हाय! लला अब हैं कहां दुनिया मैं?
वर्ष 1954 में जनवरी महीने की हाड़तोड़ जाड़ों की अंधेरी रात थी. गांव के अधिकांश लोग कथरी (पुरानी यहां-वहां फटी रज़ाई) में टांगें समेटकर दुबके हुए सो रहे थे. ठंडी ओस से बचने हेतु बागों में वृक्षों पर घनी पत्तियों के बीच दुबकीं मोरें तीसरी बार पेंउ-पेंउ बोलकर बता चुकीं थीं कि रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका है और चौथा (अंतिम) पहर चल रहा है. सायंकाल देर तक नर-कुत्ते किसी साथिन के लिये आपस में लड़ते रहे थे और अब सो गये थे, परंतु मेरे पड़ोसी लालाराम की कुतिया के दुधमुहें 5 पिल्ले जाड़ा सहन न होने पर कूं-कूं कर चिल्लाने लगते थे. यद्यपि मैं अपनी कथरी में मुंह ढककर गहरी नींद सो रहा था, तथापि मुझे सोते-सोते में लगा था कि पिल्लों की कूं-कूं के अतिरिक्त एक और ऐसी आवाज़ कहीं दूर से आ रही थी, जैसे किसी शांत सायं में दूर से आता हुआ तूफ़ान. मेरी नींद खुल गई थी और तब मैं स्पष्ट सुनने लगा था कि निकट के ग्राम पटयाइत की दिशा से ‘पकरौ-पकरौ’, ‘बम्बा (छोटी नहर) की ओर लै गये है’, ‘भाजन न पांय’ जैसी आवाज़ें मेरे गांव की ओर ऐसे बढ़ रहीं थीं जैसे ज्वार के समय सागर के तट की ओर आती हरहराती लहरें. मेरे निकट की खटियों पर सोये हुए रामचंद्र भाईसाहब व श्रीचंद्र ददा तथा उगिंदर जीजा भी जाग गये थे. हम सब आशंकित व भयभीत होकर उन आवाज़ों का कारण जानने का प्रयत्न करने लगे थे. धीरे-धीरे हमारे गांव के लोगों की आवाज़ भी उन आवाज़ों में सम्मिलित होने लगीं और ऐसा लगा कि सब लोग बम्बा की तरफ़ भाग रहे हैं. हम बालकों की हिम्मत बढ़ी और हम भी चादर लपेटकर घर से निकले और बम्बा की ओर चल दिये. वहां अफ़रा-तफ़री मची हुई थी – कुछ लोग बम्बा के किनारे-2 पूर्व की ओर भाग रहे थे और कुछ निकट के खेतों में ताक-झांक कर रहे थे, कुछ लोग बम्बा के पुल पर खड़े होकर पूर्व की ओर मुंह किये हुए चिल्ला रहे थे, “इहंईं लै गओ हुययै...… अबै दूर नाईं जाय पाओ हुययै... घबड़ाव न, सूबेदार मिल जययैं.....”.. पूछने पर पता चला कि पटयाइत के सूबेदार का कुछ लोगों ने रात में अपहरण कर लिया है और बम्बा किनारे पटरी पर से पूर्व की ओर ले गये हैं.
सूबेदार एक नवयुवक थे और मेरे से कुछ वर्ष ही बड़े थे. यह सुनकर हम लोग सन्न रह गये थे. उनके पिता, चाचा आदि पुल पर बैठकर हृदयविदारक विलाप कर रहे थे – ‘हाय अब सूबेदार कहां मिलययैं, हाय लला को तो मार डारो हुयययै. हाय मेरो लाल!’ एक अजीब बात यह थी कि सूबेदार के घर के लोग बड़ी ज़ोर-ज़ोर से विलाप तो कर रहे थे, परंतु उनमें से कोई व्यक्ति अपहर्ताओं को पकड़ने दौड़कर आगे नहीं जा रहा था. यदि गांव का कोई व्यक्ति सहानुभूति में उनसे कह देता कि ‘धीरज धरौ. सूबेदार को ढुंढबे मैं हम सब जान लगाय दियैं, बे जरूर मिल जययैं’, तो वे और ज़ोर से रोकर बोलने लगते, “हाय! अब लला हैं कहां दुनिया में? उन बदमासन नैं अब लौ का उनै छोड़ो हुइयै? अब लौ तौ उनको खेल खतम कर दओ हुइयै.... हाय मेरो लला.” कुछ लोग घटना के विषय में पूछ रहे थे तो बस यह उत्तर मिल रहा था, ‘चार-पंच जने हते. द्वारे पै आय कें सूबेदार कौ पुकारो और बा के निकरबे पै बाय दबोच लओ और बम्बा की ओर भाजन लगे. सूबेदार के चिल्लैबे हम सब निकरे, लेकिन तब लौ बे दूर निकर चुके हते.” किसी को पहिचानने के विषय में पूछने पर उत्तर मिलता कि सब कम्बल ओढ़े हुए थे. उसके बाद पुनः विलाप प्रारम्भ हो जाता, ‘मेरे लाल अब कहां मिलययैं. हत्यारन ने अब लौं थोरेऊं जिंदा छोड़ो हुययै.’
इतना हो-हल्ला सुनकर मोर एक बार फिर पेड़ों पर पेंव-पेंव बोले और पूर्व दिशा में लाली उगने से पहले ही नीचे उतरकर खेतों की ओर पेट-पूजा के लिये चल दिये थे. जब सूरज ऊपर चढ़ने लगा तो सूबेदार को ढूंढने गये लोग लौटने लगे. सबका उतरा हुआ मुंह देखकर स्पष्ट था कि सूबेदार नहीं मिले हैं. उनके कुछ बोलने से पहले ही सूबेदार के घर वाले फिर दहाड़ मारकर चिल्ला उठे, ‘हाय, लला अब नाईं हैं दुनिया मैं.’ कुछ बड़ों ने उन्हें ढाढ़स दिलाने का फिर प्रयत्न किया. तत्पश्चात धीरे धीरे सब लोग हताश होकर अपने घरों को चल दिये.
उन दिनों गांव की सभ्यता में आज की तरह वैयक्तिकता का बोलबाला नहीं था और किसी के घर की बात अधिक समय तक दुबी-छिपी नहीं रहती थी. सूबेदार तो अगले 10 दिन तक नहीं लौटे, परंतु उससे पहले ही लोग जान गये थे कि ‘लला इसी दुनिया में हैं और भले-चंगे हैं’. उनके अपहरण का ड्रामा रचा गया था. उन्होंने साल भर पहले कानपुर के किसी ठग से मिलकर गांव में ‘हीरो बनने का सुनहरा मौका’ शीर्षक पैम्फलेट बंटवाये थे जिनमें छपा था ‘रक्काशा’ फिल्म की शूटिंग होने जा रही है. उसमें काम करने के लिये बहुत से कलाकारों की आवश्यकता है. इच्छुक युवा फ़ार्म भर दें और सौ रुपये जमाकर अपना स्थान सुरक्षित करा लें. ’उन दिनों गांव वाले छपे काग़ज़ को पत्थर की लकीर मानते थे और तमाम युवा और अधेड़ झांसे में आ गये थे. जब साल भर तक हीरो बनने का बुलावा नहीं आया, तो ये लोग सूबेदार से अपने पैसे वापस मांगने लगे थे और बार-बार की टाल-टूल पर धमकी भी देने लगे थे. ऐसी परिस्थिति से बचने के लिये सूबेदार और उनके घर वालों को सूबेदार का ‘अपहृत’ हो जाना ही कारगर उपाय लगा था.
और यह उपाय कारगर भी साबित हुआ था. इस ड्रामा के बाद ठगे गये लोगों की समझ में आ गया था कि सूबेदार और उनके घरवाले कोई छोटे-मोटे कमज़ोर फ़्राडियर नहीं हैं – वरन ऊंचे समर्थ खिलाड़ी हैं. उन लोगों ने उनसे रुपये वापस मांगना छोड़ दिया था क्योंकि बचपन से सुनी इस चौपाई पर उनका अडिग विश्वास था - ‘समरथ को नहिं दोस गुसाईं’ . हां कुछ मसखरे लोग सूबेदार की चर्चा होने पर यह अवश्य बोल पड़ते थे,
‘हाय! लला अब हैं कहां दुनिया मैं?’
सूबेदार एक नवयुवक थे और मेरे से कुछ वर्ष ही बड़े थे. यह सुनकर हम लोग सन्न रह गये थे. उनके पिता, चाचा आदि पुल पर बैठकर हृदयविदारक विलाप कर रहे थे – ‘हाय अब सूबेदार कहां मिलययैं, हाय लला को तो मार डारो हुयययै. हाय मेरो लाल!’ एक अजीब बात यह थी कि सूबेदार के घर के लोग बड़ी ज़ोर-ज़ोर से विलाप तो कर रहे थे, परंतु उनमें से कोई व्यक्ति अपहर्ताओं को पकड़ने दौड़कर आगे नहीं जा रहा था. यदि गांव का कोई व्यक्ति सहानुभूति में उनसे कह देता कि ‘धीरज धरौ. सूबेदार को ढुंढबे मैं हम सब जान लगाय दियैं, बे जरूर मिल जययैं’, तो वे और ज़ोर से रोकर बोलने लगते, “हाय! अब लला हैं कहां दुनिया में? उन बदमासन नैं अब लौ का उनै छोड़ो हुइयै? अब लौ तौ उनको खेल खतम कर दओ हुइयै.... हाय मेरो लला.” कुछ लोग घटना के विषय में पूछ रहे थे तो बस यह उत्तर मिल रहा था, ‘चार-पंच जने हते. द्वारे पै आय कें सूबेदार कौ पुकारो और बा के निकरबे पै बाय दबोच लओ और बम्बा की ओर भाजन लगे. सूबेदार के चिल्लैबे हम सब निकरे, लेकिन तब लौ बे दूर निकर चुके हते.” किसी को पहिचानने के विषय में पूछने पर उत्तर मिलता कि सब कम्बल ओढ़े हुए थे. उसके बाद पुनः विलाप प्रारम्भ हो जाता, ‘मेरे लाल अब कहां मिलययैं. हत्यारन ने अब लौं थोरेऊं जिंदा छोड़ो हुययै.’
इतना हो-हल्ला सुनकर मोर एक बार फिर पेड़ों पर पेंव-पेंव बोले और पूर्व दिशा में लाली उगने से पहले ही नीचे उतरकर खेतों की ओर पेट-पूजा के लिये चल दिये थे. जब सूरज ऊपर चढ़ने लगा तो सूबेदार को ढूंढने गये लोग लौटने लगे. सबका उतरा हुआ मुंह देखकर स्पष्ट था कि सूबेदार नहीं मिले हैं. उनके कुछ बोलने से पहले ही सूबेदार के घर वाले फिर दहाड़ मारकर चिल्ला उठे, ‘हाय, लला अब नाईं हैं दुनिया मैं.’ कुछ बड़ों ने उन्हें ढाढ़स दिलाने का फिर प्रयत्न किया. तत्पश्चात धीरे धीरे सब लोग हताश होकर अपने घरों को चल दिये.
उन दिनों गांव की सभ्यता में आज की तरह वैयक्तिकता का बोलबाला नहीं था और किसी के घर की बात अधिक समय तक दुबी-छिपी नहीं रहती थी. सूबेदार तो अगले 10 दिन तक नहीं लौटे, परंतु उससे पहले ही लोग जान गये थे कि ‘लला इसी दुनिया में हैं और भले-चंगे हैं’. उनके अपहरण का ड्रामा रचा गया था. उन्होंने साल भर पहले कानपुर के किसी ठग से मिलकर गांव में ‘हीरो बनने का सुनहरा मौका’ शीर्षक पैम्फलेट बंटवाये थे जिनमें छपा था ‘रक्काशा’ फिल्म की शूटिंग होने जा रही है. उसमें काम करने के लिये बहुत से कलाकारों की आवश्यकता है. इच्छुक युवा फ़ार्म भर दें और सौ रुपये जमाकर अपना स्थान सुरक्षित करा लें. ’उन दिनों गांव वाले छपे काग़ज़ को पत्थर की लकीर मानते थे और तमाम युवा और अधेड़ झांसे में आ गये थे. जब साल भर तक हीरो बनने का बुलावा नहीं आया, तो ये लोग सूबेदार से अपने पैसे वापस मांगने लगे थे और बार-बार की टाल-टूल पर धमकी भी देने लगे थे. ऐसी परिस्थिति से बचने के लिये सूबेदार और उनके घर वालों को सूबेदार का ‘अपहृत’ हो जाना ही कारगर उपाय लगा था.
और यह उपाय कारगर भी साबित हुआ था. इस ड्रामा के बाद ठगे गये लोगों की समझ में आ गया था कि सूबेदार और उनके घरवाले कोई छोटे-मोटे कमज़ोर फ़्राडियर नहीं हैं – वरन ऊंचे समर्थ खिलाड़ी हैं. उन लोगों ने उनसे रुपये वापस मांगना छोड़ दिया था क्योंकि बचपन से सुनी इस चौपाई पर उनका अडिग विश्वास था - ‘समरथ को नहिं दोस गुसाईं’ . हां कुछ मसखरे लोग सूबेदार की चर्चा होने पर यह अवश्य बोल पड़ते थे,
‘हाय! लला अब हैं कहां दुनिया मैं?’
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