एक हिंदू अपने बच्चे को पढ़ा लिखाकर नौकरी में ठेलने को ही परम पुरुषार्थ मानता है।
पढ़ लिख कर हिंदू बच्चा 20/30 हजार तक कमाई करने वाला धनपशु हो जाता है।
नौकरी के खूंटे से बंधा हुआ वो अपने ही समाज के हर उस व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता है जो नौकरी में नहीं है और व्यवसाय में उससे कम कमा रहा है।
नौकरी से सम्मोहित हिंदू न घर का रहता है न घाट का। अगर वो ज्यादा प्रगति करता है तो अपने घर से बहुत दूर रहने लगता है और उसके बूढ़े मां बाप रईस यतीमों की तरह अपने नगर में मृत्यु तक प्रॉपर्टी की चौकीदारी करते हैं।
समाज में इस धनपशु का कोई योगदान नहीं है पर सम्मान इसी का है, क्योंकि आज हिंदू मूलतः धन उपासक समाज है। मूल्यों की बकवास चार लोगों के बीच रौब झाड़ने का सरल उपाय है।
दूसरी ओर, मोमिन है। उसका बच्चा औपचारिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाता। किशोर होते होते किसी भी तरह के हुनर से चिपक जाता है। गैराज, वैल्डिंग, मटनशॉप इत्यादि हल्के स्तर के काम करता है और अपने घर में बूढ़े मां बाप के साथ ही रहता है। उसकी दूकान या वर्कशॉप पर उसकी अगली पीढ़ी प्रशिक्षित हो रही होती है जैसे कभी वो हुआ था।
वो अपने समाज के एकीकरण का महत्वपूर्ण घटक बनकर अपनी जगह पर ही रहता है और कमोबेश उतना ही कमा लेता है जितना हिंदू का कल्चर्ड धनपशु हाई प्रोफाइल खानाबदोश।
फसाद की अवस्था में हिंदू का कल्चर्ड धनपशु हाई प्रोफाइल खानाबदोश पता नहीं किस कोने में पड़ा व्यवस्था पर नुक्ताचीनी कर रहा होता है और मोमिन अपने लोगों के साथ हथियार लेकर खड़ा होता है। उसे केस का डर नहीं है क्योंकि वो नौकरी में नहीं है। पेशियां चलती रहेंगी और व्यवसाय भी।
उसे सरकार निशस्त्र नहीं कर सकती क्योंकि, वो ऐसे शस्त्र रखता ही नहीं जो सरकार बांटे। और चूंकि वो एक सघन एकीकृत समाज का योद्धा है इसलिए उसके समाज के सक्षम लोग सरकार की नाक दबाकर मुंह खुलवा लेते हैं।
धनपशु तलवार भी रखे तो २५ आर्म्स एक्ट के भय के साये में जीता है और मोमिन ए के ४७ रखकर भी बेफिक्र होकर रहता है ।
पढ़ लिख कर हिंदू बच्चा 20/30 हजार तक कमाई करने वाला धनपशु हो जाता है।
नौकरी के खूंटे से बंधा हुआ वो अपने ही समाज के हर उस व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता है जो नौकरी में नहीं है और व्यवसाय में उससे कम कमा रहा है।
नौकरी से सम्मोहित हिंदू न घर का रहता है न घाट का। अगर वो ज्यादा प्रगति करता है तो अपने घर से बहुत दूर रहने लगता है और उसके बूढ़े मां बाप रईस यतीमों की तरह अपने नगर में मृत्यु तक प्रॉपर्टी की चौकीदारी करते हैं।
समाज में इस धनपशु का कोई योगदान नहीं है पर सम्मान इसी का है, क्योंकि आज हिंदू मूलतः धन उपासक समाज है। मूल्यों की बकवास चार लोगों के बीच रौब झाड़ने का सरल उपाय है।
दूसरी ओर, मोमिन है। उसका बच्चा औपचारिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाता। किशोर होते होते किसी भी तरह के हुनर से चिपक जाता है। गैराज, वैल्डिंग, मटनशॉप इत्यादि हल्के स्तर के काम करता है और अपने घर में बूढ़े मां बाप के साथ ही रहता है। उसकी दूकान या वर्कशॉप पर उसकी अगली पीढ़ी प्रशिक्षित हो रही होती है जैसे कभी वो हुआ था।
वो अपने समाज के एकीकरण का महत्वपूर्ण घटक बनकर अपनी जगह पर ही रहता है और कमोबेश उतना ही कमा लेता है जितना हिंदू का कल्चर्ड धनपशु हाई प्रोफाइल खानाबदोश।
फसाद की अवस्था में हिंदू का कल्चर्ड धनपशु हाई प्रोफाइल खानाबदोश पता नहीं किस कोने में पड़ा व्यवस्था पर नुक्ताचीनी कर रहा होता है और मोमिन अपने लोगों के साथ हथियार लेकर खड़ा होता है। उसे केस का डर नहीं है क्योंकि वो नौकरी में नहीं है। पेशियां चलती रहेंगी और व्यवसाय भी।
उसे सरकार निशस्त्र नहीं कर सकती क्योंकि, वो ऐसे शस्त्र रखता ही नहीं जो सरकार बांटे। और चूंकि वो एक सघन एकीकृत समाज का योद्धा है इसलिए उसके समाज के सक्षम लोग सरकार की नाक दबाकर मुंह खुलवा लेते हैं।
धनपशु तलवार भी रखे तो २५ आर्म्स एक्ट के भय के साये में जीता है और मोमिन ए के ४७ रखकर भी बेफिक्र होकर रहता है ।
मोदी को कोस कर थक जाओ तो सोचना कभी कि ऐसा क्यों??
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