भाई संजय मिश्रा की वॉल से --
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देश मे इस समय भीमा कोरेगांव चर्चा में है। कल, राहुल गांधी का भी इस पर बयान आया। कई फोरम में देखने के बाद पता चलता है कि हिंदूवादियों को भीमा कोरेगांव के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है और इस मुद्दे पर अक्सर भीमटों से बहस में बैकफ़ुट पर दिखाई देतें हैं।
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देश मे इस समय भीमा कोरेगांव चर्चा में है। कल, राहुल गांधी का भी इस पर बयान आया। कई फोरम में देखने के बाद पता चलता है कि हिंदूवादियों को भीमा कोरेगांव के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है और इस मुद्दे पर अक्सर भीमटों से बहस में बैकफ़ुट पर दिखाई देतें हैं।
एक लाइन में समझना है तो कहूंगा कि भीमा कोरेगांव हमारे लिए "कसाब" है।
नहीं समझे? समझता हूँ...
जब 2008 में मुम्बई हमला हुआ तो हिन्दू समाज को आतंकी समाज घोषित करने की साजिश पहले से ही शुरू हो चुकी थी। हमले के तुरंत बाद 26/11 को आरएसएस की साजिश बताने के लिए पहले से ही किताब लिखी जा चुकी थी जिसका विमोचन दिग्विजय सिंह ने किया। तत्कालीन गृह मंत्री सुशील शिंदे ने हिन्दू आतंकवाद जैसा शब्द भी इस्तेमाल किया। यदि कसाब न पकड़ा जाता तो शायद आज ये थ्योरी स्थापित हो जाती कि मुम्बई हमला पाकिस्तान ने नहीं किया बल्कि हिन्दू आतंकवाद का एक पहलू है ताकि करकरे, सालस्कर को किनारे लगाया जा सके।
पिछले सैकड़ों सालों में हिन्दू धर्म के खिलाफ एक और थ्योरी बनी है कि हिन्दू धर्म छुआछूत सिखाता है और इसे साबित करने के लिए महारों का उदाहरण दिया जाता है कि वे अछूत थे।
भारत के ऐतिहासिक दस्तावेजों में बहुत कुछ गलत और हिन्दू विरोधी है। महार एक अछूत जाति नहीं बल्कि सवर्ण क्षत्रिय जाति हुआ करती थी। इनका मुख्य काम पहरेदारी, चौकीदारी, द्वारपाल, राज्य के महत्पूर्ण व्यक्तियों के अंगरक्षक बनना, काफिले में राज्य के मुख्य व्यक्तियों व खजाने की सुरक्षा करना। महार एक सम्मानित जाति भी हुआ करती थी। जब भी दो लोगों में जमीन को ले कर झगड़ा हुआ करता था तब महारों को सुलह के लिए बुलाया जाता था। महारों की कही बात अंतिम निर्णय मानी जाती थी।
महारों के लिए परिस्थितियां तब बदल गईं जब इन्होंने जमीन के लालच में अंग्रेज़ी सेना की एडवांस्ड आर्टिलरी के साथ धोखे से 28,000 राष्ट्रवादी पेशवा सैनिकों की हत्या कर दी। ये युध्द पुणे के कोरेगांव में लड़ा गया और अंग्रेज़ो ने खुश हो कर महारों के लिए मीनार बनवाई जिसे भीमा कोरेगांव कहा गया।
इस युद्ध के बाद महाराष्ट्र के सभी लोगों ने महारों का बहिष्कार किया। हिन्दू समाज के लिए वैसे हो गए जैसे आज आज अमेरिका के लिए नॉर्थ कोरिया। इन्हें दूध वाले ने दूध देना बंद किया, नाई ने बाल काटने बंद किये, ब्राह्मण ने मंदिर में घुसने से मना कर दिया। ये एक सामाजिक बहिष्कार था जो 28,000 राष्ट्रवादी सैनिकों की हत्याओं के विरोध में था। ठीक वैसे ही जैसे गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के जरिये अंग्रेज़ो का बहिष्कार किया।
महारों के बहिष्कार को वामपंथियों ने अछूत बनाना लिखा।
महारों के बहिष्कार को वामपंथियों ने अछूत बनाना लिखा।
अम्बेडकर ने पूना पैक्ट के दौरान महारों द्वारा पेशवा सैनिकों की हत्याओं की बात छुपाई और झूठा प्रचार किया कि मनुस्मृति छुआछूत फैलती है और ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत को संस्थागत रूप दे कर दलित राजनीति की शुरुआत की।
महार, वर्तमान में आरक्षण के लिए बुद्ध धर्म को मानने का दिखावा करते हैं पर वास्तव में सभी ईसाई हैं, मने क्रिप्टो-क्रिस्चियन जो कि ईसाई धर्म की एक संस्थागत प्रैक्टिस है। अरुण शौरी ने अपनी किताब worshipping false god में अम्बेडकर के बुद्ध धर्म मे धर्मान्तरण को स्वांग बताया। इस बात से सहमत हुआ भी जा सकता है क्योंकि अम्बेडकर ने 1927 में मनुस्मृति क्रिसमस के दिन जला के गुप्त संदेश दिया कि हिन्दू धर्म का नाश हो और ईसाईयत का प्रचार हो। अम्बेडकर अगर बौद्ध था तो मनुस्मृति बुद्ध पूर्णिमा के दिन क्यों नहीं जलाई? क्रिसमस का दिन ही क्यों चुना?
ऐसा भी हो सकता है कि महार कोरेगांव युद्ध से पहले ही ईसाई हो चुके क्योंकि कोरेगांव युद्ध एक प्रकार की नक्सली हिंसा थी ठीक वैसी ही जैसी की छत्तीसगढ़ और बिहार में 90 के दशक में ईसाई नक्सलियों ने शुरू की। वैसे भी तथाकथित-सेंट जेवियर ने गोआ, महाराष्ट्र में धर्मान्तरण का काम किया। संभावित है कि महार इसी फ़र्ज़ी-सेंट जेवियर के प्रभाव से ईसाई हो गए हों।
पेशवा सैनिकों की हत्या के लिए महारों को कोई पछतावा नहीं बल्कि बेशर्मी से हर साल 1-जनवरी को पेशवा सैनिकों की मौतों और ब्रिटिश सेना की जीत का जश्न मनाने भीमा कोरेगांव जातें हैं।
इस आपराधिक घटना को छुपाने के लिए महार कहानी बनाते हैं कि पेशवा उन्हें अछूत बना के रखता था। आधे सेकंड के लिए मान लीजिये कि आप किसी की नज़रों में अछूत हैं और वह व्यक्ति आपसे कोई संबंध नहीं रखता तो क्या आप उस व्यक्ति को मार डालेंगे? इसलिए क्रिप्टो-क्रिस्चियन महारों की इस थ्योरी में बहुत बड़ा झोल है कि पेशवा उन्हें अछूत बना के रखता है। ये कहानी सिर्फ उन्होंने अपनी गद्दारी छुपाने के लिए बनाई।
इस आपराधिक घटना को छुपाने के लिए महार कहानी बनाते हैं कि पेशवा उन्हें अछूत बना के रखता था। आधे सेकंड के लिए मान लीजिये कि आप किसी की नज़रों में अछूत हैं और वह व्यक्ति आपसे कोई संबंध नहीं रखता तो क्या आप उस व्यक्ति को मार डालेंगे? इसलिए क्रिप्टो-क्रिस्चियन महारों की इस थ्योरी में बहुत बड़ा झोल है कि पेशवा उन्हें अछूत बना के रखता है। ये कहानी सिर्फ उन्होंने अपनी गद्दारी छुपाने के लिए बनाई।
पेशवा सैनिकों की हत्या और ब्रिटिश सेना की जीत मनाने के कुकृत्य के लिए इनके ऊपर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए और इन सभी को जेल में बंद करना चाहिए।
हिन्दू समाज को सबसे बड़ी गलती इन क्रिप्टो-क्रिश्चियन्स हो दलित समझना।
हिन्दू समाज को सबसे बड़ी गलती इन क्रिप्टो-क्रिश्चियन्स हो दलित समझना।
भारत मे जितनी भी जातियाँ अछूत या बहिष्कृत हुई वे अपने कुकर्मों के कारण अछूत हुई चाहे वे वेश्यावृत्ति करने वाली जाति बेड़िया, बांछड़ा, कंजर हो या आपराधिक जातियाँ बावरिया या राष्ट्रद्रोह करने वाली जाति महार हो।
वर्तमान में कॉलेज और नौकरियों में आरक्षण झूठे, काल्पनिक शोषण के इतिहास पर आधारित है। हिंदुओं के संगठन विहिप, संघ, भाजपा कभी इस झूठे इतिहास के खिलाफ बोलते भी नही क्योंकि इनमें कई कायर और मंदबुद्धि भरे हैं। सबसे बड़ा मंदबुद्धि तो मोदी है जिसने कांग्रेस के बनाए 1989 के sc, st एक्ट को दिसम्बर-2015 में और भी नुकीला बना दिया जिसकी जानकारी अभी तक अधिकतर भाजपा समर्थकों को नहीं है। इस एक्ट का फायदा भीमा कोरेगांव पर जश्न मनाने वाले क्रिप्टो-क्रिश्चियन्स उठाएंगे। मने मोदी ने अपने कोर वोटबैंक के खिलाफ ये एक्ट बना दिया सिर्फ भीमटों के वोट के खातिर जो कभी नहीं मिलने वाला।
हिंदुओं को सोशल मीडिया पर बहस के दौरान इस बात की सावधानी बरतनी है कि वे दलित और भीमटा शब्द के अंतर को समझें। दलित शम्भू रैगर और डीजी वंजारा की तरह होता है जबकि भीमटा रोहित वेमुला, कन्हैया कुमार की तरह होता है। दलित, मेरी-आपकी तरह एक समर्पित हिन्दू है जबकि भीमटा, दलित का मुखौटा लगाए हुए क्रिप्टो-क्रिस्चियन। वह हिन्दू समाज मे वेटिकन का डबल-एजेंट है जिसका काम हिंदुओं में आपस मे कंफ्यूजन फैला कर गृह युद्ध करवाना जिसका एक छोटा सा ट्रेलर आपने 1-जनवरी को पुणे में देखा। दिलीप मंडल अपने फेसबुक पोस्टों में कई बार लिख चुका है कि भीमा कोरेगांव देश के हर शहर में बनना चाहिए। इशारा साफ है कि हिंदुओं के खिलाफ कोरेगांव जैसी हिंसा हर शहर में होनी चाहिए। भीमा कोरेगांव का महिमामंडन, क्रिप्टो-क्रिस्चियन भीमटों को गृहयुद्ध के लिए तैयार करना भी है।
भीमटे जिस प्रतीक को अपनी शान समझतें है वही हमारे लिए उनके खिलाफ जीत का ट्रम्प कार्ड बनेगा।
जिस तरह कसाब ने हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी को झूठा साबित किया वैसे ही भीमा कोरेगांव, छुआछूत की थ्योरी और आरक्षण को खत्म करने में मददगार होगी।
जिस तरह कसाब ने हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी को झूठा साबित किया वैसे ही भीमा कोरेगांव, छुआछूत की थ्योरी और आरक्षण को खत्म करने में मददगार होगी।
भीमा कोरेगांव, हमारे लिए "कसाब" है।
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