Wednesday, April 11, 2018

माननीय के विरुद्ध अभियोग मात्र थानाध्यक्ष के सामान्य विवेक पर पंजीकृत होना संभव नहीं है। पंजीकरण के मूल में कोई न कोई विशेष परिस्थिति अवश्य रही होगी।

प्रश्नगत संदर्भ में अब तक जो भी चर्चा हुई है वह किसी भी ऐसे राजनैतिक व्यक्ति जो राजनीति में अच्छा स्तर रखता है के विरुद्ध मुकदमा वापसी के सम्वध में हुई है। वास्तविक स्थिति यह है कि यह चक्रव्यूह का अन्तिम द्वार है अन्यथा अधिकांशत तो इससे पूर्व ही अभियोग के पंजीकरण, विवेचना, अभियोजन स्वीकृति, अभियोजन के लिए आरोप निर्धारण के स्तर किसी नामचीन अधिवक्ता से बहस कराकर, इसमें भी सफल न होने पर साक्षी गण को येन केन प्रकरेण तोडने के प्रयास कर इनमें से किसी न किसी द्वार पर विजय प्राप्त कर चर्चा में भी नहीं आते। यदि सभी प्रयासों में सफल नहीं होते तब अभियोग वापसी का अन्तिम ब्रह्मास्त्र उनकी रक्षा करता है। चरणबद्ध रूप से प्रक्रिया को जानना भी आवश्यक है।
१- माननीय के विरुद्ध अभियोग मात्र थानाध्यक्ष के सामान्य विवेक पर पंजीकृत होना संभव नहीं है। पंजीकरण के मूल में कोई न कोई विशेष परिस्थिति अवश्य रही होगी।
२- विवेचना के स्तर विवेचक को विभिन्न दबावों का सामना करना पड़ा होगा। कई विवेचक तथा विवेचना इकाई परिवर्तित हुई होगी। संभवतः विवेचक को उच्च न्यायालय में प्रति शपथ पत्र भी दाखिल करने पड़े होंगे। उस समय और भी विपरीत स्थिति उत्पन्न हो जाती है जब अभियोग की विवेचना लम्बित हो तथा सरकार बदल जाती है तब बदली परिस्थितियों के अनुसार विवेचना के लिए नये निर्देश विवेचक को मिलते हैं।
३- यदि अभियोग किसी अन्य नियम से संरक्षित है तो अभियोजन स्वीकृति आदि जैसी औपचारिकताओं को पूर्ण करने में विवेचक को काफी परिश्रम करना पड़ता है।
४- यदि उपरोक्त प्रक्रियाओं​ से सफलता पूर्वक निकल कर अभियोग न्यायालय तक पहुंच जाता है तो आरोप निर्धारण में ही उन्मोचित होने का पूर्ण प्रयास किया जाता है।
५- इसके बाद भी यदि अभियोग विचारण में आ जाता है तो गवाहों को विन ओवर करने का हर संभव प्रयास होता है। इसमें मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह भी रहा है कि जब साक्षी न्यायालय में उपस्थित होता है तो बचाब पक्ष कोई न कोई बहाना लेकर तारीख पर तारीख लेकर गवाहों को हतोत्साहित करने का प्रयास करते हैं। 
इन सब परिस्थितियों से निपटने के बाद जब मालूम होता है कि अभियोग सरकार ने वापस ले लिया तो जो कष्ट होता है वह अवर्णनीय है।

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