Monday, January 15, 2018

दुनिया किधर जाए .

गी ?दुनिया किधर जाए ...इस सवाल का कोई ख़ास मतलब नहीं है.
पर दुनिया किधर जा रही है ? ये सवाल आज ज्यादा अहम है.
...नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की पिछली साइड ..यानि अजमेरी गेट की तरफ मैं जैसे ही सूटकेस लेकर तेज़ी से बाहर निकला कि मेरी नज़र 4523 नंबर प्लेट पर ठहर गयी. अचानक पाँव वही थम गए और मैंने इशारे से ड्राइवर को कैब दाहिने ओर रोकने को कहा. उबर की ये वही कैब थी जिसे कुछ ही मिनट पहले, आउटर पर पहुंच रही ट्रैन से मैंने हायर किया था. स्मार्ट फ़ोन और ऐप का ये कमाल था कि ट्रैन से उतरकर और कैब में चढ़कर मुझे तीन या चार मिनट ही लगे.
लेकिन असली कमाल तो कैब में इंतज़ार कर रहा था.
कनाटप्लेस से सफ़ेद डिजायर 4523 आगे बढ़ी तो ड्राइवर का कुछ इम्प्रेस करने वाला सवाल मेरे कानो में गूंजा..."आप टीवी रिपोर्टर हैं." मैंने सोचा कि अब इसे ये कौन बताए कि टीवी में तो मैं दो साल पहले था....इसलिए मैंने धीमे से हूँ कहकर बात टाल दी.
"लेकिन काफी दिनों से आप टीवी पर नज़र नहीं आते," उसने फिर कहा.
मैंने अपना फ़ोन उठाया , ऐप खोला और उसका नाम देखा. थोड़ी उत्सकता हुई उसका नाम पढ़कर. " कुमार शेखर, भई..आपका नाम तो कवी टाइप है."
"नहीं सर , मैं सिर्फ लिखता हूँ. ब्लॉग लिखता हूँ."
"ब्लॉग...भई कमाल है शेखर साहब. कैब भी चलाते हैं , ब्लॉग भी लिखते हैं."
कुछ देर चुप रहने के बाद वो बोला." सर, मैं सिर्फ लिखता हूँ. टैक्सी जीने के लिए चलाता हूँ. आपकी काल आज की आखिरी काल थी.. रात दस बजे के बाद टैक्सी नहीं चलाता हूँ. अब घर जाकर सिर्फ लिखने का काम होगा. रात दो बजे तक ."
शेखर ने बताया कि वो गोरखपुर से सटे महारजगंज जिले से है. वो ब्लॉग के अलावा फेसबुक और व्हाट्सअप पर भी सक्रिय है. यूपी में व्हाट्सएप ज्यादा चलता है. अब गाँव के ही कुछ पढ़े लिखे लड़कों के साथ मिलकर वो नीलगगन नाम से एक वेबसाइट लाने जा रहा है. 
मैंने पूछा नीलगगन का मतलब क्या है ?
शेखर ने बताया कि वो बसपा के काडर से है और इसलिए पार्टी के नीले रंग को उसने आसमान(गगन) से जोड़कर अपनी साइट का नाम दिया है.
मैंने पूछा आपको क्या लगता है बहनजी फिर से मज़बूत हो रही हैं ? 
"अरे शर्माजी आप लोग मोदीजी के सपोर्टर हैं ...आप कहाँ हमारी बात मानने वाले हैं., " वो बोला.
इस जवाब के बाद मैं कुछ सन्न सा रह गया. एक अजीब सी दलित-अपर कास्ट वाली फीलिंग ने कैब में अचानक ख़ामोशी भर दी. 
लेकिन शेखर का कमिटमेंट देख कर मैं हैरान था. अपनी बिरादरी की बेहतरी के लिए वो इस शहर में खुद को झोंक रहा है. एक छोटी सी वेबसाइट खड़ा करने के लिए वो अपने जीजा की कैब रोज़ाना ७-८ घंटे दिल्ली में दौड़ा रहा है.
वो मुझसे दुबारा मिलना चाहता है.
वो जानना चाहता है कि दो साल मैंने डिजिटल मीडिया में क्या काम किया और खबरें कैसे बेहतर तरीके से लिखी जा सकती हैं ..कैसे सोशल मीडिया पर उन्हें तेज़ी से शेयर किया जा सकता है. 
शेखर अपनी वेबसाइट के ज़रिये अपने गाँव-कसबे के ठाकुर और पंडितों से जेहनी तौर पर दो दो हाथ करना चाहता है. वो इस नेट-फाइट के लिए अपने समर्थक जुटा रहा है. और इस दिशा में वो सोशल मीडिया पर हावी हो रहा है. 
ये बातें वो खुद बताता नहीं लेकिन उसके इरादों से ज़ाहिर होती है.
मुझे उसके इरादों से कोई गुरेज नहीं .
क्यूंकि अपनी सियासी मंज़िलों को पाने के लिए ये काम आज दुनिया में ट्रम्प से लेकर केजरीवाल तक कर रहे हैं. हर कोई सोशल मीडिया को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है.तो शेखर कर रहा है तो इसमें बुरा क्या है ? 
मैंने बीच रास्ते में ही सोचा कि मैं शेखर को उसके कास्ट बेस्ड अजेंडे पर मदद नहीं करूँगा. 
पर शेखर को टेक्निकल जानकारी देने से कैसे रोक सकता हूँ. इसलिए मैंने तय किया की उसे डिजिटल मीडिया के गुर ज़रूर बताऊंगा.
जानकारी पाने का उसे हक़ है.
और अगर बेहतर ढंग से जानकारी दी जाए 
तो शायद वो कुछ बदल भी सकता है.

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