल दें तो बच्चे हुए दस घंटे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते है ..
बच्चे देश का भविष्य हैं ...हम देश के इस भविष्य का निर्माण अकेले अपने दम पर नहीं कर सकते .. ये अकेले संभव नहीं हैं ....इसमें आप लोगो का साथ बेहद जरुरी है .......क्यों कि स्टूडेंट स्कूल में महज पांच से छ घंटे ही रहता है ..उसके बाद के अठारह घंटों में से अगर उसके सोने के आठ घंटे निकाल दें तो बच्चे हुए दस घंटे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते है ..
ध्यान दीजिये सबसे ज्यादा .. “सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण --दस घंटे ”
दस घंटे ज्यादा नहीं हैं ..ये वो समय है ...जिसमे उसे नहाना है-- धोना है – सभ्यता से रहने का तरीका सीखना है –संस्कृति(culture) सीखनी है – बोलना सीखना है -- अनुशाषित रहना सीखना है –शरीर को स्वस्थ रहने के लिए खेलना भी है – अपने लिए गाना भी है – डांस भी करना है – दोस्त भी बनाने हैं – दोस्तों से मिलना भी है – सायकिल चलाना भी सीखना है और गिटार बजाना भी ...इतने सब के बाद सब पर भारी काम ये की होम्वोर्क भी करना है और रिवीजन भी करना है .....फिर खाना खा के कार्टून फिल्मे भी तो देखनी है....
दस घंटे ज्यादा नहीं हैं ..ये वो समय है ...जिसमे उसे नहाना है-- धोना है – सभ्यता से रहने का तरीका सीखना है –संस्कृति(culture) सीखनी है – बोलना सीखना है -- अनुशाषित रहना सीखना है –शरीर को स्वस्थ रहने के लिए खेलना भी है – अपने लिए गाना भी है – डांस भी करना है – दोस्त भी बनाने हैं – दोस्तों से मिलना भी है – सायकिल चलाना भी सीखना है और गिटार बजाना भी ...इतने सब के बाद सब पर भारी काम ये की होम्वोर्क भी करना है और रिवीजन भी करना है .....फिर खाना खा के कार्टून फिल्मे भी तो देखनी है....
अब बताईये इतने सारे काम हैं सिर्फ दस घंटे में...धयान देने वाली बात ये है की इसमें से किसी भी काम को दिनचर्या में से काटा नहीं जा सकता.....इन सब कार्यों और कलाओं को से दूर रहकर आपका बच्चा चोरी छिपे या कुछ गलत सीखे इससे बेहतर है की आप उसे स्वयं रूचि लेने के लिए प्रेरित करें .ये सब जरुरी भी तो हैं. आखिर इंसान एक सामाजिक प्राणी है और बच्चे तो समाज की नींव हैं... ...समाज में इंसान का सिर्फ रहना ही काफी नहीं हैं ..बल्कि उसके अंदर सामाजिक गुणों का समावेश होना बहुत ही जरुरी है.
..तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ते इस समाज में अगर बच्चे के अन्दर समय पर सभी गुणों का विकास नहीं किया गया तो इस उच्च प्रतिस्पर्धा (high competition) के ज़माने में एक ऐसा बच्चा हीनभावना का शिकार हो सकता है जो की अपने परिवार , समाज और देश के लिए शायद कुछ बड़ा काम कर सकता था .
हम जानते हैं कि आप अक्सर पूछते हैं की “बेटा ! आज स्कूल में क्या सीखा है आपने” ये बहुत ही अच्छी बात है...पर ये तो सिर्फ पाच से छह घंटों का ही हिसाब हुआ न ...बाकी के इन दस घंटों का भी हिसाब रखिये. इससे न सिर्फ हमे मदद मिलेगी बल्कि ये बच्चे के भविष्य के लिए भी कहीं ज्यादा फायदेमंद होगा.
...मसलन आपको ये पता होना चाहिए की आपका बच्चा आज किससे मिला ? उसका दोस्त कौन है ? उससे उसके खेल और गतिविधियों की सहयोगात्मक रूप से जानकारी लीजिये...इससे आपको उसकी रुचियों और क्षमता के बारे में पता लगेगा ...और तभी आप उससे सम्बन्धित कोई भी सकारात्मक कदम उठा पाएंगे ...
सकारात्मक कदम से मेरा मतलब है की जैसे आपका बच्चा अगर गलत संगत में है या कोई और काम ऐसा खेल या काम करने में मशगूल है जो आपको नापसंद है तो उससे डांटने से बेहतर है आप उसके लिये एक अन्य विकल्प की सहायता ले,,अगर आप अपने बच्चे से सहयोगी रूप से रोज बातचीत करते है तो निश्चित रूप से आपको उसकी पसंद का एक अंदाजा होगा
...मसलन अगर उसे बैडमिंटन बहुत पसंद है ...तो आप एक जोड़ी बैडमिंटन और कॉर्क खरीद दें ..किसी गलत संगत में बच्चे के पड़ जाने से कही ज्यादा अच्छा है की आपका बच्चा एक घंटे ज्यादा खेल ले .
बच्चों को कुसंगत से बचाने के ऐसे कई तरीके आजमाए जा सकते है ... बच्चे का शिक्षित होना जितना जरुरी है उतना ही जरुरी है उसका चरित्रवान होना , उसका अनुशासित होना...और इसमें आपका एक अभिभावक के रूप में ज्यादा महत्व है क्यों की बच्चा इन सब मौलिक चीजों को घर और समाज से ही सीखता है. साथ ही अगर एक बच्चा स्वयं में अनुशासित हो, संस्कारी हो तो उसके हम जैसे अध्यापको का अध्यापन कार्य सरल हो जाता है ..इसका ध्यान रखिये .
लेकिन एक अभिभावक के तौर ज्यादातर लोग क्या करते है – आप अपने कुछ व्यक्तिगत काम भी बच्चों के रूटीन में जोड़ देते हैं जैसे – कभी बगल वाली आंटी के यहाँ से फाल लगाने के लिए लाल धागा लेने भेज देते है या फिर मोबाइल का रिचार्ज लेने के लिए तिनियाली तक दौड़ा देते हैं .शाम को पढ़ते हुए बच्चों को अक्सर उठकर मम्मी की बनायीं चाय किचेन से उठाकर ड्राइंग रूम में सोफे पर पसरे ये टीवी देख रहे पापा को देनी होती है या बाहर खांस रहे दादू को ... कई घरों में डीनर तैयार होने के बाद दादी दादा और पापा को डायनिंग टेबल पर बुलाने की जिम्मेदारी भी बच्चों की होती है ..... ये गलत है सर ! ऐसा मत कीजिये. इसके मनोवैज्ञानिक कारणों पर चर्चा बाद में करुँगी.
मैं एक महिला अध्यापक होने के कारण बच्चों की मानसिक अवस्था का प्रथम द्रष्टया ही अध्ययन कर लेती हूँ ...उनकी मायूसी के कारण अक्सर बहुत बड़े नहीं हुआ करते..जैसे टिफिन पसंद न आना ,,,शर्ट पर दाग लगे होने के कारण हो सकता है दोस्तों ने खिल्ली उडाई हो या फिर दोपहर में डेरीमिल्क खरीदने के लिए आज आपने पैसे न दिए हों....बस ऐसे ही छोटे छोटे प्यारे प्यारे कारण ...किसी भी बच्चे की मायूसी मुझसे देखी नहीं जाती और ऐसे मौकों पर मैं अक्सर उनके हंसने और खिलखिलाने का कारण बन जाती हूँ....आप भी ध्यान रखिये और कोशिश करिए ...उम्मीद है आप ऐसा ही करते होंगे .
बच्चे के चौबीस घंटे की पूरी जिम्मेदारी हमारी और आपकी मिलकर है ...और हम दोनों को बेहद ईमानदारी से अपने अपने जिम्मेदारियों को निभाना होगा.एक दुसरे का सहयोग करना होगा .इस बीच हो सकता है की एक दुसरे से कुछ गलतियाँ भी हो तो उन्हें सहयोगात्मक रूप से एक दुसरे की नजर में डालते हुए मिलकर सकारात्मक कदम उठाने होंगे ...क्यों की हम बच्चे के भविष्य के बहाने देश की नीव का निर्माण कर रहे है .. आपके बच्चे के भविष्य के साथ , परिवार समाज और देश का भविष्य भी तो जुड़ा हुआ है न ...इसका भी ख्याल तो हमे मिलकर रखना है .........क्यों की अध्यापक अगर बच्चे की इमारत रूपी भविष्य की नीव हैं तो अभिभावक भी स्तम्भ हैं ...कोई कोई भी इमारत सिर्फ नीव के भरोसे ही नही मुकम्मल हुआ करती .
जय हिन्द !
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