Sunday, February 18, 2018

रामदेव यादव ने अपनी रही सही इज़्ज़त भी गँवा दी अपने झूठे धारावाहिक से।

रामदेव यादव ने अपनी रही सही इज़्ज़त भी गँवा दी अपने झूठे धारावाहिक से।
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रामदेव ने आयुर्वेद को सर्वाधिक क्षति पहुंचाई है । इन्होंने धन कमाने की लालसा में आयुर्वेद जैसी पवित्र चिकित्सा पद्धति को सीढ़ी बनाकर खुद को कुबेरपति बनाया । इनके पास न तो आयुर्वेद की डिग्री है , न ही आयुर्वेद का औपचारिक ज्ञान । राजीव दीक्षित के संकलित भाषणों को सुन सुनकर इन्होंने खुद को डॉक्टर समझ लिया और करने लगे दवाओं का मालामाल करने वाला धंधा ।
एक आयुर्वेदिक चिकित्सक होने की हैसियत से पूरी ऑथेंटिसिटी के साथ अपनी बात रख रही हूँ । रामदेव के कारण आयुर्वेद को कोई पहचान नहीं मिली बल्कि इसने अपना बिज़नेस खड़ा किया है । अनपढ़ों और अज्ञानियों को तो कोई भी हांक ले जाए लेकिन दुर्भाग्य तो ये है कि इसने पढ़े लिखे लोगों को भी चरा डाला ।
भारत की ज्यादातर जनता मूढ़मति है । उसे अपने स्वास्थ्य की ज़रा भी चिंता नहीं है । बस भेंडचाल की तरह दौड़ती है , बिना ये जाने की किस दिशा में दौड़ रही है , बस आगे हुजूम है इतना काफी है । दौड़ते चलो ।
आयुर्वेद के ग्रंथों में औषधियां वर्णित हैं , उनका कम्पोजीशन लिखा है । उन्हें कहते हैं "शास्त्रोक्त औषधियां" , अर्थात जिनका वर्णन शास्त्रों में है और जिसे हमारे जैसे आयुर्वेदिक चिकित्सक पांच वर्ष पढ़ने के बाद प्रैक्टिस करने का अधिकार पाते हैं । किन्तु कुछ लोग बिना किसी औपचारिक शिक्षा के , केवल भाषणों द्वारा भीड़ इकठ्ठा करके धंधा कर रहे हैं । और विडंबना देखिये कि तथाकथित समझदार वर्ग बिना किसी बात की पुष्टि किये ही इनके पंडाल में बैठा है।
इन्होंने आयुर्वेदिक चिकित्सकों को खरीद लिया , 5 से दस हज़ार रूपए की पगार पर प्रत्येक पतंजलि आउटलेट पर बैठा दिया । ये डॉक्टर पंतजलि से हटकर किए भी अन्य कंपनी के प्रोडक्ट्स का नाम तक नहीं जानते , पर्चा लिखना तो बहुत दूर की बात है । इन चिकित्सकों का स्वाभिमान भी छीन लिया । वे अपनी योग्यता का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते । केवल और केवल दूकान में रखी दवाओं को ही प्रेस्क्रायिब करना इनकी मजबूरी है । यानी पर्चा डाक्टर का दिमाग रामदेव का ।
एक बात स्पष्ट कर दूँ की आयुर्वेदिक जितनी भी कंपनियाँ हैं सभी स्वदेशी हैं (बैद्यनाथ, डाबर, ऊंझा, सांडू, झंडू, धूत पापेश्वर, Arihealth, Adusuns आदि), अतः रामदेव को स्वदेशी का राग भी नहीं अलापना चाहिए ।
शास्त्रोक्त औषधियां शास्त्रों में, हमारे ग्रंथों में वर्णित है । कोई भी साधारण आदमी एक नयी कंपनी खोलेगा तो वही दवा बनाएगा । नाम चाहे पतंजलि रखे अथवा धन्वन्तरि। औषधि तो वही रहेगी ।
अब इनका अगला धंधा आउटलेट डीलरशिप देने का । साधारण जनता से पच्चीस तीस लाख वसूलना । शायद इससे ज्यादा भी । बेचारा कितना लगाएगा और कितना कमायेगा ।
यहाँ सड़क किनारे तम्बू में कुछ बंजारे रहते हैं , उसमें एक 26-27 साल बीमार मानसिक रोगी लड़का , और एक बीमार बुढ़िया दिखती है अक्सर। उस टेंट के अंदर लगातार रामदेव की आवाज़ में केसेट चलता रहता है आयुर्वेदिक ज्ञान बघारते हुए और अनजान मासूम गरीब जनता उस टेंट के अंदर गन्दगी में रखी दवाएं सस्ते में खरीदकर खाती है और पहले से भी ज्यादा बीमार हो जाती है ।
दुसरे यहाँ ठेले पर और कैरियर चौपहियों पर वही रामदेव का ऑडियो सीडी चलाकर , मजदूर छाप अनपढ़ लोग, देसी दवाएं बिना किसी ज्ञान के या ऑथेंटिसिटी के धड़ल्ले से मर्जी से दवाएं बेच रहे हैं और अनजान , मासूम जनता के स्वाथ्य के साथ खुलेआम खिलवाड़ करते हैं । आश्चर्य है कि खुद को जागरूक समझने वाली जनता क्यों नहीं इन बातों को नोटिस कर पाती है ।
एक इंजिनियर पारिवारिक मित्र है हमारे । जीन्स से लेकर टूथ ब्रश तक पातंजलि का इस्तेमाल करते हैं । जब बीमार होते हैं तो फोन पर दवाएं हमसे पूछकर खाते हैं । गत जून माह में वे अपनी पत्नी को हरिद्वार, रामदेव अस्पताल ले जाना चाहते थे । दस दिन ठहरने का पॅकेज 20,000 रूपए बताया था उन्होंने । पत्नी की बीमारी सीरियस थी, इसलिए फोन पर तसल्ली से डिटेल टेक्नीकल इशूज़ डिस्कस करने के लिए हम थे और 20, 000 का पॅकेज उधर रामदेव-खाते में पूरी श्रद्धा के साथ डिपॉज़िट । हँसी आ गयी उस पढ़े लिखे ज्ञानी इंजिनियर पर । जिसे इतनी मोटी रकम दे रहा था उससे मर्ज डिस्कस नहीं किया । हमसे किया ,,,, आखिर क्यों
जो चिकित्सक है वो अपनी जिम्मेदारी समझता है और जो व्यापारी है वो जनता की भेंडचाल मानसिकता को समझते हुए सिर्फ पैसा बनाता ही । चाहे उसके लिए उसे एलोवेरा जेल से लेकर पतंजलि मैगी और जीन्स ही क्यों न बनानी पड़े ।
सबसे पहले रामदेव की बॉयोपिक "एक संघर्ष" पर रोक लगनी चाहिए, जो जातिवाद को बढ़ावा देते हुए ब्राह्मणों को अपमानित कर रही है। इस तरह से अराजकता और द्वेष फैलता है समाज मे।
दूसरी बात, मोदी जी और अमित शाह आदि, जबरदस्ती इसके महिमामंडन में न उतरें। इससे उनके पद की गरिमा को ठेस पहुंचती है, जो स्वीकार्य नहीं।
तीसरी बात, स्वदेशी के नाम पर विदेशी चैनलों पर पतंजलि प्रोडक्स के विज्ञापन पर रोक लगाई जाए। ये आयुर्वेद शब्द का अपने उत्पादों में अनाधिकृत उपयोग करता है जो अनुचित है।
चौथी बात, रामदेव यादव, या तो आयुर्वेदिक औषधियाँ बेचे या फिर किराना। दोंनों का धंधा साथ साथ न करे।

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