Tissue culture/Route trainer विधि से सागवान Commercial प्रोजेक्ट से किसान हो सकते हैं मालामाल
👉ज़रूरत है systematic and technology से लगाये
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देश में किसानों की दयनीय हालत अब आम हो चुकी है।आए दिन कर्ज से दबे किसानों की आत्महत्या की खबरें प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सुर्खिया बनती रहती हैं।इन सबके बीच किसानों के लिए एक राहत भरी खबर है कि किसान अपने परंपरागत खेती के साथ ही सागवान के पौधे लगवाकर न सिर्फ कर्ज के बोझ से निजात पा सकते हैं बल्कि कुछ ही वर्षों में लाखों रुपये कमा सकते हैं।महत्वपूर्ण यह है कि इस मॉडल को अपनाने से किसानों की आर्थिक तरक्की के साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी। देश के कई राज्यो के किसानों ने अब पारंपरिक तरीके से खेती करना छोड़ दिया है तथा इस नए मॉडल को अपनाकर अपने खेतों में सागवान के पेड़ लगाने के साथ ही दोहरी खेती कर आर्थिक रूप से मजबूत बन रहे हैं।
कैसे करें सागवान के साथ दोहरी खेती:
एक हेक्टेयर खेत में किसान दो हजार पौधे लगा सकते हैं।पौधे लगने के एक साल बाद किसान खेत में इंटरकापिंग(सहखेती) करके उस खेत में ऑर्गेनिक सब्जियां, लहसन,अदरक,हल्दी,एलोबेरा आदि फसल उगा सकता है जिनकी आज बाजारों में अच्छी कीमत मिल रही है।इन फसलों से प्रति हेक्टेयर करीब दो लाख रूपए की अतिरिक्त कमाई की जा सकती है,जो पारंपरिक फसलों से होने वाले मुनाफे से कई गुना ज्यादा होता है
सागवान से होने वाला मुनाफा।:
सागवान की कीमत आजकल आसमान छू रही है।इसका कारण यह है कि हर घर में इस्तेमाल होने वाले फर्नीचर के लिए लोग सागवान की लकड़ी को ही पहली प्राथमिकता दे रहे हैं।इसके कारण सागवान की कीमत आगे भी बढ़ने की आशा है।
एक हेक्टेयर खेत में औसतन दो हजार पौधे तैयार किये जा सकते हैं।एक पौधे से न्यूनतम दस घन फीट लकड़ी तैयार होती है।
वर्तमान समय में teak wood ख़रीदने की कीमत3500 रूपये प्रति घन फीट से 5000 रुपए तक है।इस तरह प्रती घनफ़ीट किसान 2500×10=25000रूपये तथा प्रति हेक्टेयर 25000×2000=50000000 अर्थात पाँच करोड़ रुपये आमदनी की जा सकती है जो पारंपरिक रूप से की गई खेती से हुए मुनाफे से अतिरिक्त होगा।
सागवान की प्रजातियाँ।:
सागवान की बहुत सारी प्रजातियाँ है लेकिन भारत में मुख्य रूप से वर्माटिक कामयाब है।वर्माटिक को develop करने का चार तरीक़ा हैं।1. देशी सागवान, 2.हाई ब्रीड ,3.टीशू कल्चर ,और 4.रूट ट्रेनर प्रमुख है।
1-देशी सागवान लगभग चालीस से पचास साल में तैयार होता है। यह पौधा जब पेड़ के रूप में तैयार होता है तो अन्य प्रजातियों की अपेक्षा इसकी लंबाई कम मोटाई ज्यादा होती है।
2-हाइब्रिड-देशी सागवान की अपेक्षा हाइब्रिड सागवान को पूरी तरह तैयार होने में कुछ कम समय लगता है।हाइब्रिड सागवान बीस से पच्चीस साल में तैयार होता है।
3-टिशू कल्चर-टिशू कल्चर की प्रजाति का पौधा लगभग दस से बारह साल मे तैयार होता है।बारह साल में इस प्रजाति का पौधा लगभग तीन फीट मोटा होता है तथा इसकी उचाई करीब पैतीस फीट से ज्यादा होती है
4-रूट ट्रेनर-रूट ट्रेनर की प्रजाति का पौधा दस से बारह साल में ही तैयार हो जाता है।रूट ट्रेनर और टिशू कल्चर में बहुत अंतर नहीं होता है।
सागवान लगाने का तरीका।:
वेटिकन सोना एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी Vatican Shona Agrotech Pvt Ltd ( A Leading Sagwan Project Company)के सी ई ओ (C.E.O.) “राजेश सिंह राठौर “के अनुसार
सागवान लगाने के लिए सबसे पहले खेत के मिट्टी की जाँच करानी चाहिए।जाँच के आधार पर तीन तरह के रिपोर्ट तैयार की जाती है।पहला रिपोर्ट के आधार पर जमीन का पी एच (P.H.)वैल्यू निकाला जाता है।पी एच वैल्यू 6.5 से उपर होना चाहिये।इसके बाद मिट्टी की आवश्यकतानुसार
1.Land preparation Report पौधारोपण के पहले और उसके बाद की ज़मीन तैयारी करनी चाहिए।2.Irrigation Report दूसरे नंबर पर सिंचाई की रिपोर्ट होती है।कंपनी सिंचाई के लिए किसानों को ड्रिप एरिगेशन की सलाह देती है।ड्रिपएरिगेशन से पानी की बचत होती है साथ ही यह सभी पौधों के पास उनकी आवश्यकता के अनुसार पानी पहुँच जाता है।ड्रिप एरिगेशन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसकी कुल लागत का पच्चासी प्रतिशत धनराशि सबसिडी के रूप में सरकार वहन करती है।
3.Fertilizer Report
मूल रूप से बिहार के सिवान जिले के रहने वाले राजेश सिंह राठौर पहले बैंकिंग एंड इन्स्योरेन्स सेक्टर में ऊँचे प्रबंधन पद पर कार्यरत थे।इसके बाद वे सागवान की प्रजातियों पर रिसर्च करना शुरु किए।दो साल रिसर्च के बाद वर्ष 2014 में उन्होंने अपने गांव एक हेक्टेयर जमीन में खुद के दो हजार पौधे लगवाए।पौधों के साथ ही श्री राजेश ऑर्गेनिक सब्जियों तथा और भी महँगी बिकने वाली फ़सलों की भी खेती करते हैं।इसके बाद राजेश ने वर्ष 2016 में वेटिकन सोना एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड के नाम से कंपनी बनाकर किसानों को Tissueculture/रूटट्रेनर teakसागवान के पौधे लगाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।राजेश बताते हैं कि वर्तमान में कंपनी के तहत बिहार,यूपी, झारखण्ड,वेस्टबंगाल,हरियाणा, आदि राज्यों के बड़े पैमाने पर किसान अपने खेतों में सागवान लगाकर इंटरकापिंग(सहखेती) कर रहे हैं।तथा राजस्थान,दक्षिण भारत,मध्यप्रदेस,महाराष्ट्र, पंजाब के भी किसान इसका लाभ समझ कर हमारी कम्पनी से सम्पर्क कर रहे हैं।किसानो के proper सर्विस मिल सके इसके लिए अलग अलग राज्यों में कई शाखाएँ काम कर रही है और बहुत मात्रा में लोग काम करने के लिए Associate हो रहें है।उन्होंने बताया कि तैयार होने पर किसान की सहमति से सागवान को उचित कीमत पर बिकवाने की भी जिम्मेदारी कंपनी उठाती है।उनके अनुसार कंपनी सिर्फ टिशू कल्चर और रुट ट्रेनर प्रजाति के ही पौधे लगवाती है।सागवान लगाने में प्रति हेक्टेयर ढाई लाख रुपये का खर्च आता है तथा सालाना इसके रखरखाव पर भी तीस हजार रुपए खर्च होते हैं।जबकि दस से बारह साल बाद एक हेक्टेयर में लगे सागवानो की कीमत करीब पांच करोड़ रुपये तक होती है।यह सह खेती से की गई कुल कमाई के अतिरिक्त है।कुल मिलाकर सागवान के पेड़ के साथ सहखेती करने से किसानों की आर्थिक स्थिति तो मजबूत होगी ही देश के सामने पर्यावरण संरक्षण की जो समस्या वर्तमान में खड़ी है उस पर इससे काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
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ReplyDeleteI live in lakhisarai. I would like to teak plantation .so your mob no pl.
ReplyDeletemy mob no 7409828128
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