Friday, June 15, 2018

डाइंग डिक्लेरेशन (मृत्यु-पूर्व बयान) में फ़्राडियरी

फ़्राडियर- (भाग 14)
14- डाइंग डिक्लेरेशन (मृत्यु-पूर्व बयान) में फ़्राडियरी
हमारी न्यायिक-प्रक्रिया फ़्राडियरी का एक बेमिसाल नमूना है. कम ही क्षेत्रों में असत्य का इतने धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है. यह प्रक्रिया ऐसे सागर मंथन के समान है जिसमें देव और असुर दोनो एक दूसरे पर विजय पाने हेतु असत्य की मथानी का जमकर प्रयोग करते हैं. वादी एफ़. आई. आर. में अनेक असत्य अभियुक्त एवं असत्य गवाह के नाम लिखवाता है, विवेचक अनेक निर्दोष नामज़द अभियुक्तों का चालान करता है, अभियोजन एवं बचाव के वकील गवाहों से असत्य बयान दिलवाते हैं और अनेक निर्णय असत्य साक्ष्य एवं कुतर्क पर आधारित होते हैं.
एक रोचक तथ्य यह भी है कि न्यायिक प्रक्रिया में फ़्राडियरी करने वाले वादी, पुलिसजन, अभियोजक, वकील एवं अन्य सम्बंधित कर्मियों के पास फ़्राडियरी करने के बड़े ‘ठोस एवं अकाट्य’ कारण होते हैं. पुलिस अधिकारी के रूप में थानों के निरीक्षण के दौरान मैं पाता था कि वहां लगभग सभी एफ़. आई. आर. वादी की लिखित तहरीर के आधार पर लिखी जाती हैं, जब कि मेरा विचार था कि किसी के यहां डकैती, मारपीट, हत्या जैसी घटना घटित हो जाने पर वह व्यक्ति तहरीर लिखाकर थाना पर जाने के बजाय पहले थाने को मौखिक सूचना देता होगा. कानून के अनुसार थानेदार को एफ़ आई. आर. उसी मौखिक सूचना के आधार पर लिखनी चाहिये. उस मौखिक सूचना के सत्य पर आधारित होने की सम्भावना अधिक होती है. अतः मैं थानेदारों को बार-बार प्रथमतः प्राप्त मौखिक सूचना के अनुसार एफ़. आई. आर. लिखने को निर्देशित करता रहता था, परंतु थानेदार प्रायः उस आदेश की अनदेखी कर लिखित तहरीर लेकर ही एफ़. आई. आर. लिखते थे. पेशकार से पूछने पर उसने इसका एक बड़ा ‘ठोस’ कारण बताया कि यदि थानेदार मौखिक सूचना पर एफ़. आई. आर. लिखने लगें, तो अनेक वादी किसी नेता, वकील या घरवाले के पढ़ाने पर अगले दिन शिकायत कर देंगे कि वे तो एफ़. आई. आर. में अमुक–अमुक व्यक्ति को अभियुक्त नामज़द कर रहे थे, परंतु थानेदार ने ले-दे कर उनका नाम नहीं लिखा है. पेशकार की यह बात यथार्थ पर आधारित थी, परंतु यह भी सत्य था कि मौखिक सूचना पर एफ. आई. आर. न लिखकर वादी को तहरीर लिखाकर लाने को कहने से फ़्राडियरी की एक लम्बी श्रंखला जन्म ले लेती है.
सामान्य ग्रामीण व्यक्ति में एफ़. आई. आर. की तहरीर लिखने की योग्यता नहीं होती है और वह उसे लिखाने हेतु किसी नेता, वकील, पुलिसजन, प्रधान आदि के पास जाता है. इस बीच वादी के सलाहकार अथवा तहरीर के लेखक उसे मुकदमेबाज़ी की ऊंच-नीच समझाकर आरोपितों की सूची में वास्तविक अपराधियों के अतिरिक्त संदिग्ध अपराधियों एवं विरोधियों के नाम भी जुड़वा देते हैं. इससे वादी और नेता किस्म के व्यक्तियों को पुरानी दुश्मनी निकालने अथवा नामज़द व्यक्तियों से धन कमाने का ‘सुअवसर’ प्राप्त हो जाता है और विवेचक को सत्य का पता लगाने का श्रमसाध्य कष्ट उठाये बिना नामज़द व्यक्तियों को गिरफ़्तार कर चार्जशीट लगा देने और मुकदमे को ‘वर्क-आउट’ कर लेने की वाह-वाही लूटने का मौका मिल जाता है. एफ. आई. आर. में नामज़द निर्दोष व्यक्तियों का चालान करने हेतु विवेचक के पास दो अन्य ‘ठोस’ कारण भी होते हैं- 1.वादी अथवा सम्बंधित नेता विवेचक की शिकायत नहीं करता है, 2. अभियोजक एवं न्यायालय यह शिकायत नहीं करते हैं कि जब गवाह सभी नामज़द अभियुक्तों के विरुद्ध गवाही दे रहे थे, तब विवेचक ने कुछ का स्वार्थवश चालान न करके मुकदमा कमज़ोर कर दिया है. निर्दोष अभियुक्तों को ज़मानत देने और बरी कर देने में होने वाली आसानी बचाव के वकील और न्यायाधीश (यदि लक्ष्मी-भक्त हो) दोनो के लिये यश एवं लक्ष्मीकृपा के वर्धक सिद्ध होते है,
उपर्लिखित ‘ठोस’ कारणों के होते हुए भी मैं थानेदारों को प्रथम-प्राप्त मौखिक सूचना के अनुसार ही एफ. आई. आर. लिखने को प्रेरित करता रहा था. इसके फलस्वरूप वर्ष 1978 में डाइंग-डिक्लेरेशन में की गई फ़्राडियरी का एक बड़ा ज्ञानवर्धक प्रकरण उत्पन्न हुआ था. मैं उन दिनों एस. एस. पी., बरेली नियुक्त था. रात देर से सोया था और सुबह गहरी नींद में था. मुझे जगाने के लिये बंगले के बराम्दे में बैठा टेलीफोन अर्दली बार बार घंटी बजा रहा था. मेरे द्वारा टेलीफोन उठाने पर “जयहिंद सर” कहने के पश्चात वह बोला, “सर! थाना फ़तेहगंज पश्चिमी के एस. ओ. कुछ ज़रूरी बात करना चाहते हैं.” मेरे द्वारा हां कहते ही उस पर एस. ओ. की आवाज़ सुनाई दी,
“सर! आज रात मेरे इलाके में एक नवयुवक पर चाकू से जानलेवा हमला हुआ है. उसके पिता एफ़. आई. आर. की तहरीर दे रहे हैं जिसमें दो नवयुवकों को नामज़द किया गया है. प्रारम्भिक पूछताछ से लगता है कि उनमें एक निर्दोष है. एक भूतपूर्व मंत्री भी एफ़. आई. आर. में दोनो का नाम लिखने का ज़ोर डाल रहे हैं. मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं.”
इस पर मैने पूछा कि घटना की प्रथम सूचना आप को कैसे मिली थी. उत्तर मिला, “स्थानीय अस्पताल से थाने पर टेलीफोन आया था कि चाकू से घायल एक लड़के को अस्पताल लाया गया है, जिसकी हालत अच्छी नहीं है.”
मैने थानेदार से कहा कि अस्पताल से टेलीफोन पर मिली सूचना की बात ही एफ. आई. आर. में लिख दो और विवेचना प्रारम्भ कर दो. इस वार्तालाप को हुए लगभग पच्चीस दिन बीत चुके थे कि एक दिन बरेली निवासी राज्यमंत्री श्री अग्रवाल ने सर्किट हाउस में मुझे बुलाकर कहा कि अमुक पूर्व-मंत्री का कहना है कि थानाध्यक्ष, फ़तेहगंज पश्चिमी हत्या के केस में एक अभियुक्त को बचाने में लगे हैं. मृतक द्वारा डाइंग डिक्लेरेशन में दो अभियुकतों को नामज़द किये जाने के बावजूद वह एक को गिरफ़्तार नहीं कर रहे हैं. मैने राज्यमंत्री जी को आश्वस्त किया कि मैं स्वयं प्रकरण की जांच कर न्यायोचित कार्यवाही सुनिश्चित करूंगा.
यह वही प्रकरण था, जिसमें थानाध्यक्ष ने मुझे जगाकर मेरे निर्देश मांगे थे. इसमें घायल नवयुवक को फ़तेहगंज पश्चिमी स्थित अस्पताल के डाक्टर ने उसी दिन ज़िला अस्पताल, बरेली भेज दिया था, जहां 15 दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई थी. मृत्यु से एक दिन पहले ज़िला अस्पताल में उस लड़के का मृत्यु-पूर्व बयान एक मजिस्ट्रेट द्वारा लिखा गया था. इस बयान में उसने उन्हीं दो लड़कों द्वारा चाकू मारने की बात लिखाई थी, जिनको उसके पिता अपनी तहरीर में लिखकर एफ़. आई. आर. लिखाने आये थे, परंतु थानाध्यक्ष ने वह एफ़. आई. आर. न लिखकर मेरे निर्देशानुसार अस्पताल से फ़ोन पर प्राप्त सूचना के आधार पर रिपोर्ट लिखी थी. जब मैने जांच की तो पता चला कि मजिस्ट्रेट द्वारा लिखे गये डाइंग-डिक्लेरेशन में नामज़द दो लड़कों में एक तो वास्तव में अपराध में संलिप्त था, परंतु दूसरा नवयुवक निर्दोष था. वह उस रात्रि अपने गांव, जो घटनास्थल से 10 किलोमीटर दूर था, में ही मौजूद रहा था. असलियत में दूसरा अपराधी यह लड़का न होकर पूर्वमंत्री का एक बिग़ड़ा हुआ पुत्र था और मृतक के पिता ने एफ़. आई. आर. हेतु लाई तहरीर में पूर्व-मंत्री के पुत्र के स्थान पर इस दूसरे लड़के का नाम लिख दिया था, क्योंकि उसके पिता से उसकी दुश्मनी थी. संयोगवश मृतक के पिता, बिगड़े पुत्र के पिता (पूर्वमंत्री) और फ़तेहगंज पश्चिमी अस्पताल के डाक्टर तीनो एक ही जाति के थे और तीनो ही पूर्व-मंत्री के पुत्र को बचाने के षड़यंत्र में सम्मिलित हो गये थे. चाकू से घायल होने की घटना के 14 दिन बाद बरेली में घायल लड़के की दशा खराब होने पर मजिस्ट्रेट के द्वारा डाइंग-डिक्लेरेशन लिखा गया. उसमें भी उसने पिता के प्रभाव में पूर्व-मंत्री के पुत्र के बजाय निर्दोष लड़के का नाम ही लिखवाया था. उसके दूसरे दिन उसकी मृत्यु हो गई थी.
जब मैने फ़तेहगंज पश्चिमी अस्पताल के डाक्टर से पूछा तो उसने मुझसे कह दिया कि लड़के की हालत ज़्यादा खराब होने के कारण उसे अविलम्ब बरेली ज़िला अस्पताल भेज दिया था. यद्यपि डाक्टर ने कहा था कि उसने कोई डाइंग डिक्लेरेशन नहीं लिखा था, परंतु बाद में थानाध्यक्ष फ़तेहगंज पश्चिमी ने मुझे बताया कि उसकी सूचना के अनुसार जब घायल लड़का रात में फ़तेहगंज पश्चिमी स्थित अस्पताल लाया गया था, तो उसका प्राथमिक इलाज करने के अलावा उसकी दशा देखते हुए इस डाक्टर ने स्वयं उसका डाइंग-डिक्लेरेशन भी लिखा था. अब वह पूर्व-मंत्री के दबाव एवं पैसे के प्रभाव में इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर रहा है.
अतः मैने दूसरे दिन फिर थानाध्यक्ष को डाक्टर के पास भेजा. थानाध्यक्ष ने डाक्टर को एकांत में ले जाकर सहानुभूति जताते हुए कहा,
“एस. एस. पी. साहब को इस बात का सबूत मिला है कि आप ने घायल लड़के का डाइंग-डिक्लेरेशन लिखा था और उसे अब आप छुपाये हुए हैं. उन्होने आप के विरुद्ध हत्या के केस में गवाही छिपाने का जुर्म रजिस्टर करके आप को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया है.”
यह सुनते ही डाक्टर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, और उसने छिपाकर रखा हुआ डाइंग-डिक्लेरेशन लाकर थानाध्यक्ष को दे दिया. इस डाइंग डिक्लेरेशन में भी दो अभियुक्त नामज़द थे, परंतु उस निर्दोष युवक के स्थान पर पूर्व-मंत्री के पुत्र का नाम लिखा था. मैने डाक्टर से डाइंग-डिक्लेरेशन निकलवा लेने हेतु थानाध्यक्ष को शाबाशी दी. अपनी सुपरविज़न-रिपोर्ट में जांच के सारे तथ्य लिखते हुए थानाध्यक्ष को आदेश दिया कि वह मजिस्ट्रेट द्वारा लिखे गये बाद के डाइंग-डिक्लेरेशन को ग़लत मानते हुए डाक्टर के सामने दिये गये प्रथम डाइंग-डिक्लेरेशन के अनुसार पूर्व-मंत्री पुत्र को गिरफ़्तार करे और दोनो वास्तविक अपराधियों के विरुद्ध चार्ज-शीट दाखिल करे. थानाध्यक्ष ने तदनुसार चार्ज-शीट दाखिल की.
कुछ वर्ष बाद मुकदमा का फ़ैसला हुआ और पूर्व-मंत्री के पुत्र सहित दोनो युवकों को सज़ा हुई. तब मैं बरेली से स्थानांतरित हो चुका था, परंतु यह जानकर मुझे विशेष प्रसन्नता हुई कि विद्वान जज ने निर्णय पर पहुंचने से पहले मेरे द्वारा लिखी गई सुपरविज़न रिपोर्ट मंगाकर पढ़ी थी. अन्यथा मजिस्ट्रेट द्वारा लिखे गये डाइंग-डिक्लेरेशन को झुठलाना आसान काम नहीं था- एक तो डाइंग-डिक्लेरेशन के प्रकरणों में कानून डाक्टर की अपेक्षा मजिस्ट्रेट को अधिक विश्वसनीय मानता है और दूसरे मजिस्ट्रेट के द्वारा लिखा हुआ डाइंग-डिक्लेरेशन ही सही मायने में मृत्यु-पूर्व बयान था क्योंकि उसी के तुरंत पश्चात घायल नवयुवक मरा था.
इस घटना से मुझे एक बात स्पष्ट हो गई कि कानून की यह मान्यता कि मरते समय मनुष्य केवल सत्य बोलता है, स्वयं में एक बड़ा फ़्राड है. उस कमज़ोर मानसिक स्थिति में तो उससे कुछ भी कहलवाया जा सकता है.
-क्रमशः

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