Friday, January 5, 2018

जातिवादी_ब्र्राह्मण

#जातिवादी_ब्र्राह्मण
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सैकड़ों साल पहले जब औरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में 2,50,000 ब्राह्मणों और उनके परिवारों की ह्त्या करवाई, उसने हिन्दू ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडों की इतनी ऊंची मीनार खडी की जो कि कई मील दूर से दिखाई देती थी, उसने ब्राह्मणों के जनेऊओं के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेंके.........
क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया...
फिर भी हमारे दलित भाइयों को ओरंगजेब के वंशज भाई मालूम होते हैं...
कोंकण-गोवा में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया.........लेकिन फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ..............
जब पुर्तगाली भारत आये, तब ज़ेवियर ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा “यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे... यानि कि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े... जिन्होंने ने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा... हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए,.. अपना सब कुछ गंवा कर... क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया? फिर भी सेंट ज़ेवियर (saint Xaiver) के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज है और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं......
इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण काश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए... आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं, और वहां एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है.....और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने काश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया........कश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुओं में रह रहे हैं... फिर भी आज ब्राह्मण शोषण और अत्याचार का पर्याय माना जाता है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं......
भीमराव अंबेडकर जो कि भारत के संविधान के तथाकथित रचियता (प्रारूप समिति के अध्यक्ष) थे, उन्होंने एक मुसलमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिया मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना...
और कमाल देखिये सब कुछ जानते हुए भी डॉ भीमराव सकपाल (अम्बेडकर) ने भी ब्राह्मणों का जीवन भर विरोध किया.....
१९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिन टीपू सुलतान की सेना ने चढाई कर दी और वहां के 8000 नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम आयंगर थे.... वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे.... (आज तक मेलकोट में दिवाली नहीं मनाई जाती...) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशान बन गया.....
ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे.. उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया... फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है.. उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं... और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए...
आज संदर्भ में कहा जाए तो ब्राह्मण को गोडसे बनना चाहिए बीरबल बन कर चाकरी करने से बेहतर है... अब ब्राह्मण को भगवान श्री परशुराम का अनुकरण करना होगा, पापियों का नाश करने हेतु तत्पर होना होगा....
जाती वादी नहीं हूँ ....मजबूरन लिखना पड़ा ....
दुखी कलम से.....
Sheshnath Tiwari की वाल से कापी पेस्ट किया गया है

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