Thursday, January 4, 2018

मित्रों , ह्रीं वह बीज मंत्र है जो सनातन मंत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है । लाखो मन्त्र इसी बीज मंत्र से ऊर्जा एवं प्राण प्राप्त करते है

मित्रों , ह्रीं वह बीज मंत्र है जो सनातन मंत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है । लाखो मन्त्र इसी बीज मंत्र से ऊर्जा एवं प्राण प्राप्त करते है । बीज मंत्रों का गूढार्थ गहन साधना का गुप्त विषय है, ऐसे में जनसामान्य को कम से कम यह बेसिक जानकारी तो होना ही चाहिए की व्याकरण की दृष्टि से इस महान बीज मंत्र का विन्यास क्या है ।
उपरोक्त सम्बंध में निम्न मंत्र पर विचार करें ।
वियद इकार संयुक्तम वीतिहोत्र समंवितं ।
अर्धेन्दु लसितं देव्या बीजं सर्वार्थ साधकं ।।
वियद इकार सयुंक्त - वियद अर्थात आकाश ,
आकाश तत्व का बीज मंत्र है "ह" ,
इस "ह " शब्द से ईकार अर्थात ई की मात्रा जुडी ।
ईकार अर्थात स्त्रैण या प्रजननक शक्ति । अर्थात पदार्थ उत्पन करने की शक्ति ।
मित्रो , आप जानते है ईकार या ई की मात्रा लगने से अधिकाँश संज्ञा स्त्रीलिंग हो जाती है ।
अब आकाश तत्व के बीज मंत्र से ई-कार सयुंक्त हुआ जिससे शब्द होगया " ही " ।
मन्त्र में आगे लिखा है कि " वीतिहोत्र समंवितं " ,
वीतिहोत्र अर्थात अग्नि , अग्नि का बीज मंत्र है " र " ।
वियद और ईकार युक्त शब्द में अग्नि के बीज मंत्र का समन्वय हुआ और शब्द हो गया " ह्री "
आगे मन्त्र कहता है " अर्धेन्दु लसितं " ,
अर्ध अर्थात आधा और इंदु अर्थात चन्द्रमा ,
इस तरह अर्धेन्दु अर्थात अर्ध चन्द्र बिंदु ।
लसितं अर्थात चमकना , अथवा चैतन्यता , अथवा हार्ड वेयर " ह्री " का साफ्टवेयर ।
इस तरह वियद , ई कार और वीतिहोत्र युक्त शब्द
"ह्री " पर अर्ध चन्द्र बिंदु स्थापित हुआ ।
इस तरह से सर्वार्थ साधक देवी बीज मंत्र "ह्रीं " का विन्यास हुआ ।
अर्थात आकाश या शून्य में निर्माण और अग्नि यानी उस निर्माण का परिपक्वन अर्थात पोषण और चंद्र बिंदु के रूप में दैवी शक्ति का संरक्षण ।
ऐंकारी सृष्टि रूपाय ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपण्ये बीज रुपे नमोस्तुते ।। (कुंजिका स्तोत्र)
ऐं बीज से अष्टधा सृष्टि उत्पन्न होती है , ह्रीं बीज से पालन होता है , क्लीं बीज से कामनाएं जाग्रत होती है
चंद्र बिंदु स्वयं देवी रूप है ।
एक अन्य मन्त्र में आया है कि
सुधा अक्षरे त्वमेव त्रिमात्रात्मिका स्थिता ।
अर्ध मात्रात्मिका स्थिता यानुचार्या विशेषतः ।। (रात्रि-सूक्त)
अर्थात सुधा अक्षर (ॐ) की तीनों मात्रा (अकार,ई कार, मकार ) एवं चन्द्रबिन्दु जिसका कोई अपना स्वतंत्र उच्चारण नही है (पुरुष बिना प्रकृति नही) वह भी, हे देवी साक्षात् आपका ही स्वरूप है ।
मित्रों , जिस प्रकार हमारी वर्णमाला में बिंदु का स्वयं कोई स्वतंत्र उच्चारण नही है , जिस वर्ण पर लगती है उसके अनुसार ही वर्ण के उच्चारण को प्रकट करती है ।
ठीक इसी प्रकार अव्यक्ता मूल प्रकृति का भी स्वयम का कोई स्वतंत्र प्रभाव नही है , क्योकि शक्ति को भी धारण करने वाले की आवश्यकता होती है ।
जब यह शक्ति किसी जीव पर स्थापित होती है तब उस जीव के मन अनुसार क्रियाएं प्रकट करती है ।
यह शरीर हार्डवेयर और शक्ति साफ्टवेयर है तथा मन प्रोग्रामर है ।
मित्रों , इस प्रकार "ह्रीं " बीज,
निर्माण शक्ति युक्त एवं आकाश व अग्नि तत्व निर्मित बिजासन पर अर्ध-चन्द्र रूप में विराजमान देवी स्वरूप का मूर्त रूप है ।जो सभी इच्छओं को पूर्ण करने में समर्थ है ।
।। ॐ ह्रीं ॐ ।।

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